एशियन पैरा गेम्स में सुमित अंतिल का गोल्डन थ्रो, गांव में मना जश्न
जापान के आइची-नागोया शहर में आयोजित पैरा एशियाई खेलों में हरियाणा के गबरू जवानों ने एक बार फिर पूरी दुनिया में भारत के पराक्रम का परचम लहरा दिया है। सोनीपत जनपद के गांव खेवड़ा के स्टार पैरा भाला फेंक (जैवलिन थ्रो) एथलीट सुमित अंतिल ने अपने फौलादी इरादों के दम पर एक और स्वर्णिम अध्याय इतिहास के पन्नों में दर्ज कर दिया है। सुमित ने पुरुषों की एफ64 भाला फेंक स्पर्धा में 72.46 मीटर की अविश्वसनीय दूरी तक भाला फेंककर न केवल पहला स्थान हासिल किया, बल्कि देश की झोली में चमचमाता स्वर्ण पदक भी डाल दिया। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार दूसरी बार एशियन पैरा गेम्स का गोल्ड मेडल जीतने वाले सुमित की इस ऐतिहासिक जीत की खबर मिलते ही उनके पैतृक गांव खेवड़ा में ढोल-नगाड़ों की थाप पर जश्न शुरू हो गया और मिठाइयां बांटी जाने लगीं। यह कामयाबी केवल एक पदक की चमक भर नहीं है, बल्कि उस अदम्य साहस की जीती-जागती मिसाल है जिसने एक भीषण सड़क दुर्घटना में पैर कट जाने के बावजूद कभी जिंदगी के आगे घुटने नहीं टेके।
72.46 मीटर दूर भाला फेंककर जीता सोना: टोक्यो और पेरिस के बाद जापान में भी कायम रखी बादशाहत
आइची-नागोया के ट्रैक एंड फील्ड स्टेडियम में जब सुमित अंतिल अपने कृत्रिम पैर (प्रोस्थेटिक लेग) के सहारे रन-अप ट्रैक पर उतरे, तो पूरा स्टेडियम भारत माता के जयकारों से गूंज उठा। सुमित ने शुरुआत से ही अपनी लय और तकनीक पर पूरा नियंत्रण बनाए रखा और 72.46 मीटर का शानदार थ्रो फेंककर शीर्ष स्थान पर कब्जा जमा लिया। यह पैरा एशियाई खेलों के इतिहास में सुमित का लगातार दूसरा गोल्ड मेडल है। इससे पहले उन्होंने वर्ष 2023 में चीन के हांगझू में आयोजित एशियाई पैरा खेलों के दौरान 73.29 मीटर के थ्रो के साथ विश्व रिकॉर्ड बनाते हुए स्वर्ण पदक जीता था। इसके बाद उन्होंने इसी साल मई महीने में अपने ही कीर्तिमान को ध्वस्त करते हुए 74.82 मीटर का एक और नया वर्ल्ड रिकॉर्ड स्थापित किया था। टोक्यो पैरालंपिक और पेरिस पैरालंपिक में बैक-टू-बैक गोल्ड मेडल जीतने वाले सुमित अंतिल ने जापान की धरती पर एक बार फिर यह साबित कर दिखाया कि आधुनिक पैरा जैवलिन थ्रो की दुनिया में उनका कोई दूसरा सानी नहीं है।
बचपन में उठा पिता का साया, 2015 के भीषण हादसे ने छीना बायां पैर: मां से किया वादा निभाया
सुमित अंतिल का जन्म 7 जून 1998 को सोनीपत के खेवड़ा गांव में हुआ था। जब सुमित महज सात साल के थे, तभी भारतीय वायुसेना में सेवारत उनके पिता रामकुमार का गंभीर बीमारी के चलते असामयिक निधन हो गया था। पिता की छत्रछाया छिन जाने के बाद उनकी मां निर्मला देवी ने अकेले ही चारों बच्चों की परवरिश का भारी जिम्मा अपने कंधों पर उठाया। सुमित अपनी तीन बड़ी बहनों रेनू, सुशीला और किरण के सबसे लाडले और परिवार के इकलौते बेटे थे। परिवार अभी संभल ही रहा था कि 5 जनवरी 2015 की शाम को एक खौफनाक हादसे ने सब कुछ तहस-नहस कर दिया। उस समय सुमित 12वीं कक्षा में