PM मोदी को थैंक्यू बोलकर चीन को दिया बड़ा प्रोजेक्ट: मालदीव के राष्ट्रपति मुइज्जू की दोहरी चाल, क्या भारत के साथ खेल रहे हैं कूटनीतिक खेल?

PM मोदी को थैंक्यू बोलकर चीन को दिया बड़ा प्रोजेक्ट: मालदीव के राष्ट्रपति मुइज्जू की दोहरी चाल, क्या भारत के साथ खेल रहे हैं कूटनीतिक खेल?

हिंद महासागर में रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण द्वीप देश मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू के कूटनीतिक पैंतरे एक बार फिर नई दिल्ली के सुरक्षा और विदेश नीति विशेषज्ञों के लिए पहेली बन गए हैं। कभी 'इंडिया आउट' (India Out) अभियान के जरिए सत्ता के शीर्ष तक पहुंचे मुइज्जू हाल के दिनों में भारत के प्रति बेहद नरम और कृतज्ञ नजर आ रहे थे। उन्होंने भारत की आर्थिक मदद और दोनों देशों के रिश्तों को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सार्वजनिक रूप से जमकर तारीफ की और उन्हें धन्यवाद कहा।

हालांकि, इस मीठी बयानबाजी के पीछे एक अलग ही भू-राजनीतिक खेल सामने आया है। मालदीव सरकार ने रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील 'थिलाफुशी पोर्ट डेवलपमेंट प्रोजेक्ट' (Thilafushi Port Development Project) के पहले चरण का बड़ा ठेका चीन की सरकारी कंपनी 'चाइना हार्बर इंजीनियरिंग कंपनी' (CHEC) को सौंप दिया है। इस कदम के बाद कूटनीतिक हलकों में यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या मुइज्जू भारत और चीन दोनों को साधने के लिए 'बैलेंसिंग एक्ट' की आड़ में दोहरा खेल खेल रहे हैं?

जिस थिलाफुशी तक भारत बना रहा है पुल, वहीं का मुख्य पोर्ट चीन के हवाले

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे पेचीदा और चौंकाने वाला पहलू वह भौगोलिक इलाका है, जहां यह प्रोजेक्ट दिया गया है। थिलाफुशी माले के पास स्थित एक प्रमुख औद्योगिक द्वीप है। भारत सरकार अपने 500 मिलियन डॉलर (लगभग ₹4,100 करोड़ से अधिक) के महत्वाकांक्षी 'ग्रेटर माले कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट' (GMCP) के तहत राजधानी माले को विलिमाले, गुलहिफालहू और थिलाफुशी से जोड़ने के लिए 6.7 किलोमीटर लंबा आधुनिक समुद्री पुल और सड़कों का विशाल नेटवर्क बना रही है।

कुछ ही दिन पहले खुद राष्ट्रपति मुइज्जू ने निर्माणाधीन थिलामाले पुल का पैदल निरीक्षण किया था और इसे 'भारत-मालदीव की अटूट दोस्ती का प्रतीक' करार देते हुए पीएम मोदी और भारतीय तकनीकी टीम का आभार व्यक्त किया था। लेकिन विडंबना यह है कि जिस थिलाफुशी द्वीप तक पहुंच को आसान और सुगम बनाने के लिए भारत भारी-भरकम आर्थिक अनुदान और कर्ज देकर पुल तैयार कर रहा है, उसी थिलाफुशी के मुख्य कमर्शियल बंदरगाह को विकसित करने की कमान अब बीजिंग की सरकारी कंपनी संभालेगी।

चीनी कंपनी CHEC को मिले प्रोजेक्ट में क्या-क्या शामिल है?

मालदीव की सरकारी बंदरगाह ऑपरेटर 'मालदीव पोर्ट्स लिमिटेड' (MPL) के अनुसार, थिलाफुशी पोर्ट का विस्तार देश का लगभग 40 साल पुराना सपना रहा है:

  • पोर्ट का दायरा: मौजूदा 5 हेक्टेयर के छोटे बंदरगाह का विस्तार करके उसे 20 हेक्टेयर का विशाल आधुनिक कंटेनर और कार्गो हब बनाया जाएगा।

  • इंफ्रास्ट्रक्चर: इसमें 650 मीटर लंबी 'क्वे वॉल' (Quay Wall), 125 मीटर लंबी सड़क जेटी, बॉन्डेड वेयरहाउस, आधुनिक एक्स-रे स्कैनर और पूरी तरह ऑटोमेटेड कार्गो क्लीयरेंस सिस्टम स्थापित किया जाएगा।

  • कार्गो शिफ्टिंग: मालदीव सरकार की योजना है कि नवंबर 2027 तक माले के भीड़भाड़ वाले मुख्य कमर्शियल बंदरगाह को पूरी तरह थिलाफुशी में स्थानांतरित कर दिया जाए, जिससे सामान क्लीयरेंस का समय 5 दिन से घटकर महज 48 घंटे रह जाए।

आर्थिक संकट में भारत ने बचाया, लेकिन चीन से मोह भंग नहीं

राष्ट्रपति बनने के बाद मुइज्जू ने अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए भारत के बजाय चीन को चुना था और बीजिंग के साथ 20 से अधिक द्विपक्षीय समझौतों पर हस्ताक्षर किए थे। लेकिन 2024 में जब मालदीव विदेशी मुद्रा भंडार की भारी किल्लत और अंतरराष्ट्रीय कर्ज के डिफॉल्ट होने की कगार पर पहुंच गया, तब चीन ने उसे तत्काल वित्तीय बेलआउट पैकेज देने से हाथ खींच लिए थे।

संकट के उस नाजुक मोड़ पर भारत ने एक बार फिर 'फर्स्ट रिस्पॉन्डर' की भूमिका निभाते हुए मालदीव को 400 मिलियन डॉलर का द्विपक्षीय करेंसी स्वैप और आरबीआई (RBI) के जरिए 3,000 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता प्रदान कर दिवालिया होने से बचाया था। भारत से मिली इस जीवनदायिनी आर्थिक मदद के बाद मुइज्जू के सुर बदल गए और वे भारत के गुणगान करने लगे। लेकिन थिलाफुशी पोर्ट का ठेका सीधे चीनी कंपनी को थमाकर उन्होंने साफ कर दिया है कि रणनीतिक मामलों में उनका झुकाव अब भी बीजिंग की ओर ही बना हुआ है।

हिंद महासागर की सुरक्षा पर नई दिल्ली की पैनी नजर

सामरिक विशेषज्ञों का मानना है कि राष्ट्रपति मुइज्जू की यह रणनीति पूरी तरह सोची-समझी है। वे अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए भारत की नकदी और ग्रांट्स का इस्तेमाल कर रहे हैं, जबकि बुनियादी ढांचे के निर्माण में चीन को बड़ा खिलाड़ी बनाए रखकर बीजिंग को भी खुश रख रहे हैं।

लेकिन भारत के लिए चिंता की बात यह है कि एक ही द्वीप पर भारत का कनेक्टिविटी इंफ्रास्ट्रक्चर और चीन का बंदरगाह नियंत्रण होना भविष्य में खुफिया और सामरिक निगरानी के लिहाज से जटिलताएं पैदा कर सकता है। हिंद महासागर के बेहद व्यस्त अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार मार्ग (SLOCs) के मुहाने पर स्थित मालदीव में चीनी कंपनियों की जमीनी मौजूदगी पर भारतीय नौसेना और राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र लगातार सतर्क दृष्टि बनाए हुए हैं।