अब 10 साल बाद भी चलेंगे पुराने डीजल वाहन? IIT दिल्ली की बनाई मशीन को मिली हरी झंडी
दिल्ली-एनसीआर समेत देश के प्रमुख महानगरों में वायु प्रदूषण पर नकेल कसने के लिए लागू 10 साल पुराने डीजल वाहनों पर प्रतिबंध के नियमों के बीच वाहन मालिकों और ट्रांसपोर्टरों के लिए एक क्रांतिकारी समाधान सामने आया है। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने आईआईटी दिल्ली (IIT Delhi) के विशेषज्ञों द्वारा विकसित एक स्वदेशी और बेहद किफायती तकनीकी डिवाइस को औपचारिक मंजूरी दे दी है। इस मशीन के परीक्षण पूरी तरह सफल रहे हैं। इस नवाचार के धरातल पर उतरने के बाद पुराने ट्रकों, बसों और डीजल वाहनों को जबरन कबाड़ (स्क्रैप) में भेजने की बाध्यता से बड़ी राहत मिलने की संभावना प्रबल हो गई है।
क्या है IIT दिल्ली की बनाई यह खास डिवाइस और कैसे करती है काम?
आईआईटी दिल्ली के शोधकर्ताओं द्वारा विकसित इस उपकरण का तकनीकी नाम रेट्रोफिट एमिशन कंट्रोल डिवाइस (RECD) है। यह एक ऐसा उपकरण है जिसे पुराने डीजल वाहनों के एग्जॉस्ट (साइलेंसर सिस्टम) में आसानी से रेट्रोफिट यानी बाहर से फिट किया जा सकता है:
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90% तक पार्टिकुलेट मैटर पर रोक: यह डिवाइस डीजल इंजन के धुएं से निकलने वाले बेहद सूक्ष्म और फेफड़ों को नुकसान पहुंचाने वाले पार्टिकुलेट मैटर (PM 2.5 और PM 10) को 90 प्रतिशत तक सोखकर नियंत्रित कर लेती है।
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नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx) में 60% की कमी: जहरीली गैस नाइट्रोजन ऑक्साइड के उत्सर्जन में यह उपकरण 60 फीसदी तक की भारी कटौती कर देता है।
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BS-III और BS-IV बनेंगे BS-VI के बराबर: केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने स्पष्ट किया कि यदि इस डिवाइस को पुराने बीएस-3 या बीएस-4 मानकों वाले वाहनों में लगा दिया जाए, तो उनसे निकलने वाला धुआं आधुनिक और सबसे कड़े उत्सर्जन मानक BS-VI (भारत स्टेज 6) के लगभग बराबर हो जाता है।
कितनी होगी इस मशीन की कीमत?
पुराने वाहनों को इलेक्ट्रिक (EV) में बदलने की किट जहां 4 से 5 लाख रुपये तक बैठती है, वहीं इस डिवाइस की सबसे बड़ी खासियत इसकी हैरान कर देने वाली कम लागत है:
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मात्र 4,000 से 5,000 रुपये कीमत: सोसायटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (SIAM) के वार्षिक सम्मेलन में नितिन गडकरी ने जानकारी दी कि इस स्वदेशी डिवाइस की व्यावसायिक कीमत ₹4,000 से ₹5,000 के बीच रहने की उम्मीद है।
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ट्रांसपोर्टरों और आम जनता की जेब पर नहीं पड़ेगा बोझ: नई कमर्शियल बस या ट्रक खरीदने पर ऑपरेटरों को 25 से 40 लाख रुपये तक खर्च करने पड़ते हैं। ऐसे में केवल 5 हजार रुपये का गैजेट लगाकर वाहन को सड़क पर कानूनी रूप से फिट बनाए रखना छोटे वाहन चालकों के लिए आर्थिक जीवनदान साबित होगा।
जल्द जारी होगा AIS-228 का ड्राफ्ट नोटिफिकेशन
इस तकनीकी नवाचार को कानूनी और व्यवस्थित रूप से लागू करने के लिए सड़क परिवहन मंत्रालय ने प्रशासनिक तैयारी पूरी कर ली है:
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सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय बहुत जल्द ऑटोमोटिव इंडस्ट्री स्टैंडर्ड 228 (AIS-228) के तहत एक मसौदा अधिसूचना (Draft Notification) जारी करने जा रहा है।
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इस मानक के तहत यह तय किया जाएगा कि कौन सी अधिकृत कंपनियां इस डिवाइस का बड़े पैमाने पर विनिर्माण और वाहनों में इंस्टॉलेशन कर सकेंगी।
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वाहनों के अलावा इस तकनीक का उपयोग शहरों में चलने वाले बड़े डीजल जनरेटरों (DG Sets) से होने वाले प्रदूषण को नियंत्रित करने में भी किया जा सकेगा।
10 साल वाले नियम और स्क्रैपिंग पॉलिसी पर क्या होगा असर?
वर्तमान में एनजीटी (NGT) और अदालती आदेशों के तहत दिल्ली-एनसीआर में 10 साल से पुराने डीजल वाहनों के संचालन पर पूरी तरह रोक है। इस कारण लाखों अच्छी स्थिति वाले वाहनों को समय से पहले कबाड़ घोषित करना पड़ता है।
गडकरी ने साफ किया कि सरकार की स्क्रैप पॉलिसी अपनी जगह जारी रहेगी, लेकिन जिन वाहनों की कार्यक्षमता बची हुई है और जो केवल प्रदूषण मानकों के कारण बंद होने की कगार पर हैं, उन्हें यह डिवाइस लगाकर सड़कों पर दौड़ने की सशर्त अनुमति दी जा सकती है। इससे पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक बचत के बीच एक संतुलित रास्ता तैयार होगा।