कॉमर्स की पढ़ाई कर रहे थे और ट्यूशन पढ़कर बाइक से घर लौट रहे थे। रास्ते में सीमेंट की बोरियों से लदी एक बेकाबू ट्रैक्टर-ट्रॉली ने उनकी बाइक को जोरदार टक्कर मार दी और उन्हें सड़क पर काफी दूर तक घसीटते हुए ले गई। अस्पताल में डॉक्टरों को उनकी जान बचाने के लिए घुटने के नीचे से उनका बायां पैर काटना पड़ा। इस हृदयविदारक हादसे से जब मां निर्मला देवी फूट-फूटकर रोने लगीं, तब अस्पताल के बिस्तर पर लेटे 17 साल के सुमित ने मुस्कुराते हुए अपनी मां के आंसू पोंछे और कहा था कि मां रो मत, जो दो पैर वाला इंसान तुझे सुख नहीं दे पाएगा, मैं तुझे उससे ज्यादा सुख और मान-सम्मान दूंगा।
पूना से लगा कृत्रिम पैर और साईं सेंटर से शुरू हुआ नया सफर: कोच विरेंद्र धनखड़ और नवल सिंह ने तराशा
हादसे के बाद लगभग एक साल तक सुमित बिस्तर पर रहे, लेकिन उनके अंदर का खिलाड़ी कभी मायूस नहीं हुआ। वर्ष 2016 में परिवार ने पुणे जाकर उनके बाएं पैर में कृत्रिम पैर लगवाया। इसके बाद दोस्तों और रिश्तेदारों के प्रोत्साहन से सुमित ने खेल मैदान की तरफ दोबारा कदम बढ़ाए और भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) के सोनीपत सेंटर पहुंचे। शारीरिक कद-काठी मजबूत होने के कारण उन्होंने शुरुआत में अखाड़े में कुश्ती के दांव-पेंच आजमाए, लेकिन कृत्रिम पैर के कारण मैट पर संतुलन बनाना कठिन हो रहा था। इसी दौरान एशियन गेम्स के रजत पदक विजेता कोच विरेंद्र धनखड़ की नजर सुमित की बाजू की ताकत और लंबे कद पर पड़ी। कोच धनखड़ ने उन्हें जैवलिन थ्रो में हाथ आजमाने की सलाह दी और उन्हें लेकर दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम पहुंचे। वहां द्रोणाचार्य अवार्डी प्रख्यात कोच नवल सिंह ने सुमित के हाथ में भाला थमाया और उन्हें आधुनिक थ्रोइंग तकनीक के गुर सिखाए।
2018 में पांचवीं रैंक से शुरू होकर 2026 तक गोल्ड का सिलसिला: युवाओं के लिए बने प्रेरणापुंज
सुमित अंतिल ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना पहला बड़ा कदम वर्ष 2018 में एशियन चैंपियनशिप के दौरान रखा था, जहां कड़े मुकाबले में उन्हें पांचवें स्थान से ही संतोष करना पड़ा था। इस शुरुआती हार ने उनके इरादों को और अधिक फौलादी बना दिया। दिन-रात बहाए गए पसीने का नतीजा यह निकला कि वर्ष 2019 की विश्व पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप में सुमित ने शानदार थ्रो के साथ रजत पदक जीतकर अंतरराष्ट्रीय खेल जगत को अपनी दस्तक दे दी। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। टोक्यो पैरालंपिक का गोल्ड, पेरिस पैरालंपिक का गोल्ड, वर्ल्ड रिकॉर्ड्स की झड़ी और अब पांचवें एशियन पैरा गेम्स 2026 में लगातार दूसरा स्वर्ण पदक जीतकर उन्होंने सफलता की एक ऐसी इबारत लिख दी है जिसे मिटाना नामुमकिन है। मां निर्मला देवी को दिया गया वह वादा आज पूरी तरह सच साबित हो चुका है। सुमित की यह गौरवमयी यात्रा देश के उन करोड़ों युवाओं के लिए सबसे बड़ा सबक है, जो किसी भी शारीरिक या मानसिक परेशानी के आगे हिम्मत हार जाते हैं।