'अगर भारत किसी भी तरह मददगार हो सकता है, तो हम तैयार हैं', कीव में बोले विदेश मंत्री एस. जयशंकर

'अगर भारत किसी भी तरह मददगार हो सकता है, तो हम तैयार हैं', कीव में बोले विदेश मंत्री एस. जयशंकर

रूस और यूक्रेन के बीच पिछले कई वर्षों से जारी विनाशकारी सैन्य संघर्ष को समाप्त कराने की दिशा में भारत ने अब तक की सबसे सीधी और निर्णायक कूटनीतिक पहल की है। यूक्रेन की राजधानी कीव पहुंचे भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने यूक्रेनी विदेश मंत्री एंड्री सिबिहा के साथ एक संयुक्त संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए ऐतिहासिक घोषणा की है कि यदि दोनों पक्ष चाहें, तो भारत इस युद्ध को समाप्त कराने के लिए मध्यस्थता सहित हर संभव तरीके से योगदान देने को पूरी तरह तैयार है। जयशंकर ने साफ शब्दों में कहा कि दुनिया अब एक अंतहीन युद्ध के साए में नहीं जी सकती और कूटनीतिक बातचीत के जरिए ही स्थायी शांति का रास्ता निकाला जा सकता है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की दोनों ही अंतरराष्ट्रीय मंचों पर शांति वार्ताओं की संभावनाओं को लेकर नए समीकरण तलाश रहे हैं। ऐसे में दोनों देशों के साथ गहरे और रणनीतिक संबंध रखने वाले भारत की यह पेशकश वैश्विक कूटनीति में एक युगांतरकारी मोड़ साबित हो सकती है।

कीव की धरती से जयशंकर का बड़ा संदेश: 'अगर भारत किसी भी तरह मददगार हो सकता है, तो हम तैयार हैं'

यूक्रेन और पोलैंड के तीन दिवसीय आधिकारिक दौरे के तहत कीव पहुंचे विदेश मंत्री एस. जयशंकर का यह दौरा वैश्विक राजनीति के केंद्र में आ गया है। यूक्रेनी विदेश मंत्री एंड्री सिबिहा के साथ द्विपक्षीय बातचीत के बाद जब वे मीडिया के सामने आए, तो उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि भारत इस मानवीय त्रासदी पर केवल मूकदर्शक बनकर नहीं रह सकता।

जयशंकर ने कहा, "हर बीतते दिन के साथ युद्ध केवल मौतों और तबाही का दायरा बढ़ा रहा है। यह स्वाभाविक है कि समाधान का रास्ता उन पक्षों को ही तलाशना होगा जो सीधे तौर पर इस संघर्ष में शामिल हैं। लेकिन अगर भारत किसी भी तरह, किसी भी रूप में इस संघर्ष को खत्म कराने में मददगार साबित हो सकता है, तो हम अपनी भूमिका निभाने के लिए पूरी तरह उपस्थित और तैयार हैं।" जयशंकर ने दो दिन पूर्व बिश्केक में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के मंच पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिए गए उस ऐतिहासिक बयान को भी दोहराया, जिसमें पीएम मोदी ने कहा था कि 'मानवता की भलाई के लिए अंतहीन युद्ध को अब युद्ध के अंत में तब्दील करना ही होगा।' यूक्रेनी विदेश मंत्री एंड्री सिबिहा ने भी इस पहल का स्वागत करते हुए कहा कि भारत जैसी वैश्विक महाशक्ति की सक्रिय कूटनीतिक भागीदारी से शांति प्रयासों में एक 'नया डायनामिज्म' (नई गतिशीलता) पैदा हो सकता है।

तेल की खरीद-बिक्री से नहीं, कूटनीति से निकलेगा हल: पश्चिमी देशों को दो टूक

प्रेस वार्ता के दौरान विदेश मंत्री जयशंकर ने उन पश्चिमी देशों और आलोचकों को भी कड़ा संदेश दिया जो लगातार यह नैरेटिव गढ़ने की कोशिश करते रहे हैं कि रूसी तेल या जिंसों की खरीद-फरोख्त ही इस युद्ध को ईंधन दे रही है। जयशंकर ने बेहद बेबाक अंदाज में कहा कि युद्ध का समाधान आर्थिक प्रतिबंधों या व्यापारिक पाबंदियों की संकीर्ण सोच से नहीं निकल सकता।

