'बाप की जगह मां को नहीं दे सकते!' भारत-चीन संतुलन पर नेपाल के विदेश मंत्री का दो टूक बयान; BRI के 'शून्य डॉलर' से लेकर ट्रेड तक समझिए काठमांडू का कूटनीतिक रुख
काठमांडू और नई दिल्ली के बीच पिछले कुछ वर्षों में उपजे रणनीतिक संशयों, सीमा विवादों और नेपाल में चीन की बढ़ती गतिविधियों को लेकर जब भी बहस छिड़ती है, तो सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि क्या हिमालयी राष्ट्र भारत से दूर होकर बीजिंग की तरफ झुक रहा है? हाल ही में काठमांडू में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय संवाद कार्यक्रम के दौरान जब नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल से इस बाबत सीधा और चुभता हुआ सवाल पूछा गया, तो उन्होंने ऐसा कूटनीतिक और भावनात्मक जवाब दिया जो अब अंतरराष्ट्रीय गलियारों में जमकर वायरल हो रहा है। विदेश मंत्री ने भारत और चीन के साथ नेपाल के संबंधों की तुलना माता-पिता से करते हुए साफ कर दिया कि कोई भी संतान पिता की जगह मां या मां की जगह पिता को नहीं दे सकती। दोनों देशों का अपना अलग और अनूठा महत्व है, और नेपाल किसी एक के लिए दूसरे को किनारे नहीं कर सकता।
'पिता को मां से नहीं बदल सकते': विदेश नीति पर दिया पारिवारिक उदाहरण
नेपाल के विदेश मंत्री ने इस धारणा को सिरे से खारिज किया कि काठमांडू किसी एक पड़ोसी देश के प्रभाव में आकर दूसरे देश के हितों की अनदेखी कर रहा है। उन्होंने कहा कि नेपाल की विदेश नीति भावनाओं पर चलने के बजाय राष्ट्रीय हितों और व्यावहारिक तर्क पर आधारित है।
विदेश मंत्री ने अपने बयान में कहा कि भारत और चीन दोनों ही नेपाल के अत्यंत महत्वपूर्ण और अपरिहार्य पड़ोसी हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि हम किसी एक रिश्ते की भरपाई दूसरे से नहीं कर सकते। जैसे कोई व्यक्ति अपने पिता से यह नहीं कह सकता कि वह उन्हें मां से बदल देगा, या मां से यह नहीं कह सकता कि वह उन्हें पिता से बदल देगा; ठीक उसी तरह नेपाल के लिए भारत और चीन दोनों की अपनी स्वतंत्र, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामरिक अहमियत है। नेपाल इन दोनों अनूठे रिश्तों को पूरी परिपक्वता के साथ बनाए रखेगा।
दो-तिहाई व्यापार अकेले भारत के साथ: चीनी प्रभाव के दावों की खुली पोल
नेपाल में चीन की बढ़ती आर्थिक मौजूदगी और तथाकथित 'चीनी कब्जे' की चर्चाओं पर विदेश मंत्री ने जमीनी आंकड़ों के जरिए स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि भारतीय मीडिया में अक्सर यह दिखाया जाता है कि नेपाल पूरी तरह चीन के प्रभाव में चला गया है, लेकिन हकीकत यह है कि नेपाल की अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा आज भी भारत से ही जुड़ी हुई है।
आधिकारिक व्यापारिक आंकड़ों का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि नेपाल का कुल दो-तिहाई (लगभग 66 प्रतिशत) विदेशी व्यापार अकेले भारत के साथ होता है। भारत नेपाल का सबसे बड़ा एकल व्यापारिक साझेदार, प्रमुख आपूर्ति मार्ग और सबसे बड़ा निवेशक है। रोजमर्रा की आवश्यक वस्तुओं, पेट्रोलियम उत्पादों, दवाओं से लेकर खाद्यान्न तक के लिए नेपाल पूरी तरह भारत के साथ खुले व्यापार पर निर्भर है। ऐसे में किसी तीसरे देश के कारण भारत के साथ बुनियादी साझेदारी पर आंच आने का सवाल ही नहीं उठता।
चीन के BRI प्रोजेक्ट पर बड़ा खुलासा: 10 वर्षों में मिले 'शून्य डॉलर'
