परिसीमन बिल पर विशेष सत्र बुलाने की तैयारी में मोदी सरकार? कांग्रेस हुई अलर्ट, खरगे ने PM को लिखी चिट्ठी; समझिए संसद में बहुमत और 2/3 वोटिंग का पूरा अंकगणित

परिसीमन बिल पर विशेष सत्र बुलाने की तैयारी में मोदी सरकार? कांग्रेस हुई अलर्ट, खरगे ने PM को लिखी चिट्ठी; समझिए संसद में बहुमत और 2/3 वोटिंग का पूरा अंकगणित

संसद का मानसून सत्र समाप्त होने के बावजूद दोनों सदनों का औपचारिक सत्रावसान (Prorogation) न किए जाने और केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री के हालिया बयानों के बाद देश की सियासी फिजां में एक नए 'विशेष सत्र' की सुगबुगाहट तेज हो गई है। चर्चा है कि केंद्र सरकार देश में लोकसभा सीटों के पुनर्गठन और 850 सीटों के विस्तार से जुड़े बहुचर्चित 'परिसीमन विधेयक 2026' और 131वें संविधान संशोधन बिल को पारित कराने के लिए जल्द ही संसद का विशेष सत्र बुला सकती है। इन अटकलों ने मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस और समूचे 'INDIA' गठबंधन के कान खड़े कर दिए हैं। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र लिखकर सरकार की मंशा पर चिंता जताई है और किसी भी विधायी कदम से पहले सभी मुख्यमंत्रियों और राजनीतिक दलों की सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग की है। इस पूरे घटनाक्रम ने संसद के दोनों सदनों में संविधान संशोधन के लिए आवश्यक 'विशेष बहुमत' के जटिल अंकगणित को एक बार फिर बहस के केंद्र में ला दिया है।

खरगे ने पीएम मोदी को लिखा पत्र: 'जल्दबाजी में न लाएं बिल, पहले बुलाएं सर्वदलीय बैठक'

कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे अपने पत्र में परिसीमन से जुड़ी केंद्र सरकार की रणनीतियों पर खुलकर सवाल उठाए हैं। खरगे ने अपने पत्र में 16 जुलाई को लिखे पिछले पत्र का संदर्भ देते हुए कहा कि केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री के एक हालिया टीवी इंटरव्यू से यह स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं कि सरकार परिसीमन से संबंधित नए मसौदे को पास कराने के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाने पर विचार कर रही है।

खरगे ने तर्क दिया कि मानसून सत्र की अनिश्चितकालीन समाप्ति के बाद भी सत्र का विधिवत सत्रावसान न करना सरकार की किसी गुप्त विधायी योजना की ओर इशारा करता है। कांग्रेस अध्यक्ष ने मांग की कि सरकार जो भी मसौदा तैयार कर रही है, उसे संसद में पेश करने से पहले सभी विपक्षी दलों को उसके विस्तृत अध्ययन के लिए पर्याप्त समय दिया जाए। उन्होंने प्रधानमंत्री से आग्रह किया कि देश के संघीय ढांचे और राज्यों के हितों को प्रभावित करने वाले इस संवेदनशील विषय पर आम सहमति बनाने के लिए सभी दलों और राज्य सरकारों की एक उच्चस्तरीय सर्वदलीय बैठक बुलाई जाए।

25 साल तक 543 सीटों पर ही रहे फ्रीज: कांग्रेस और दक्षिण भारत का साझा रुख

परिसीमन के मुद्दे पर कांग्रेस ने अपनी आधिकारिक नीति को पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है। खरगे ने पत्र में रेखांकित किया कि कांग्रेस पार्टी का स्पष्ट रुख है कि लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों की संख्या को अगले 25 वर्षों के लिए फ्रीज (यथावत) रखा जाना चाहिए। पार्टी ने मांग की है कि 2029 के आगामी लोकसभा चुनाव में 106वें संविधान संशोधन के तहत पारित 33 प्रतिशत महिला आरक्षण (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) को इन्हीं मौजूदा 543 सीटों के भीतर ही तत्काल प्रभाव से लागू किया जाए।

इस रुख को दक्षिण भारत के राज्यों से व्यापक समर्थन मिल रहा है। केरल, कर्नाटक और तेलंगाना की कांग्रेस सरकारों के अलावा तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ 'थलपति' विजय ने भी इस पर सहमति जताते हुए केंद्रीय गृह मंत्री के समक्ष संयुक्त आवाज उठाई है। दक्षिणी राज्यों का तर्क है कि जिन राज्यों ने पिछले पांच दशकों में राष्ट्रीय जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रमों को निष्ठा से लागू किया है, उन्हें आबादी के आधार पर सीटें घटाकर लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सजा नहीं दी जा सकती। यदि केवल जनसंख्या को आधार बनाकर सीटें 850 की गईं, तो उत्तर भारत का दबदबा अत्यधिक बढ़ जाएगा और दक्षिण भारत की राजनीतिक आवाज कमजोर पड़ जाएगी।

अनुच्छेद 368 का विशेष बहुमत: सरकार के लिए क्यों आसान नहीं है राह?

