Asian Para Games: आंखों में नहीं थी रोशनी, पर पिता बने ढाल; UK में खुद खाना बनाकर की बेटे की सेवा
दृढ़ इच्छाशक्ति, परिवार का अटूट विश्वास और असीम समर्पण जब एक साथ मिलते हैं, तो असंभव लगने वाली मंजिलें भी कदमों में झुक जाती हैं। इस बात को हरियाणा के रोहतक स्थित गांव बोहर के युवा दृष्टिबाधित पैरा तैराक हिमांशु नांदल ने वैश्विक मंच पर सच साबित कर दिखाया है। जीवन के शुरुआती दौर से ही आंखों की रोशनी न होने के बावजूद हिमांशु ने अपनी शारीरिक बाधा को कभी अपने सपनों की दीवार नहीं बनने दिया। एशियाई पैरा खेलों (Asian Para Games) के कड़े मुकाबले में हिमांशु ने असाधारण प्रतिभा, एकाग्रता और गति का प्रदर्शन करते हुए भारत की झोली में एक-दो नहीं, बल्कि तीन-तीन ऐतिहासिक पदक डालकर तिरंगे का मान पूरी दुनिया में बढ़ाया है। इस बेमिसाल कामयाबी की गूंज आज पूरे देश में सुनाई दे रही है, लेकिन इस चमकते सफर की असली बुनियाद उनके माता-पिता के बेमिसाल त्याग, संघर्ष और आंसुओं से सिंची गई है।
तीन महीने की उम्र में खो दी थी आंखों की रोशनी: समाज के तानों को दरकिनार कर परिवार ने थामी उंगली
हिमांशु के जीवन का सफर बचपन से ही चुनौतियों और संघर्षों से भरा रहा। उनके पिता बलवान नांदल ने बताया कि हिमांशु जब महज तीन महीने के थे, तभी परिवार को उनकी आंखों में गंभीर विकार और देखने में असमर्थता का पता चला था। माता-पिता ने डॉक्टरों के अनगिनत चक्कर काटे और हर संभव उन्नत चिकित्सा उपचार कराने का प्रयास किया, लेकिन तमाम कोशिशों के बाद भी हिमांशु की आंखों में रोशनी नहीं लौट सकी। ऐसे समय में जब समाज और आसपास के लोग दिव्यांगता को एक अभिशाप मानकर बच्चे को कमजोर समझने लगते हैं, तब पिता बलवान और मां कविता ने अपने कलेजे के टुकड़े को कभी बेसहारा महसूस नहीं होने दिया। परिवार ने तय किया कि वे हिमांशु को किसी पर आश्रित रहने के बजाय एक ऐसा मुकाम दिलाएंगे, जहां पूरी दुनिया उनके हुनर पर गर्व करेगी। माता-पिता का यही अटूट भरोसा हिमांशु की सबसे बड़ी ढाल बन गया।
पैरा जूडो से पैरा स्विमिंग तक का सफर: पिता ने खुद कोच बनकर सिखाई पानी को चीरने की कला
खुद एक खिलाड़ी रहे बलवान नांदल ने अपने बेटे को खेलों की दुनिया में आगे बढ़ाने का संकल्प लिया। साल 2015 में उन्होंने हिमांशु को पैरा जूडो से जोड़ा, जहां उन्होंने अपने दांव-पेंच का हुनर आजमाया। हालांकि, कुछ समय बाद मेडिकल क्लासिफिकेशन और तकनीकी वर्गीकरण संबंधी गंभीर अड़चनों के कारण हिमांशु को पैरा जूडो से दूरी बनानी पड़ी। खेल छूटने से हिमांशु निराश जरूर हुए, लेकिन पिता ने हार नहीं मानी। इसके बाद वर्ष 2021 में परिवार ने एक साहसिक फैसला लेते हुए हिमांशु को पैरा स्विमिंग (तैराकी) के ट्रैक पर