मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए राज्यों में खुली जंग, केरल विधानसभा में ऐतिहासिक प्रस्ताव पास

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए राज्यों में खुली जंग, केरल विधानसभा में ऐतिहासिक प्रस्ताव पास

देश के मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और उनकी निष्पक्षता को लेकर चल रहा विवाद अब राष्ट्रीय राजधानी की सड़कों से निकलकर राज्यों की विधानसभाओं तक पहुंच गया है। केरल विधानसभा ने सोमवार को एक ऐतिहासिक और अभूतपूर्व कदम उठाते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को उनके पद से तत्काल हटाने की मांग वाला आधिकारिक प्रस्ताव पारित कर दिया। इसके साथ ही केरल देश का ऐसा पहला राज्य बन गया है, जिसने राज्य विधायिका के भीतर केंद्र के मुख्य निर्वाचन आयुक्त को पदमुक्त करने का प्रस्ताव औपचारिक रूप से मंजूर किया है। मतदाता सूचियों के विशेष सघन पुनरीक्षण (SIR) और कथित गड़बड़ियों के खिलाफ विपक्षी दलों के बढ़ते दबाव के बीच पारित इस प्रस्ताव ने केंद्र सरकार और गैर-बीजेपी शासित राज्यों के बीच संवैधानिक टकराव को और गहरा कर दिया है।

केरल विधानसभा में एकजुट हुआ विपक्ष, बीजेपी विधायकों ने दर्ज कराया कड़ा विरोध

140 सदस्यीय केरल विधानसभा के नए सत्र के पहले ही दिन सदन में यह तीखी बहस का मुद्दा बना। मुख्यमंत्री वी. डी. सतीसन द्वारा पेश किए गए इस प्रस्ताव का सत्ताधारी यूडीएफ (UDF) और वामपंथी एलडीएफ (LDF) दोनों खेमों ने एकजुट होकर समर्थन किया। सदन में संख्या बल के आधार पर प्रस्ताव भारी बहुमत से पारित हो गया, जबकि भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के तीन विधायकों ने इस प्रस्ताव का कड़ा विरोध करते हुए इसे संवैधानिक संस्थाओं को बदनाम करने की सोची-समझी साजिश करार दिया। प्रस्ताव पारित होने के बाद मुख्यमंत्री सतीसन ने कहा कि मतदान का अधिकार हमारे लोकतंत्र की बुनियाद है और किसी भी संस्था या व्यक्ति को नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों को कमजोर करने की छूट नहीं दी जा सकती। उन्होंने स्पष्ट किया कि केरल स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव तथा संविधान की रक्षा के लिए पूरी दृढ़ता से खड़ा है।

प्रस्ताव में रखी गईं तीन प्रमुख मांगें: सीजेआई को चयन समिति में लाने पर जोर

केरल विधानसभा द्वारा पारित इस प्रस्ताव में केवल ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग ही शामिल नहीं है, बल्कि चुनाव आयोग के बुनियादी ढांचे में आमूलचूल बदलाव के लिए तीन अहम मांगें रखी गई हैं। पहली मांग के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को तुरंत उनके पद से हटाया जाए, क्योंकि आयोग की निष्पक्षता पर जनता और राजनीतिक दलों के बीच गंभीर संदेह पैदा हो चुका है। दूसरी मांग यह है कि स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) अभियान के दौरान तकनीकी और प्रशासनिक गड़बड़ियों के कारण मतदाता सूचियों से हटाए गए सभी पात्र नागरिकों के वोटिंग अधिकार तुरंत बहाल किए जाएं। तीसरी और सबसे अहम मांग चुनाव आयुक्तों के चयन पैनल को लेकर है, जिसमें मांग की गई है कि चयन समिति की पुनर्रचना की जाए और इसमें प्रधानमंत्री तथा नेता प्रतिपक्ष के साथ भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए।

एसआईआर प्रक्रिया पर गंभीर आरोप, वंचितों के मताधिकार की रक्षा की दुहाई

विधानसभा में पारित प्रस्ताव में यह गंभीर आरोप लगाया गया है कि हालिया चुनावी प्रक्रियाओं और तकनीकी बदलावों के नाम पर समाज के कमजोर वर्गों को मताधिकार से वंचित किया जा रहा है। प्रस्ताव के दस्तावेजों में उल्लेख किया गया है कि तकनीकी जोड़-तोड़ और प्रशासनिक अनियमितताओं के जरिए अल्पसंख्यकों, प्रवासी मजदूरों, वंचित तबकों और युवा मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से बाहर किए गए हैं, जो लोकतांत्रिक मूल्यों और संविधान के अनुच्छेद 326 का खुला उल्लंघन है। केरल के नेताओं का कहना है कि जब तक चुनाव आयोग अपनी विश्वसनीयता दोबारा बहाल नहीं करता, तब तक आने वाले किसी भी चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल उठते रहेंगे।

अन्य गैर-बीजेपी शासित राज्यों में भी प्रस्ताव लाने की बन रही रणनीति

केरल द्वारा यह बड़ा कदम उठाए जाने के बाद राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा तेज हो गई है कि क्या अन्य गैर-बीजेपी शासित राज्य भी इसी रास्ते पर आगे बढ़ेंगे। 'इंडिया' गठबंधन के रणनीतिकारों का मानना है कि तमिलनाडु, कर्नाटक, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों की विधानसभाओं में भी इस तरह के प्रस्ताव लाकर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग पर संस्थागत दबाव बनाया जा सकता है। राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे के नेतृत्व में दिल्ली में चल रहे 'वोट चोरी' विरोधी आंदोलन और सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे तक पहुंचे इस मामले को अब राज्य विधानसभाओं के जरिए एक नया फेडरल (संघीय) आयाम मिल गया है।

संवैधानिक जानकारों के मुताबिक राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित प्रस्ताव केंद्र सरकार के लिए सीधे तौर पर कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं होते, क्योंकि मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया संसद में महाभियोग के जरिए ही पूरी हो सकती है। इसके बावजूद, एक पूर्ण राज्य विधानसभा द्वारा सीईसी के खिलाफ औपचारिक प्रस्ताव पारित करना देश के लोकतांत्रिक इतिहास में एक अत्यंत दुर्लभ और बड़ा राजनीतिक संदेश है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि केंद्र सरकार और चुनाव आयोग केरल विधानसभा के इस कदम पर क्या कानूनी या राजनीतिक रुख अपनाते हैं।