परिसीमन और लोकसभा की सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 850 करने के लिए सरकार को संविधान के अनुच्छेद 81, 82 और 170 में संशोधन करना होगा। इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत 'विशेष बहुमत' (Special Majority) की आवश्यकता होती है। इसका मतलब है:

  1. सदन की कुल सदस्य संख्या का पूर्ण बहुमत (50% से अधिक)।

  2. सदन में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों (Present and Voting) का कम से कम दो-तिहाई (2/3rd) समर्थन।

यह अनिवार्य शर्त दोनों सदनों में अलग-अलग पूरी होनी जरूरी है, जिससे सत्ताधारी गठबंधन के लिए फ्लोर मैनेजमेंट एक बेहद कठिन चुनौती बन जाता है।

लोकसभा का समीकरण: 66 से 67 वोटों की कमी से जूझ रहा एनडीए

लोकसभा की वर्तमान स्थिति पर नजर डालें तो सदन की कुल प्रभावी संख्या 543 से 545 के करीब है। पूर्ण उपस्थिति की स्थिति में किसी भी संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए कम से कम 360 से 362 सांसदों के समर्थन की आवश्यकता होगी।

  • एनडीए की ताकत: सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के पास भाजपा के 240 सांसदों सहित कुल करीब 293 से 294 सांसद हैं।

  • जरूरी जादुई आंकड़ा: दो-तिहाई बहुमत के लिए 360 का आंकड़ा चाहिए।

  • कमी (Deficit): एनडीए वर्तमान में पूर्ण उपस्थिति के आधार पर 66 से 67 वोटों की भारी कमी का सामना कर रहा है।

  • विपक्षी 'INDIA' ब्लॉक: कांग्रेस (100), सपा (37), टीएमसी (28), डीएमके (22) समेत विपक्षी गठबंधन के पास करीब 231 से 234 सांसद हैं।

यदि विपक्षी दल एकजुट होकर व्हिप जारी करते हैं और मतदान में 100% भागीदारी सुनिश्चित करते हैं, तो सरकार के लिए लोकसभा में अपने दम पर या छोटे तटस्थ दलों के सहारे इस दो-तिहाई के आंकड़े को छूना गणितीय रूप से असंभव है।

राज्यसभा का गणित: 244 सदस्यों के बीच 22-23 मतों का फासला

उच्च सदन यानी राज्यसभा में भी राह पूरी तरह निष्कंटक नहीं है। राज्यसभा की कुल 244-245 की प्रभावी सदस्य संख्या में दो-तिहाई बहुमत के लिए कम से कम 163 से 164 वोटों की दरकार होती है।

  • एनडीए की मौजूदा ताकत: मनोनीत और समर्थक सांसदों को मिलाकर एनडीए के पास लगभग 141 सदस्य हैं।

  • कमी (Gap): एनडीए को दो-तिहाई बहुमत के लिए 22 से 23 अतिरिक्त मतों की आवश्यकता होगी।

  • तटस्थ व क्षेत्रीय दल: वाईएसआरसीपी, बीजेडी और बीआरएस जैसे दल राज्यसभा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। हालांकि, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों के स्थानीय हितों को देखते हुए इन दलों के लिए भी परिसीमन के पक्ष में खुलकर वोट देना आसान नहीं होगा।

राजनीतिक तोड़-फोड़ और 'वॉकआउट' की रणनीति पर टिकी नजरें

विधायी विश्लेषकों का मानना है कि यदि सरकार विशेष सत्र में इस बिल को लाने का साहस जुटाती है, तो उसके पास दो ही संभावित रास्ते बचते हैं: पहला, विपक्षी खेमे में बड़ी सेंधमारी और क्रॉस-वोटिंग कराना; दूसरा, मतदान के दौरान विपक्षी सांसदों के एक बड़े धड़े से वॉकआउट या अनुपस्थिति (Abstention) सुनिश्चित कराना।

यदि विपक्षी सांसद सदन का बहिष्कार करते हैं, तो 'उपस्थित और मतदान करने वाले' सदस्यों की कुल संख्या घट जाएगी, जिससे दो-तिहाई का पैमाना स्वतः नीचे आ जाएगा और सरकार बिल पास करा सकती है। हाल के दिनों में पंजाब से आम आदमी पार्टी के कुछ राज्यसभा सांसदों के रुख और पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के भीतर बने अलग गुटों की चर्चाओं के चलते संसद का यह सत्र राजनीतिक रणनीतियों और फ्लोर मैनेजमेंट का सबसे बड़ा अखाड़ा बन सकता है।

कांग्रेस और संपूर्ण विपक्ष इसी संभावित राजनीतिक चक्रव्यूह को लेकर पूरी तरह सतर्क हो चुका है। खरगे की यह चिट्ठी विपक्षी दलों को एकजुट रखने और सरकार पर सर्वदलीय सहमति का दबाव बनाने की पहली बड़ी रणनीतिक चाल मानी जा रही है।