कर्नाटक HC ने X अकाउंट एडमिन के खिलाफ रद की FIR, पुलिस की मनमानी पर जारी की गाइडलाइन

कर्नाटक HC ने X अकाउंट एडमिन के खिलाफ रद की FIR, पुलिस की मनमानी पर जारी की गाइडलाइन

डिजिटल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सोशल मीडिया पर पुलिस की एकतरफा कार्रवाई को लेकर कर्नाटक उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक और नजीर पेश करने वाला फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में व्यवस्था दी है कि किसी सार्वजनिक घटना से जुड़ी प्रामाणिक खबर को सोशल मीडिया पर री-पोस्ट या साझा करना किसी भी सूरत में सांप्रदायिक वैमनस्य या नफरत फैलाने का अपराध नहीं माना जा सकता। जस्टिस एम. नागप्रसन्ना की एकल पीठ ने 'कर्नाटक पोर्टफोलियो' नामक लोकप्रिय एक्स (पूर्व में ट्विटर) हैंडल के एडमिन संदीप कुमार के विरुद्ध पुत्तूर पुलिस थाने में दर्ज आपराधिक प्राथमिकी को पूरी तरह निरस्त कर दिया। इसके साथ ही उच्च न्यायालय ने सोशल मीडिया पोस्ट्स को लेकर धड़ाधड़ आपराधिक मुकदमे ठोकने, एक ही घटना पर सिलसिलेवार कई एफआईआर दर्ज करने और पुलिस द्वारा अपनी असीमित शक्तियों के मनमाने इस्तेमाल पर गहरी चिंता जताते हुए राज्य पुलिस महानिदेशक (DGP) के लिए कड़े दिशा-निर्देश जारी किए हैं।

पुत्तूर में महिला के साथ हुई खौफनाक वारदात: थार सवार युवकों ने चाकू दिखाकर दी थी धमकी, उसी खबर को किया गया था रीपोस्ट

पूरा मामला दक्षिण कन्नड़ जिले के पुत्तूर का है, जहां छह युवकों ने एक संगठित गिरोह बनाकर अपनी थार एसयूवी से एक अकेली महिला का सड़क पर पीछा किया था और उसे खुलेआम चाकू दिखाकर जान से मारने की धमकियां दी थीं। यह कोई मनगढ़ंत या काल्पनिक अफवाह नहीं थी, बल्कि स्थानीय कानून-व्यवस्था की पोल खोलने वाली एक अत्यंत गंभीर और वास्तविक आपराधिक घटना थी। इस वारदात से जुड़ी मीडिया रिपोर्ट को 'कर्नाटक पोर्टफोलियो' के संचालक संदीप कुमार ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट से केवल री-पोस्ट करते हुए कानून-व्यवस्था की स्थिति पर सवाल उठाए थे। हालांकि स्थानीय पुलिस ने घटना के मूल आरोपियों पर सख्त कार्रवाई करने के बजाय खबर साझा करने वाले एडमिन के खिलाफ ही भारतीय दंड विधान की उन धाराओं में मुकदमा दर्ज कर दिया, जो विभिन्न धार्मिक या सामाजिक समुदायों के बीच दुश्मनी और नफरत भड़काने के लिए बनाई गई हैं। कुमार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गिरीश भारद्वाज ने हाई कोर्ट में याचिका दाखिल कर इस मनमानी कार्रवाई को सीधे चुनौती दी थी।

न किसी धर्म का नाम लिया, न अफवाह फैलाई: जस्टिस एम. नागप्रसन्ना ने पुलिसिया कार्रवाई की खोली पोल