चीन के महत्वाकांक्षी 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' (BRI) को लेकर दुनिया भर में बने हौवे पर नेपाल के विदेश मंत्री ने एक बेहद चौंकाने वाला खुलासा किया। उन्होंने बताया कि नेपाल ने साल 2017 में बीआरआई के फ्रेमवर्क समझौते पर हस्ताक्षर जरूर किए थे, लेकिन बीते एक दशक में नेपाल को बीआरआई परियोजनाओं के तहत वास्तविक रूप से 'शून्य डॉलर' की वित्तीय मदद या अनुदान मिला है।
विदेश मंत्री के इस बयान ने उन सभी कयासों पर विराम लगा दिया जिनमें दावा किया जाता था कि नेपाल चीनी कर्ज के जाल (Debt Trap) में फंस चुका है। उन्होंने स्पष्ट किया कि नेपाल किसी भी ऐसे प्रोजेक्ट में शामिल नहीं होगा जो देश की अर्थव्यवस्था पर असहनीय कर्ज का बोझ डाले। नेपाल अनुदान (Grants) और रियायती निवेश को प्राथमिकता देता है, न कि भारी ब्याज वाले वाणिज्यिक ऋणों को।
भारत के साथ सीमा विवाद पर बोले: 'पड़ोसियों में ही तकरार होती है, सीमाएं खुली हैं'
भारत और नेपाल के बीच कालापानी, लिपुलेख और सुस्ता जैसे सीमा विवादों पर पूछे गए सवाल को विदेश मंत्री ने बहुत सहजता से लिया। उन्होंने कहा कि सीमा को लेकर जो मुद्दे हैं, उन्हें बेवजह जरूरत से ज्यादा तूल दिया जाता है।
उन्होंने तर्क दिया कि सीमा विवाद केवल उन्हीं देशों के बीच हो सकते हैं जो वास्तविक पड़ोसी हों। अगर कोई आपका पड़ोसी ही नहीं है, तो उसके साथ जमीन का कोई झगड़ा भी नहीं होगा। उन्होंने भारत और नेपाल के 'ओपन बॉर्डर' (खुली सीमा) सिस्टम की तारीफ करते हुए कहा कि यह पूरी दुनिया में एक अद्वितीय व्यवस्था है, जहां दोनों देशों के नागरिक बिना किसी पासपोर्ट या वीजा के एक-दूसरे के यहां आ-जा सकते हैं और रिश्ते जोड़ सकते हैं। यह 'रोटी-बेटी का संबंध' किसी भी राजनीतिक मतभेद से कहीं अधिक मजबूत और स्थायी है।
संकट के समय भारत ने निभाया पड़ोसी धर्म: राहत और ऊर्जा साझेदारी
विदेश मंत्री का यह बयान ऐसे समय में आया है जब नेपाल हाल ही में 26 अगस्त को रसुवा और भोटेकोशी बेसिन में आई भीषण प्राकृतिक आपदा और फ्लैश फ्लड के जख्मों से जूझ रहा है। इस त्रासदी के तुरंत बाद भारत सरकार ने बिना किसी देरी के राहत और बचाव सामग्री की खेप काठमांडू भेजी और सीमा पार फंसे लोगों को निकालने में सक्रिय मदद की।
इसके साथ ही उन्होंने भारत के साथ बढ़ते ऊर्जा सहयोग का उल्लेख किया। नेपाल और भारत के बीच अगले 10 वर्षों में 10,000 मेगावाट स्वच्छ बिजली निर्यात का ऐतिहासिक समझौता हो चुका है, जिससे नेपाल को भारी राजस्व प्राप्त होगा। इसके अलावा, नेपाल ने हाल के वर्षों में करीब एक अरब डॉलर की आईटी और टेक सेवाओं का निर्यात किया है। विदेश मंत्री ने भारतीय उद्योगपतियों और कॉर्पोरेट घरानों को खुला न्योता दिया कि वे नेपाल के बुनियादी ढांचे, हाइड्रोपावर, हाईवे और विमानन क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निवेश करें।
संतुलित कूटनीति ही नेपाल का स्थायी भविष्य
भू-राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि नेपाल के विदेश मंत्री का यह ताजा रुख दर्शाता है कि काठमांडू अब 'इंडिया कार्ड' या 'चाइना कार्ड' खेलने की पुरानी नीति से आगे निकलकर एक व्यावहारिक और तटस्थ विदेश नीति अपना रहा है। नेपाल यह अच्छी तरह समझता है कि सांस्कृतिक निकटता, भौगोलिक सुगमता और ऐतिहासिक रिश्तों के मामले में भारत का कोई विकल्प नहीं हो सकता, जबकि उत्तरी सीमा पर स्थित चीन के साथ शांति और सीमित आर्थिक सहयोग बनाए रखना भी उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आवश्यक है। भारत और चीन की तुलना माता-पिता से करके नेपाल ने एक तीर से दो निशाने साधे हैं—बीजिंग को यह भरोसा दिया है कि वह उपेक्षित नहीं है, और नई दिल्ली को यह स्पष्ट संदेश दिया है कि भारत की स्वाभाविक और प्राथमिक जगह कोई दूसरा देश कभी नहीं ले सकता।