हादसे में गंवाया था हाथ, पर नहीं टूटने दी हिम्मत: Asian Para Games में चमके सिरसा के प्रमोद बिजारणिया

हादसे में गंवाया था हाथ, पर नहीं टूटने दी हिम्मत: Asian Para Games में चमके सिरसा के प्रमोद बिजारणिया

जीवन में अप्रत्याशित संकट और गंभीर शारीरिक आघात कई बार इंसान के हौसले को पूरी तरह तोड़ देते हैं, लेकिन कुछ साहसी योद्धा ऐसे होते हैं जो नियति के हर प्रहार को अपनी कामयाबी की सीढ़ी बना लेते हैं। हरियाणा के सिरसा जिले के रहने वाले जांबाज पैरा एथलीट प्रमोद बिजारणिया ने कुछ ऐसा ही करिश्मा अंतरराष्ट्रीय खेल मंच पर दोहराया है। जापान के प्रमुख शहर आइची-नागोया में आयोजित हो रहे पांचवें एशियन पैरा गेम्स 2026 में प्रमोद ने अपनी असाधारण गति, धीरज और अदम्य साहस का परिचय देते हुए पुरुषों की 1500 मीटर टी-46 स्पर्धा में ऐतिहासिक रजत पदक अपने नाम कर लिया है। एक भयावह कृषि हादसे में अपना दाहिना हाथ गंवाने के बावजूद प्रमोद ने कभी अपनी बेबसी पर आंसू नहीं बहाए, बल्कि ट्रैक पर दौड़ते हुए भारत का तिरंगा एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय क्षितिज पर लहराया है। इस शानदार उपलब्धि की खबर जैसे ही सिरसा पहुंची, खिलाड़ी के पैतृक गांव और पूरे इलाके में जश्न का माहौल छा गया।

चार मिनट नौ सेकंड में पूरी की दौड़: एशियन पैरा गेम्स में लगातार दूसरा रजत पदक जीतकर बनाया रिकॉर्ड

जापान के आइची-नागोया में आयोजित ट्रैक एंड फील्ड प्रतिस्पर्धा में प्रमोद बिजारणिया की भिड़ंत एशिया भर के दिग्गज और अनुभवी धावकों से थी। 1500 मीटर टी-46 श्रेणी की इस रोमांचक और सांसें रोक देने वाली दौड़ में प्रमोद ने शुरुआत से ही अपनी गति और संतुलन का शानदार तालमेल बनाए रखा। उन्होंने निर्धारित दूरी को महज चार मिनट नौ सेकंड (4:09 मिनट) में पूरा करके दूसरा स्थान हासिल किया और शानदार सिल्वर मेडल अपनी झोली में डाल लिया। इस स्पर्धा में स्वर्ण पदक विजेता एथलीट ने चार मिनट तीन सेकंड का समय निकालकर पहला स्थान पाया। अंतरराष्ट्रीय पटल पर प्रमोद का यह कोई पहला कमाल नहीं है, बल्कि एशियाई पैरा खेलों में यह उनका लगातार दूसरा रजत पदक है। इससे पहले उन्होंने वर्ष 2023 में चीन के हांगझू शहर में आयोजित चौथे पैरा एशियाई खेलों में भी इसी 1500 मीटर टी-46 स्पर्धा में भारत के लिए रजत पदक जीतकर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया था। लगातार दो संस्करणों में पदक जीतना उनकी निरंतरता और उच्चस्तरीय फिटनेस को साबित करता है।

2014 के दिल दहला देने वाले हादसे ने छीना था दाहिना हाथ: चार साल के संघर्ष के बाद ट्रैक पर रखा कदम

