PM बनने की दौड़ में कहीं CM की कुर्सी न गंवा बैठें थलपति विजय: 'विजय फॉर प्राइम मिनिस्टर' कैंपेन से भड़की कांग्रेस, 5 विधायकों के सहारे टिकी सरकार पर मंडराया सियासी संकट
दक्षिण भारत के सबसे हाई-प्रोफाइल राजनीतिक राज्य तमिलनाडु में सत्ता के गलियारों से एक बहुत बड़ा सियासी भूचाल सामने आ रहा है। सिनेमाई पर्दे से निकलकर पहली ही बार में राज्य की सत्ता के शिखर पर पहुंचे तमिलगा वेत्री कषगम (TVK) के प्रमुख और मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय (थलपति विजय) की सरकार पर गठबंधन के भीतर ही संकट के बादल मंडराने लगे हैं। 'मूड ऑफ द नेशन' सर्वे के बाद टीवीके नेताओं और मंत्रियों द्वारा शुरू किए गए 'विजय फॉर प्राइम मिनिस्टर 2029' कैंपेन ने गठबंधन की प्रमुख सहयोगी कांग्रेस पार्टी के सब्र का बांध तोड़ दिया है। कांग्रेस के पर्यटन मंत्री एस. राजेश कुमार की सीधी चेतावनी और समर्थन वापसी की धमकियों के बाद यह सवाल सियासी गलियारों में गूंजने लगा है कि क्या 2029 में देश का प्रधानमंत्री बनने की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा के फेर में थलपति विजय अपने हाथ से तमिलनाडु के मुख्यमंत्री की कुर्सी भी गंवा देंगे? 234 सीटों वाली तमिलनाडु विधानसभा में बहुमत के बेहद नाजुक आंकड़े पर टिकी विजय सरकार के लिए कांग्रेस का यह कड़ा रुख किसी बड़े खतरे की घंटी से कम नहीं है।
118 का जादुई आंकड़ा और 107 पर अटकी टीवीके: समझिए तमिलनाडु विधानसभा का पूरा नंबर गेम
तमिलनाडु की 234 सदस्यीय विधानसभा में सरकार बनाने और उसे स्थिर बनाए रखने के लिए किसी भी दल या गठबंधन को कम से कम 118 विधायकों के जादुई आंकड़े की जरूरत होती है। विधानसभा चुनाव में छह दशकों से चले आ रहे द्रमुक (DMK) और अन्नाद्रमुक (AIADMK) के एकाधिकार को तोड़ते हुए थलपति विजय की पार्टी टीवीके ने अकेले दम पर 108 सीटों पर ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी। हालांकि, चूंकि विजय खुद दो विधानसभा क्षेत्रों से चुनाव जीते थे, इसलिए नियमों के तहत एक सीट खाली करने के बाद टीवीके के अपने विधायकों की प्रभावी संख्या घटकर 107 रह गई।
बहुमत के 118 के आंकड़े से 11 सीटें दूर खड़ी टीवीके को सत्ता तक पहुंचाने में कांग्रेस के 5 विधायकों के साथ-साथ सीपीआई (2), सीपीएम (2), वीसीके (2) और आईयूएमएल (2) ने समर्थन दिया था, जिससे गठबंधन का कुल आंकड़ा 120 पर पहुंचा और विजय ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। इस गणित से यह पूरी तरह साफ है कि विजय सरकार विधानसभा में बहुमत के बेहद पतले मार्जिन (मात्र 2-3 अतिरिक्त विधायक) पर टिकी हुई है। ऐसे नाजुक समीकरण में अगर कांग्रेस अपने 5 विधायकों का समर्थन वापस ले लेती है, तो गठबंधन का आंकड़ा सीधे 120 से गिरकर 115 पर आ जाएगा, जो कि बहुमत के 118 के आंकड़े से कम है। ऐसी स्थिति में विजय सरकार अल्पमत में आ जाएगी और फ्लोर टेस्ट में सरकार गिरने का सीधा खतरा पैदा हो जाएगा।
'विजय फॉर पीएम' कैंपेन से भड़की कांग्रेस: मंत्रियों ने दे डाली कैबिनेट छोड़ने की सीधी चेतावनी
इस पूरे सियासी तनाव की शुरुआत तब हुई जब टीवीके के शीर्ष मंत्रियों और नेताओं ने खुले तौर पर थलपति विजय को 2029 के लोकसभा चुनाव के लिए प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित करना शुरू कर दिया। तमिलनाडु सरकार में मंत्री एम. शरतकुमार ने सार्वजनिक मंच से विजय को देश का अगला प्रधानमंत्री बताते हुए कहा कि जो नेता बगैर दिन-रात (AM और PM) देखे जनता के लिए काम करता है, वही देश का अगला पीएम होगा। वहीं एक अन्य वरिष्ठ मंत्री आधव अर्जुन ने मांग उठाई कि देश का अगला प्रधानमंत्री उत्तर भारत के बजाय दक्षिण भारत यानी तमिलनाडु से होना चाहिए।
