रूस के लिए अमेरिका से भिड़ेगा भारत? नए प्रतिबंध कानून और 100% टैरिफ की धमकी पर MEA की दो टूक
अमेरिका और पश्चिमी देशों के लगातार बढ़ते भू-राजनीतिक दबाव के बीच भारत ने एक बार फिर अपनी संप्रभु विदेश नीति और राष्ट्रीय हितों की रक्षा के प्रति अडिग संकल्प दोहराया है। अमेरिकी कांग्रेस (संसद) में रूस और ईरान पर नए कड़े प्रतिबंध लगाने वाले कानून—'लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट'—के पारित होने के बाद नई दिल्ली ने वाशिंगटन को कड़े शब्दों में कूटनीतिक संदेश दिया है।
इस विधेयक में राष्ट्रपति को यह अधिकार दिया गया है कि वे रूस से कच्चा तेल व गैस खरीदने वाले शीर्ष पांच आयातक देशों (जिनमें भारत और चीन शामिल हैं) पर 100 प्रतिशत तक का भारी आयात शुल्क (Tariff) लगा सकते हैं। इस नए अमेरिकी पैंतरे पर भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) ने स्पष्ट कर दिया है कि ऐसे किसी भी कदम का सीधा असर भारत-अमेरिका द्विपक्षीय संबंधों और वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ेगा।
'140 करोड़ भारतीयों की ऊर्जा सुरक्षा से समझौता नहीं' — MEA
अमेरिकी प्रतिनिधि सभा (House of Representatives) में विधेयक पारित होने के बाद विदेश मंत्रालय ने आधिकारिक बयान जारी करते हुए साफ किया:
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ऊर्जा सुरक्षा शीर्ष प्राथमिकता: मंत्रालय ने कहा, "भारत अपने 1.4 अरब (140 करोड़) नागरिकों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। देश अपनी ऊर्जा जरूरतों को विविध स्रोतों और बाजार की बदलती परिस्थितियों के आधार पर पूरा करना जारी रखेगा।"
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द्विपक्षीय रिश्तों पर असर की चेतावनी: विदेश मंत्रालय ने जोर देकर कहा कि इस मुद्दे पर हाल के महीनों में अमेरिकी वार्ताकारों के साथ उच्च स्तर पर गहन चर्चा की गई है। भारत ने बहुत स्पष्ट शब्दों में आगाह कर दिया है कि अगर दंडात्मक आर्थिक कदम उठाए जाते हैं, तो इसके गंभीर परिणाम न केवल भारत-अमेरिका संबंधों पर बल्कि अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार की स्थिरता पर भी पड़ेंगे।
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आर्थिक हितों की रक्षा: भारत सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि वह अपने व्यापार और आर्थिक हितों की सुरक्षा के लिए सभी आवश्यक कदम उठाने को तैयार है और घरेलू उद्योग जगत के साथ मिलकर रणनीति बना रही है।
अमेरिकी सीनेटर की तल्ख टिप्पणी से बढ़ा तनाव
अमेरिकी कांग्रेस में बिल पास होने के दौरान कुछ सीनेटरों की ओर से भारत को लेकर बेहद आक्रामक भाषा का इस्तेमाल किया गया।
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डेमोक्रेटिक सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने कहा था कि "भारत और चीन को अपना रवैया सुधारना होगा और तेल कहीं और से खरीदना होगा, तुष्टीकरण कोई नीति नहीं हो सकती।"
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इस बयान और 100% टैरिफ के प्रावधान को भारतीय रणनीतिक हलकों में देश की संप्रभु विदेश नीति में सीधा दखल और 'आर्म-ट्विस्टिंग' (दबाव बनाने) का प्रयास माना जा रहा है।
भारत के लिए रूसी तेल क्यों है अपरिहार्य?
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कच्चे तेल पर 90% आयात निर्भरता: भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का लगभग 85% से 90% कच्चा तेल आयात करता है।
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रूस शीर्ष आपूर्तिकर्ता: यूक्रेन युद्ध के बाद से रियायती दरों के चलते रूस भारत का सबसे बड़ा क्रूड ऑयल सप्लायर बनकर उभरा है। भारत के कुल आयात में रूस की हिस्सेदारी एक-तिहाई से भी अधिक है।
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वैश्विक बाजार में हाहाकार का खतरा: ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत जैसे बड़े खरीदार को रूसी तेल से अचानक अलग किया गया, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें $100 प्रति बैरल से काफी ऊपर निकल जाएंगी। इससे न केवल भारत में पेट्रोल-डीजल महंगा होगा बल्कि दुनिया भर में भयानक महंगाई का संकट खड़ा हो जाएगा।
क्या सचमुच अमेरिका से टकराएगा भारत?
कूटनीतिक जानकारों के मुताबिक, भारत का रुख टकराव पैदा करने का नहीं बल्कि अपनी 'रणनीतिक स्वायत्तता' (Strategic Autonomy) की रक्षा करने का है:
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कोई एकतरफा प्रतिबंध नहीं: भारत हमेशा से संयुक्त राष्ट्र (UN) के प्रतिबंधों का पालन करता रहा है, लेकिन किसी एक देश द्वारा अपनी संसद से थोपे गए एकतरफा प्रतिबंधों को स्वीकार नहीं करता।
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क्वाड और इंडो-पैसिफिक में भारत की अहमियत: वाशिंगटन इस बात से भली-भांति वाकिफ है कि एशिया और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन के मुकाबले भारत उसका सबसे अहम रणनीतिक साझीदार है। भारत पर 100% टैरिफ लगाने से दोनों देशों के बीच पिछले ढाई दशकों में बने रणनीतिक और व्यापारिक रिश्ते पटरी से उतर सकते हैं।
राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद अमेरिकी प्रशासन इस कानून को किस हद तक और किन छूटों (Waivers) के साथ लागू करता है, इस पर नई दिल्ली पैनी नजर बनाए हुए है। भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि अपनी घरेलू जनता को सस्ता ईंधन उपलब्ध कराना सरकार की पहली और गैर-परक्राम्य जिम्मेदारी है।