"It’s done bro": देवेंद्र फडणवीस ने चीफ जस्टिस के अंदाज में प्रशांत भूषण को दिया तीखा जवाब
महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने वरिष्ठ वकील और सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत भूषण पर तीखा और चुटीला पलटवार किया है। मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण (SIR), ईवीएम की विश्वसनीयता और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही बहसों के बीच प्रशांत भूषण की याचिकाओं और सार्वजनिक बयानों पर फडणवीस ने मुख्य न्यायाधीश (CJI) की अदालती शैली को हथियार बनाते हुए निशाना साधा। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर फडणवीस का मात्र तीन शब्दों का तंज—"It’s done bro"—सामने आते ही वायरल हो गया और राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया।
क्या है 'It’s done bro' का संदर्भ? चीफ जस्टिस के रुख से जुड़ा कनेक्शन
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट में चुनाव प्रक्रिया और याचिकाओं की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने कई बार वकीलों द्वारा एक ही मुद्दे को बार-बार खींचने और बिना ठोस आधार के कानूनी प्रक्रिया को उलझाने पर सख्त रुख अपनाया था।
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अदालती आदेश और अंतिम फैसला: जब किसी मामले में अदालत अपना रुख स्पष्ट कर देती है या फैसला सुना चुकी होती है, तो बार-बार दलीलें दोहराने पर बेंच दो टूक कह देती है कि मामला निपट चुका है और अब आगे बढ़ने की जरूरत है।
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सोशल मीडिया मीम और अदालती मुहावरा: लीगल और सोशल मीडिया सर्किल में चीफ जस्टिस की इस त्वरित, स्पष्ट और सख्त संवाद शैली को लेकर 'It’s done' मुहावरा काफी लोकप्रिय हुआ था। फडणवीस ने इसी संदर्भ को उठाते हुए प्रशांत भूषण को याद दिलाया कि जब देश की शीर्ष अदालत और कानूनी प्रक्रिया इस विषय पर स्पष्टता दे चुकी है, तब भी पुराने घिसे-पिटे दावों को दोहराने का कोई औचित्य नहीं रह जाता।
हार की हताशा छिपाने के लिए अदालतों का चक्कर लगाने का आरोप
भाजपा नेताओं का कहना है कि विपक्ष और उनके सहयोगी वकील हर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को न्यायिक विवादों में घसीटने की आदत बना चुके हैं:
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चुनावी हार का ठीकरा संस्थाओं पर: फडणवीस के इस कटाक्ष के पीछे का मुख्य राजनीतिक संदेश यह है कि जब जनता चुनावों में जनादेश दे देती है, तो विपक्ष और उनके पैरोकार ईवीएम, वोटर लिस्ट और चुनाव आयोग की साख पर सवाल उठाने सुप्रीम कोर्ट पहुंच जाते हैं।
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समय और संसाधनों की बर्बादी: भाजपा का तर्क है कि अदालतें बार-बार याचिकाओं की मेरिट जांच चुकी हैं और स्पष्ट कर चुकी हैं कि बिना पुख्ता सबूतों के चुनावी प्रक्रियाओं पर अविश्वास नहीं जताया जा सकता। ऐसे में एक ही एजेंडे को बार-बार जिंदा करने की कोशिश केवल राजनीतिक प्रोपेगैंडा है।
सोशल मीडिया पर बंटे विचार, शुरू हुआ नया सियासी घमासान
फडणवीस के इस छोटे लेकिन चुभते हुए बयान के बाद डिजिटल स्पेस में बहस छिड़ गई है:
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भाजपा समर्थकों का रुख: पार्टी समर्थकों और सोशल मीडिया यूजर्स ने फडणवीस के इस अंदाज को 'परफेक्ट और सटीक जवाब' करार देते हुए कहा कि लगातार खारिज होने वाली जनहित याचिकाओं (PILs) को इसी भाषा में आईना दिखाया जाना चाहिए।
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विपक्षी खेमे की प्रतिक्रिया: वहीं दूसरी ओर विपक्षी नेताओं और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इस पर ऐतराज जताते हुए कहा कि संवैधानिक अधिकारों और वोटिंग प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर सवाल उठाना हर नागरिक और वकील का लोकतांत्रिक अधिकार है, जिसे इस तरह गैर-गंभीर बनाकर खारिज नहीं किया जाना चाहिए।