याचिका पर विस्तृत सुनवाई के बाद जस्टिस एम. नागप्रसन्ना ने पुलिसिया रवैये पर सख्त ऐतराज जताया। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से रेखांकित किया कि याचिकाकर्ता ने जिस घटना का विवरण साझा किया था, वह समाज में घटित एक वास्तविक अपराध था। अदालत ने कहा कि छह युवकों द्वारा एक महिला का थार गाड़ी से पीछा कर उसे आतंकित करना बेहद संगीन अपराध था। याचिकाकर्ता ने केवल कानून-व्यवस्था की स्थिति को लेकर सवाल खड़े किए थे। अदालत ने केस रिकॉर्ड्स की जांच करते हुए पाया कि न तो मूल शिकायत में और न ही संदीप कुमार के सोशल मीडिया पोस्ट में किसी विशेष धार्मिक समुदाय, जाति या वर्ग का नाम तक लिया गया था। ऐसे में यह आरोप लगाना पूरी तरह बेबुनियाद है कि इस पोस्ट से दो समुदायों के बीच दंगा भड़काने या सांप्रदायिक नफरत फैलाने की कोई दुर्भावनापूर्ण मंशा थी। सुप्रीम कोर्ट के कई पुराने ऐतिहासिक फैसलों का हवाला देते हुए पीठ ने दोहराया कि धारा 153A जैसे सांप्रदायिक अपराधों के लिए दुर्भावना और समूहों के बीच दुश्मनी पैदा करने का स्पष्ट इरादा (Mens Rea) साबित होना अनिवार्य है, जो इस मामले में सिरे से नदारद था।

एक घटना पर दर्ज की गई थीं 7 एफआईआर: कोर्ट ने डीजीपी को दिए जांच और गिरफ्तारी के सख्त निर्देश

सुनवाई के दौरान अदालत तब हैरान रह गई जब उसे पता चला कि पुत्तूर पुलिस स्टेशन में इसी एक घटना को लेकर सात अलग-अलग एफआईआर दर्ज कर ली गई थीं। अदालत ने इसे पुलिसिया शक्तियों का खुला दुरुपयोग करार दिया और कहा कि केवल इसलिए नए मामले दर्ज नहीं किए जाने चाहिए क्योंकि शिकायतकर्ता अलग-अलग हैं, जब तक कि हर शिकायत में कोई बिल्कुल नया और स्वतंत्र अपराध सामने न आए। हाई कोर्ट ने कर्नाटक के पुलिस महानिदेशक और पुलिस महानिरीक्षक (DGP & IGP) को निर्देश दिया कि वे सोशल मीडिया से जुड़े मामलों में पुलिस अधिकारियों के लिए एक अनिवार्य चेकलिस्ट लागू करें। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी सोशल मीडिया पोस्ट पर एफआईआर दर्ज करने से पहले पुलिस को कानूनी रूप से यह जांचना होगा कि क्या अपराध के अनिवार्य तत्व मौजूद हैं या नहीं। इसके साथ ही अदालत ने यह भी दो टूक कहा कि आपराधिक मामला दर्ज होने का मतलब यह कतई नहीं है कि व्यक्ति को तुरंत गिरफ्तार कर लिया जाए। पुलिस को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 35 के तहत दिए गए गिरफ्तारी सुरक्षा उपायों और कानूनी नोटिस का अनिवार्य रूप से पालन करना होगा।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर ऐतिहासिक मुहर: पुत्तूर पुलिस की एफआईआर रद, नागरिकों को मिला बड़ा संबल

संदीप कुमार के खिलाफ दर्ज एफआईआर को निरस्त करते हुए कर्नाटक हाई कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत नागरिकों को मिले अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा पर विशेष बल दिया। अदालत ने साफ कर दिया कि सत्ता या प्रशासन की खामियों को उजागर करना और आपराधिक घटनाओं पर सार्वजनिक मंचों पर चर्चा करना किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की आत्मा है, जिसे पुलिस की लाठी या कानूनी मुकदमों के डर से कुचला नहीं जा सकता। हाई कोर्ट का यह फैसला उन तमाम पत्रकारों, डिजिटल क्रिएटर्स और सोशल मीडिया यूजर्स के लिए एक बड़ी राहत और कानूनी ढाल बनकर उभरा है, जिन्हें अक्सर वास्तविक खबरें या जनसरोकार के मुद्दे उठाने पर स्थानीय प्रशासन द्वारा दर्ज झूठी प्राथमिकियों और कानूनी प्रताड़ना का सामना करना पड़ता है।