एक फूल, दो माली! उपचुनाव से पहले TMC के नाम और 'जोड़ा फूल' निशान पर किसका हक? ममता बनर्जी और ऋतब्रत गुट में आर-पार की जंग

एक फूल, दो माली! उपचुनाव से पहले TMC के नाम और 'जोड़ा फूल' निशान पर किसका हक? ममता बनर्जी और ऋतब्रत गुट में आर-पार की जंग

पश्चिम बंगाल की राजनीति में विधानसभा उपचुनावों (नंदीग्राम और रेजीनगर) के ऐलान के साथ ही तृणमूल कांग्रेस (TMC) के अस्तित्व की सबसे बड़ी जंग शुरू हो गई है। वर्ष 1998 में पार्टी की स्थापना के बाद से अपने 28 साल के इतिहास में तृणमूल सबसे बड़े अंदरूनी बिखराव से जूझ रही है। सवाल एक ही है—मशहूर चुनाव चिन्ह 'जोड़ा फूल' (घास-फूल) और पार्टी के आधिकारिक नाम पर असली हक किसका है? क्या पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी (कालीघाट गुट) का, जिन्होंने इसे शून्य से खड़ा किया, या फिर विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बने बागी विधायक ऋतब्रत बनर्जी गुट का, जिसके पास दो-तिहाई से अधिक विधायकों का समर्थन होने का दावा है? इस सियासी रार ने महाराष्ट्र में शिवसेना (शिंदे बनाम ठाकरे) और एनसीपी जैसे विवाद की यादें ताजा कर दी हैं।

कब और कैसे फूटी TMC में बगावत की चिंगारी?

2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में सत्ता गंवाने के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर असंतोष खुलकर सतह पर आ गया:

  • विधायकों की बगावत: जून में पार्टी से निष्कासित किए जाने के बाद विधायक ऋतब्रत बनर्जी ने तृणमूल के कुल 80 में से 58 से अधिक विधायकों का समर्थन जुटा लिया, जो आगे चलकर 64 तक पहुंच गया।

  • दलबदल विरोधी कानून से बचाव: दो-तिहाई से अधिक का संख्याबल होने के चलते विधानसभा अध्यक्ष ने बागी गुट को मान्यता दी और ऋतब्रत बनर्जी विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष (LoP) बने।

  • तृणमूल भवन पर कब्जा: बागी गुट ने राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक बुलाकर ममता बनर्जी को अध्यक्ष पद से हटाने, वरिष्ठ नेता अरूप रॉय को अध्यक्ष बनाने और अभिषेक बनर्जी को निलंबित करने का प्रस्ताव पारित कर दिया। कोलकाता स्थित मुख्य पार्टी कार्यालय 'तृणमूल भवन' पर भी बागी खेमे ने नियंत्रण जमा लिया।

'असली तृणमूल' की कानूनी जंग: दोनों पक्षों के अपने-अपने तर्क

चुनाव आयोग (ECI) के समक्ष यह विवाद 'चुनाव चिह्न (आरक्षण एवं आवंटन) आदेश, 1968' के तहत लंबित है, जहां दोनों गुटों ने अपनी-अपनी दलीलें रखी हैं:

  • ऋतब्रत बनर्जी और अरूप रॉय गुट का दावा:

    बागी खेमे का तर्क है कि उनके पास पार्टी के 80 में से 60 से अधिक विधायकों और कई सांसदों का लिखित समर्थन है। चूंकि जनप्रतिनिधियों (विधायिका विंग) का स्पष्ट बहुमत उनके साथ है, इसलिए चुनाव आयोग के 'बहुमत के नियम' (Test of Majority) के तहत पार्टी का नाम और सिंबल उन्हें मिलना चाहिए।

  • ममता बनर्जी (कालीघाट गुट) की दलील:

    ममता खेमे का कहना है कि पार्टी की स्थापना ममता बनर्जी ने की थी और पार्टी का संगठनात्मक ढांचा (Organizational Wing) आज भी उनके साथ मजबूती से खड़ा है। ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग को पत्र लिखकर यह भी रेखांकित किया कि बागी गुट ने तय समयसीमा में अपने जवाब दाखिल नहीं किए, इसलिए उनके दावे खारिज किए जाने चाहिए। उनका तर्क है कि निष्कासित नेताओं को पार्टी के सिंबल पर दावा करने का कोई नैतिक या कानूनी अधिकार नहीं है।

क्या सिंबल हो जाएगा 'फ्रीज'? उपचुनाव में क्या हैं विकल्प?

नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा सीटों पर 6 अक्टूबर को होने वाले उपचुनाव के लिए नामांकन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। ऐसे में चुनाव आयोग के सामने समय बेहद कम है:

  • सिंबल फ्रीज होने की प्रबल संभावना: यदि चुनाव आयोग नामांकन वापसी की तारीख से पहले किसी एक गुट के पक्ष में निर्णायक फैसला नहीं ले पाता है, तो अतीत के उदाहरणों (जैसे शिवसेना या लोजपा) की तरह 'जोड़ा फूल' चुनाव चिन्ह को अस्थायी रूप से सीज (Freeze) किया जा सकता है।

  • अंतरिम नाम और नए चुनाव चिन्ह: ऐसी स्थिति में आयोग दोनों ही गुटों को अलग-अलग अंतरिम नाम (जैसे TMC-ममता और TMC-ऋतब्रत) और स्वतंत्र चुनाव चिन्हों की सूची में से नए प्रतीक आवंटित कर सकता है।

  • पहला चुनावी लिटमस टेस्ट: दोनों गुटों ने इन दोनों सीटों पर अपने-अपने प्रत्याशी उतारने का ऐलान कर दिया है। यह उपचुनाव सिर्फ सीटों की जंग नहीं, बल्कि बंगाल की जनता के बीच यह साबित करने का भी मुकाबला होगा कि मतदाताओं की नजर में 'असली' तृणमूल कांग्रेस कौन सी है।