विदेश मंत्री ने कहा, "यह संघर्ष, जो आज अपने पांचवें वर्ष में प्रवेश कर चुका है, सिर्फ इसलिए हल नहीं हो जाएगा कि कोई देश तेल, एल्युमिना, खनिज, धातु या उर्वरक खरीद रहा है या नहीं खरीद रहा है। इस युद्ध का वास्तविक और स्थायी समाधान केवल और केवल मेज पर बैठकर होने वाली बातचीत, कूटनीति और आपसी समझौतों से ही निकलेगा।" उन्होंने याद दिलाया कि भारत ने हमेशा संयुक्त राष्ट्र चार्टर, अंतरराष्ट्रीय संप्रभुता और देशों की क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने की वकालत की है। भारत का यह रुख दिखाता है कि नई दिल्ली किसी भी गुट के दबाव में आए बिना राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए निष्पक्ष और व्यावहारिक शांति की पक्षधर है।

ब्लैक सी में जहाजों पर हमले और भारतीय नाविकों की सुरक्षा: खाद्य संकट की आहट

कीव में हुई इस उच्चस्तरीय बैठक में केवल राजनीतिक पहलुओं पर ही नहीं, बल्कि युद्ध के चलते समुद्री व्यापार और आम नागरिकों पर पड़ रहे घातक असर पर भी गंभीर मंथन हुआ। पिछले कुछ हफ्तों के दौरान ब्लैक सी (काला सागर) और ओडेसा बंदरगाह के आसपास व्यापारिक मालवाहक जहाजों पर हुए घातक हमलों का मुद्दा जयशंकर ने प्रमुखता से उठाया। हाल ही में इन हमलों में भारतीय नाविकों के हताहत होने और एक भारतीय नागरिक की जान जाने की दुर्भाग्यपूर्ण घटना पर भारत ने गहरी चिंता व्यक्त की।

जयशंकर ने कहा कि दुनिया भर के विभिन्न देशों के झंडे तले चलने वाले मर्चेंट नेवी के जहाजों पर बड़ी संख्या में भारतीय नाविक अपनी सेवाएं देते हैं। युद्ध के कारण समुद्री व्यापारिक मार्गों का असुरक्षित होना न केवल नाविकों की जान जोखिम में डाल रहा है, बल्कि इससे पूरी दुनिया में जहाजों की ढुलाई का खर्च (फ्रेट कॉस्ट) बढ़ रहा है। इसका सबसे बुरा असर 'ग्लोबल साउथ' यानी एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के विकासशील देशों पर पड़ रहा है। रूस और यूक्रेन मिलकर दुनिया के करीब 30 प्रतिशत गेहूं का निर्यात करते हैं। यदि ब्लैक सी के बंदरगाहों से अनाज का निर्यात ठप हुआ, तो दुनिया भर में गेहूं, मक्का और सूरजमुखी तेल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी और वैश्विक खाद्य सुरक्षा के लिए एक बड़ा संकट खड़ा हो जाएगा।

'यह युद्ध का युग नहीं': समरकंद से कीव तक पीएम मोदी की शांति कूटनीति का असर

जयशंकर का यह रुख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उस सतत कूटनीतिक लाइन का ही स्वाभाविक विस्तार है, जिसे भारत ने 2022 के समरकंद एससीओ शिखर सम्मेलन में पूरी दुनिया के सामने रखा था। उस समय प्रधानमंत्री मोदी ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मौजूदगी में ऐतिहासिक रूप से कहा था कि "आज का युग युद्ध का नहीं है।"

इसके बाद जुलाई 2024 में पीएम मोदी ने मॉस्को का दौरा कर पुतिन से सीधी बात की थी और कहा था कि किसी भी समस्या का समाधान रणभूमि से नहीं निकल सकता, क्योंकि जब मासूम बच्चों की जान जाती है तो दिल दहल जाता है। इसके तुरंत बाद अगस्त 2024 में पीएम मोदी ने यूक्रेन का ऐतिहासिक दौरा कर राष्ट्रपति जेलेंस्की से मुलाकात की थी और भारत की मानवीय प्रतिबद्धता दोहराई थी। भारत दुनिया का अकेला ऐसा प्रमुख देश बनकर उभरा है जो एक ही समय में वाशिंगटन, ब्रुसेल्स, मॉस्को और कीव के शीर्ष नेतृत्व के साथ समान विश्वास और पारदर्शिता के साथ संवाद स्थापित कर सकता है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल की मॉस्को यात्रा और अब जयशंकर का कीव दौरा यह साफ दर्शाता है कि भारत पर्दे के पीछे एक विश्वसनीय शांति सेतु के रूप में निरंतर सक्रिय है।

पुतिन और जेलेंस्की दोनों से सीधा संवाद: क्यों भारत ही बन सकता है सबसे भरोसेमंद मध्यस्थ?