प्रमोद के इस स्वर्णिम सफर की शुरुआत एक अत्यंत दर्दनाक त्रासदी से हुई थी। वर्ष 2014 में घर में खेती-किसानी के काम के दौरान चारा काटने वाली मशीन (कुट्टी मशीन) की चपेट में आने से एक पल में उनका दाहिना हाथ कटकर अलग हो गया था। इस भीषण हादसे ने उनके जीवन को पूरी तरह बदलकर रख दिया था। शारीरिक अक्षमता और मानसिक अवसाद के उस सबसे अंधेरे दौर से उबरने में उन्हें करीब चार साल का लंबा वक्त लगा। खुद को निराशा के भंवर से निकालते हुए प्रमोद ने वर्ष 2018 में पैरा एथलेटिक्स की राह चुनी और ट्रैक पर पसीना बहाना शुरू किया। इसके बाद अपनी तकनीक को तराशने के लिए वह वर्ष 2021 से हिसार स्थित प्रतिष्ठित हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय (HAU) के आधुनिक स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स 'गिरी सेंटर' में पहुंचे, जहां पेशेवर कोचों की देखरेख में उन्होंने अपनी रनिंग स्टाइल, स्टैमिना और सांस नियंत्रण पर दिन-रात कड़ी मेहनत की।

परिवार बना सबसे बड़ी ढाल: एथलीट पत्नी से मिला मार्गदर्शन और भाई ने अभ्यास में दिया साथ

प्रमोद बिजारणिया अपनी इस अभूतपूर्व सफलता का सबसे बड़ा श्रेय अपने परिवार के अटूट विश्वास और त्याग को देते हैं। उन्होंने बताया कि पिता राममूर्ति और मां भारता देवी ने हादसे के बाद उन्हें कभी भी खुद को असहाय महसूस नहीं करने दिया। परिवार के हर सदस्य ने उनके भीतर खेल के प्रति जुनून को जिंदा रखा। प्रमोद के छोटे भाई नरेंद्र खुद हिसार में रहकर अभ्यास के दौरान उनकी हर छोटी-बड़ी जरूरतों का ध्यान रखते हैं और एक मजबूत सपोर्ट सिस्टम की तरह साथ खड़े रहते हैं। इसके अलावा, प्रमोद की पत्नी अरुणा सैनी स्वयं एक कुशल एथलीट रह चुकी हैं, जिसके चलते वह खेल की बारीकियों, चोट प्रबंधन और मानसिक दबाव को बखूबी समझती हैं। अरुणा लगातार प्रमोद को अपनी टाइमिंग सुधारने और मैदान पर अपना सर्वश्रेष्ठ देने के लिए तकनीकी व मानसिक मार्गदर्शन देती रहती हैं। परिवार के इस साझा प्रयास ने प्रमोद को हर चुनौती से लड़ने की असीम ऊर्जा प्रदान की।

अब 2027 की वर्ल्ड चैंपियनशिप में गोल्ड पर निशाना: वैश्विक खिताब के लिए शुरू होगी नई तपस्या

एशियन पैरा गेम्स 2026 में देश का मान बढ़ाने के बाद प्रमोद बिजारणिया रुकने वाले नहीं हैं, बल्कि उनकी नजरें अब और बड़े वैश्विक लक्ष्य पर टिक गई हैं। पदक जीतने के बाद उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका अगला और सबसे प्रमुख लक्ष्य जून 2027 में होने वाली विश्व पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप (World Para Athletics Championship) है। उनका संकल्प है कि वे आगामी महीनों में अपने अभ्यास की गति को और अधिक धार देंगे ताकि चार मिनट नौ सेकंड के अपने मौजूदा समय को और कम किया जा सके। प्रमोद का सपना है कि वे 2027 में होने वाली इस विश्व चैंपियनशिप में पोडियम के शीर्ष पर खड़े होकर राष्ट्रगान की धुन के साथ भारत के लिए स्वर्ण पदक जीतें। सिरसा से निकलकर जापान के ट्रैक पर इतिहास रचने वाले प्रमोद बिजारणिया की यह प्रेरक कहानी आज देश के करोड़ों युवाओं और दिव्यांगजनों को यह संदेश दे रही है कि यदि हौसला बुलंद हो, तो जीवन की कोई भी बाधा आपको अपनी मंजिल तक पहुंचने से नहीं रोक सकती।