शेख हसीना के प्रत्यर्पण पर भारत का ढाका को दो-टूक जवाब, जानिए क्यों फूंक-फूंक कर कदम रख रही है बांग्लादेश की नई सरकार
भारत और बांग्लादेश के रिश्तों के बीच पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की भारत में मौजूदगी एक बार फिर सबसे बड़ा और संवेदनशील मुद्दा बन गई है। बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के बाद बनी नई सरकार लगातार भारत से शेख हसीना को सौंपने की औपचारिक मांग कर रही है। इस बीच, नई दिल्ली में भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) ने ढाका की ताजा मांग पर अपनी आधिकारिक स्थिति पूरी तरह स्पष्ट कर दी है। विदेश मंत्रालय के आधिकारिक प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने एक प्रेस ब्रीफिंग में दो-टूक कहा है कि बांग्लादेश से मिले प्रत्यर्पण अनुरोध को भारतीय पक्ष की तय और स्थापित कानूनी प्रक्रियाओं के तहत परखा और जांचा जा रहा है।
यह बयान ऐसे समय में आया है जब ढाका में भारतीय उच्चायुक्त दिनेश त्रिवेदी ने बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान से एक उच्चस्तरीय मुलाकात की। इस वार्ता के दौरान बांग्लादेशी पक्ष ने शेख हसीना को तुरंत ढाका भेजने की प्रक्रिया में तेजी लाने की उम्मीद जताई। हालांकि, भारत के संतुलित और संयमित बयान ने यह साफ कर दिया है कि नई दिल्ली किसी भी राजनीतिक जल्दबाजी या बाहरी दबाव में आकर कोई कदम नहीं उठाएगी। भारत का स्पष्ट मानना है कि किसी भी देश के साथ प्रत्यर्पण का मामला द्विपक्षीय संधियों, मानवाधिकार सिद्धांतों और सर्वोच्च न्यायिक मानकों पर आधारित होता है।
प्रत्यर्पण संधि की धाराएं और कानूनी पेच: क्यों आसान नहीं है शेख हसीना की वापसी?
भारत और बांग्लादेश के बीच साल 2013 में एक द्विपक्षीय प्रत्यर्पण संधि (Extradition Treaty) हुई थी, जिसमें साल 2016 में कुछ संशोधन भी किए गए थे। हालांकि इस संधि के तहत दोनों देश एक-दूसरे के अपराधियों का हस्तांतरण कर सकते हैं, लेकिन इसी समझौते में कई ऐसी सुरक्षात्मक धाराएं भी शामिल हैं जो किसी भी फैसले को बहुत जटिल बना देती हैं। संधि के नियमों के मुताबिक, यदि किसी आरोपी के खिलाफ लगे आरोप 'राजनीतिक स्वरूप' (Political Nature) के हों या फिर इस बात की आशंका हो कि आरोपी को निष्पक्ष अदालती प्रक्रिया (Fair Trial) का अवसर नहीं मिलेगा या उसकी जान को खतरा हो सकता है, तो शरण देने वाला देश प्रत्यर्पण की मांग को पूरी तरह खारिज या स्थगित कर सकता है।
बांग्लादेश के विशेष अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण (ICT) द्वारा शेख हसीना को उनकी अनुपस्थिति (in absentia) में सजा सुनाए जाने और ढाका में राजनीतिक माहौल के उग्र रहने के कारण भारत में कानूनी विश्लेषक मानते हैं कि यह मामला विशुद्ध रूप से राजनीतिक प्रतिशोध का रूप ले चुका है। भारतीय न्यायपालिका और विदेश मंत्रालय किसी भी व्यक्ति को सौंपने से पहले यह गहन समीक्षा करते हैं कि क्या वहां मानवाधिकारों का उल्लंघन हो सकता है। यही मुख्य वजह है कि कानूनी कसौटी पर परखे बिना शेख हसीना को बांग्लादेश के हवाले करना किसी भी तरह संभव नहीं दिखता।
आर्थिक निर्भरता और भौगोलिक सीमाएं: क्यों ढाका के लिए भारत से बिगाड़ना नामुमकिन है?