इसके बाद सोशल मीडिया और उत्तर भारत के प्रमुख शहरों में 'विजय फॉर पीएम' के पोस्टर्स और प्रचार वीडियो चलाए जाने लगे। इस मुहिम से नाराज होकर तमिलनाडु सरकार में कांग्रेस कोटे के पर्यटन मंत्री एस. राजेश कुमार ने खुलकर मोर्चा खोल दिया। राजेश कुमार ने दो टूक शब्दों में चेतावनी दी कि राष्ट्रीय स्तर पर 2029 में विपक्ष के प्रधानमंत्री पद के एकमात्र और सर्वमान्य उम्मीदवार राहुल गांधी ही हैं। उन्होंने साफ कहा कि अगर टीवीके ने 2029 में राहुल गांधी की उम्मीदवारी का समर्थन नहीं किया, तो वे और उनके सहयोगी मंत्री पी. विश्वनाथन तुरंत कैबिनेट से इस्तीफा देकर गठबंधन से नाता तोड़ लेंगे। कांग्रेस नेताओं ने तंज कसते हुए यह भी कहा कि टीवीके को 'फैन क्लब' मोड से बाहर निकलना चाहिए, क्योंकि प्रधानमंत्री बनने के लिए संसद में 272 सांसदों के समर्थन की दरकार होती है, जो किसी एक राज्य के दम पर संभव नहीं है।
'मूड ऑफ द नेशन' सर्वे ने बढ़ाई तकरार: तीसरे नंबर पर विजय, दूसरे पर राहुल गांधी
इस सियासी आग में घी डालने का काम देश के प्रतिष्ठित 'मूड ऑफ द नेशन' सर्वे ने किया। इस जनमत सर्वेक्षण में जब जनता से अगले प्रधानमंत्री पद के लिए पहली पसंद को लेकर राय मांगी गई, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले स्थान पर और राहुल गांधी दूसरे स्थान पर रहे। लेकिन सबसे बड़ा उलटफेर तब दिखा जब थलपति विजय करीब 9 प्रतिशत समर्थन के साथ देश के तीसरे सबसे पसंदीदा पीएम चेहरे के रूप में उभरे।
सर्वे के इन आंकड़ों के सामने आते ही टीवीके के कैडर्स और सोशल मीडिया विंग ने विजय को राष्ट्रीय स्तर पर प्रोजेक्ट करना तेज कर दिया। हालांकि कांग्रेस ने इस सर्वे को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि आंकड़े कभी भी पूरी सच्चाई नहीं बताते और यह केवल जनता को बांटने का एक प्रयास है। कांग्रेस का मानना है कि दक्षिण भारत में राहुल गांधी की मजबूत पकड़ और उनकी भारत जोड़ो यात्रा की साख को कमजोर करने के लिए क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं को हवा दी जा रही है।
थराहाई कथबर्ट का डैमेज कंट्रोल: क्या सच में टल गया सरकार पर मंडराता संकट?
गठबंधन में बढ़ते तनाव और सरकार गिरने की अटकलों के बीच तमिलनाडु विधानसभा में कांग्रेस विधायक दल (CLP) की नेता थराहाई कथबर्ट ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर डैमेज कंट्रोल करने की कोशिश की। कथबर्ट ने दावा किया कि मुख्यमंत्री थलपति विजय ने खुद राहुल गांधी को 2029 का पीएम उम्मीदवार स्वीकार कर लिया है और पार्टी कार्यकर्ताओं द्वारा चलाया जा रहा कैंपेन महज उनका निजी उत्साह है, पार्टी की आधिकारिक लाइन नहीं।
हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब तक खुद मुख्यमंत्री थलपति विजय सार्वजनिक मंच पर आकर इस बात का आधिकारिक ऐलान नहीं करते, तब तक यह दरार पूरी तरह नहीं भरेगी। टीवीके का कोर वोटर और युवा समर्थक वर्ग विजय को एक बड़े राष्ट्रीय नेता के रूप में देखना चाहता है। अगर विजय खुलकर राहुल गांधी के पीछे खड़े होते हैं, तो उनके अपने कैडर में निराशा फैल सकती है, और अगर वे अपनी पीएम उम्मीदवारी पर अड़े रहते हैं, तो कांग्रेस समर्थन वापस लेकर उनकी सरकार को संकट में डाल सकती है।
क्या डीएमके और एआईएडीएमके उठा सकते हैं गठबंधन के अंतर्विरोध का फायदा?
तमिलनाडु के विपक्ष में बैठी द्रमुक (DMK) और अन्नाद्रमुक (AIADMK) इस पूरे घटनाक्रम पर गिद्ध दृष्टि बनाए हुए हैं। द्रमुक पहले ही कांग्रेस द्वारा उसका साथ छोड़कर टीवीके के साथ जाने से नाराज रही है। यदि कांग्रेस और टीवीके के बीच दरार बढ़ती है और सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव (No-Confidence Motion) की नौबत आती है, तो तमिलनाडु की राजनीति में एक बार फिर बड़ा सत्ता परिवर्तन देखने को मिल सकता है।
थलपति विजय के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा और सरकार की स्थिरता के बीच संतुलन साधने की है। एक नवगठित दल के नेता के लिए 5 साल तक सुशासन देकर अपनी जमीन मजबूत करना पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। राष्ट्रीय राजनीति की जल्दबाजी में यदि उन्होंने अपने गठबंधन सहयोगियों को नाराज किया, तो सेंट जॉर्ज फोर्ट (तमिलनाडु सचिवालय) की गद्दी उनके हाथ से फिसल सकती है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि 'थलपति' अपनी इस पहली बड़ी राजनीतिक परीक्षा से खुद को और अपनी सरकार को कैसे बाहर निकालते हैं।