उतारा। शुरुआत में पिता बलवान ने खुद एक समर्पित कोच की भूमिका निभाई और अपने बेटे को पानी की लहरों के बीच सुरक्षित तैरने की बुनियादी तकनीक सिखाई। आंखों में रोशनी न होने की वजह से पानी के भीतर दिशा का सटीक अंदाजा लगाना बेहद चुनौतीपूर्ण काम था। अभ्यास के दौरान हिमांशु कई बार संतुलन खोकर स्विमिंग पूल की कंक्रीट की दीवारों से टकरा जाते थे और गंभीर रूप से चोटिल हो जाते थे। कई बार उनके सिर और कंधों पर चोटें आईं, लेकिन पिता ने उन्हें कभी भयभीत होकर कदम पीछे खींचने नहीं दिया, बल्कि हर चोट के बाद और अधिक मजबूती से पानी में उतरने का हौसला दिया।
2023 की नाकामी से लिया सबक: ढाई महीने यूके में बहाया पसीना, पिता ने रसोइया बनकर संभाली डाइट
हिमांशु ने साल 2023 के एशियाई पैरा खेलों में भी देश का प्रतिनिधित्व किया था, लेकिन कड़े अंतरराष्ट्रीय मुकाबले के चलते वे पदक जीतने से चूक गए थे। उस असफलता ने उन्हें तोड़ा नहीं, बल्कि उनके भीतर पदक जीतने की भूख को कई गुना बढ़ा दिया। आगामी प्रतियोगिताओं में विश्व स्तरीय प्रदर्शन सुनिश्चित करने के लिए हिमांशु ने करीब ढाई महीने यूनाइटेड किंगडम (UK) में रहकर विदेशी कोचों की देखरेख में बेहद कड़ा और आधुनिक प्रशिक्षण लिया। इस दौरान पिता बलवान साए की तरह अपने बेटे के साथ विदेश में डटे रहे। हिमांशु के कठोर अभ्यास में पोषण और खानपान की कोई कमी न रह जाए, इसके लिए पिता बलवान ने यूके में खुद एक रसोइए की भूमिका निभाई। वे रोजाना खुद अपने हाथों से हिमांशु की पसंदीदा और उच्च-प्रोटीन डाइट तैयार करते थे ताकि अभ्यास और डाइट का संतुलन एक पल के लिए भी न बिगड़े। पिता का यह समर्पण हिमांशु के लिए प्रेरणा का सबसे बड़ा स्रोत बना और वे पूल में हर दिन अपनी टाइमिंग सुधारते चले गए।
Asian Para Games में 3 पदक जीतकर देश का नाम किया रोशन: रोहतक के गांव बोहर में जश्न का माहौल
पिता की तपस्या और हिमांशु की वर्षों की हाड़-तोड़ मेहनत आखिरकार रंग लाई। एशियन पैरा गेम्स में दुनिया भर के शीर्ष दृष्टिबाधित तैराकों को कड़ी टक्कर देते हुए हिमांशु ने तीन स्पर्धाओं में पोडियम फिनिश हासिल कर तीन पदक अपने नाम किए। जैसे ही यह ऐतिहासिक खबर हिमांशु के गृह जनपद रोहतक और उनके पैतृक गांव बोहर पहुंची, पूरे इलाके में खुशी की लहर दौड़ गई। ग्रामीणों ने ढोल-नगाड़ों और मिठाइयों के साथ इस गौरवशाली पल का जश्न मनाया। खेल प्रेमियों का कहना है कि हिमांशु की यह अविश्वसनीय जीत देश के उन लाखों दिव्यांग युवाओं के लिए एक मशाल की तरह है, जो किसी भी शारीरिक कमी के कारण अपनी उम्मीदें छोड़ देते हैं। हिमांशु ने साबित कर दिया कि यदि हौसले बुलंद हों और परिवार का साथ हो, तो बिना आंखों की रोशनी के भी सपनों में रंग भरे जा सकते हैं।