जब मध्यस्थता की बात आती है, तो सवाल उठता है कि दुनिया भर के तमाम देशों के बीच भारत की भूमिका इतनी खास क्यों मानी जा रही है? इसका सीधा उत्तर दोनों पक्षों के साथ भारत की कूटनीतिक विश्वसनीयता में छिपा है। पश्चिमी देश (अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोपीय संघ) जहां खुले तौर पर यूक्रेन को अरबों डॉलर के हथियार देकर सीधे तौर पर युद्ध के एक पक्षकार बन चुके हैं, वहीं चीन पर मॉस्को के प्रति झुकाव का आरोप लगता रहा है।

इसके विपरीत, भारत ने किसी भी सैन्य गठबंधन का हिस्सा बने बिना अपनी स्वतंत्र विदेश नीति (रणनीतिक स्वायत्तता) को अक्षुण्ण रखा है। रूस भारत का दशकों पुराना रक्षा और ऊर्जा साझेदार है, जहां राष्ट्रपति पुतिन खुद कह चुके हैं कि वे भारत, चीन और ब्राजील जैसे देशों के शांति प्रयासों का स्वागत करते हैं। दूसरी ओर, यूक्रेन और पश्चिमी जगत भी भारत को एक जिम्मेदार, लोकतांत्रिक और तटस्थ शक्ति के रूप में देखते हैं। इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी से लेकर जर्मन चांसलर तक यह सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर चुके हैं कि भारत ही वह धुरी बन सकता है जो दोनों पक्षों को एक साझा मेज पर ला सकती है।

यूक्रेन को मानवीय मदद और भविष्य की साझेदारी: तकनीक, एआई और पुनर्निर्माण

विदेश मंत्री ने युद्ध की विभीषिका के बीच भारत द्वारा यूक्रेन की जनता को दी जा रही निरंतर मानवीय सहायता का भी ब्योरा दिया। भारत अब तक यूक्रेन को 19 खेपों में करीब 160 मीट्रिक टन से अधिक राहत सामग्री भेज चुका है, जिसमें आपातकालीन मेडिकल उपकरण, जीवनरक्षक दवाएं, कंबल, तिरपाल और बिजली के बड़े जनरेटर सेट शामिल हैं। जयशंकर ने यूक्रेनी विदेश मंत्री को आश्वस्त किया कि भारत मानवीय आधार पर सहायता जारी रखेगा।

इसके साथ ही, दोनों नेताओं ने युद्ध के बाद के दौर की संभावनाओं पर भी दूरगामी चर्चा की। जयशंकर ने कहा कि यूक्रेन के पास भारी इंजीनियरिंग, बुनियादी ढांचे और उच्च शिक्षा की गहरी ताकत है, जबकि भारत डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI), आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), फार्मास्यूटिकल्स और स्टार्टअप्स के क्षेत्र में दुनिया का नेतृत्व कर रहा है। दोनों देशों ने सहमति जताई कि वे जल्द ही 'अंतर-सरकारी आयोग' (Inter-Governmental Commission) की अगली बैठक आयोजित करेंगे ताकि जंग के बाद यूक्रेन के पुनर्निर्माण और आर्थिक पुनरुद्धार में भारतीय कंपनियां और तकनीक बड़े पैमाने पर भागीदारी कर सकें। इसके अलावा यूक्रेन में फंसे या शिक्षा हासिल करने वाले भारतीय छात्रों की सुरक्षा और डिग्रियों के सत्यापन के मुद्दों पर भी सौहार्दपूर्ण बातचीत हुई।

विदेश मंत्री एस. जयशंकर के कीव में दिए गए इन बयानों ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के पटल पर भारत के बढ़ते कद और 'विश्वबंधु' की भूमिका को पूरी मजबूती से स्थापित कर दिया है। यूक्रेन से पोलैंड रवाना हो रहे जयशंकर का यह संदेश दुनिया को यह भरोसा दिलाता है कि भले ही मिसाइलों और तोपों का शोर कितना भी तेज क्यों न हो, युद्ध का अंतिम खात्मा शांति के सफेद झंडे और कूटनीतिक मेज पर ही मुमकिन होगा, और उस मेज को सजाने में भारत अपनी ऐतिहासिक जिम्मेदारी निभाने के लिए पूरी तरह तैयार खड़ा है।