बांग्लादेश की मौजूदा सरकार भले ही घरेलू राजनीति और जन दबाव के चलते शेख हसीना के प्रत्यर्पण का मुद्दा बार-बार जोर-शोर से उठाए, लेकिन व्यावहारिक और कूटनीतिक मोर्चे पर ढाका कोई भी ऐसी गलती नहीं कर सकता जिससे भारत के साथ उसके रिश्ते पटरी से उतर जाएं। बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था और दैनिक जरूरतें काफी हद तक भारत पर निर्भर हैं। बिजली आपूर्ति, खाद्यान्न निर्यात, आवश्यक वस्तुओं की सप्लाय चेन, पेट्रोकेमिकल्स और पूर्वोत्तर राज्यों से होकर गुजरने वाले पारगमन (Transit) रास्तों के लिए बांग्लादेश को भारत के सहयोग की हर कदम पर सख्त जरूरत पड़ती है।
इसके अलावा, भारत-बांग्लादेश सीमा व्यापार और बिम्सटेक (BIMSTEC) जैसे क्षेत्रीय संगठनों के आर्थिक फ्रेमवर्क दोनों देशों के विकास से सीधे जुड़े हैं। भारत ने आगामी सितंबर में नई दिल्ली में आयोजित होने जा रहे ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन के आउटरीच सत्र के लिए बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान को आमंत्रित भी किया है। ऐसे में अगर ढाका शेख हसीना के मुद्दे को जरूरत से ज्यादा खींचता है या रणनीतिक आक्रामकता दिखाता है, तो इससे उसकी अपनी अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय साख को गंभीर झटका लग सकता है। यही कारण है कि बांग्लादेश की नई कमान उग्र बयानबाजी के बावजूद आधिकारिक बैठकों में संतुलित भाषा का इस्तेमाल कर रही है।
सुरक्षा और आतंकवाद पर साझा हित: प्रत्यर्पण से परे द्विपक्षीय एजेंडा
भारत और बांग्लादेश के रिश्ते केवल एक नेता की मौजूदगी या प्रत्यर्पण तक सीमित नहीं हैं। दोनों देश लंबे समय से सीमा पार आतंकवाद, मानव तस्करी, जाली नोटों के रैकेट और पूर्वोत्तर भारत में उग्रवाद को रोकने के लिए एक-दूसरे के साथ सुरक्षा एजेंसियों के स्तर पर गहरा सहयोग करते आए हैं। हाल ही में बांग्लादेशी छात्र नेता शरीफ उस्मान हादी की हत्या के संदिग्ध आरोपियों की पश्चिम बंगाल में गिरफ्तारी के बाद ढाका ने उनके प्रत्यर्पण की भी अपील की है। भारत ने इस मामले पर भी साफ किया है कि पुलिस और अदालती जांच जारी है और कानून अपना काम करेगा।
यह घटनाक्रम दिखाता है कि भारत कानून के शासन को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है। भारत ने बार-बार दोहराया है कि वह बांग्लादेश की जनता के साथ एक सकारात्मक, रचनात्मक और भविष्योन्मुखी (forward-looking) संबंध बनाए रखने का पक्षधर है। भारत के लिए बांग्लादेश की स्थिरता और वहां अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सर्वोपरि है। इसलिए, नई दिल्ली ने स्पष्ट कर दिया है कि दोनों देशों के बीच संबंधों को केवल एक संवेदनशील कानूनी मुद्दे के चश्मे से नहीं देखा जा सकता।
भविष्य की राह: भारत की तटस्थ कूटनीति और क्षेत्रीय स्थिरता का संतुलन
शेख हसीना का 5 अगस्त को नई दिल्ली से दिया गया वर्चुअल संबोधन और दिसंबर तक बांग्लादेश लौटने का उनका बयान भले ही ढाका में राजनीतिक हलचल पैदा कर रहा हो, लेकिन भारत की भूमिका इस पूरे घटनाक्रम में एक जिम्मेदार और तटस्थ पड़ोसी की रही है। भारत ने अपनी धरती का इस्तेमाल किसी भी देश के खिलाफ राजनीतिक अस्थिरता फैलाने के लिए नहीं होने देने की अपनी पुरानी नीति का हमेशा पालन किया है, साथ ही उन दोस्तों और नेताओं को शरण व सुरक्षा भी दी है जो संकट के समय भारत पर भरोसा करते हैं।
आने वाले हफ्तों में जब भारतीय विदेश मंत्रालय प्रत्यर्पण से जुड़े तमाम कानूनी और संवैधानिक पहलुओं की अंतिम रिपोर्ट तैयार करेगा, तब भी प्रक्रिया की पारदर्शिता और भारत के राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखा जाएगा। बांग्लादेश का नेतृत्व भी इस बात को भली-भांति समझता है कि उतावली में उठाया गया कोई भी अदूरदर्शी कदम दक्षिण एशिया की क्षेत्रीय शांति और दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंधों को नुकसान पहुंचा सकता है। यही कारण है कि ढाका और नई दिल्ली दोनों ही इस मुद्दे को सीधे टकराव के बजाय स्थापित राजनयिक और कानूनी चैनलों के माध्यम से सुलझाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।