बुरे फंसे राहुल गांधी, 'चौकीदार चोर' और 'कमांडर-इन-थीफ' टिप्पणी केस रद्द करने से बॉम्बे हाईकोर्ट का साफ इनकार

बुरे फंसे राहुल गांधी, 'चौकीदार चोर' और 'कमांडर-इन-थीफ' टिप्पणी केस रद्द करने से बॉम्बे हाईकोर्ट का साफ इनकार

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की मुश्किलें एक बार फिर अदालती कटघरे में बढ़ती नजर आ रही हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर की गई 'चौकीदार चोर है', 'चोरों के सरदार' और 'कमांडर-इन-थीफ' जैसी विवादित टिप्पणियों के मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने राहुल गांधी को कोई भी राहत देने से साफ इनकार कर दिया है। अदालत ने उनके खिलाफ लंबित आपराधिक मानहानि (Criminal Defamation) की कार्यवाही और जारी समन को रद्द करने की मांग वाली याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया।

जस्टिस नितिन आर. बोरकर की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए यह अहम फैसला सुनाया। हालांकि, अदालत ने राहुल गांधी को सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करने के लिए 6 सप्ताह का अंतरिम संरक्षण जारी रखा है, जिससे उन्हें फिलहाल मजिस्ट्रेट अदालत के समक्ष व्यक्तिगत रूप से पेश नहीं होना पड़ेगा।

2018 के राफेल भाषण से जुड़ा है पूरा मामला: बीजेपी कार्यकर्ता ने दर्ज कराई थी शिकायत

यह पूरा विवाद वर्ष 2018 के लोकसभा चुनाव से पूर्व का है। शिकायत के अनुसार, राहुल गांधी ने 20 सितंबर 2018 को राजस्थान में आयोजित एक जनसभा में राफेल लड़ाकू विमान सौदे को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तीखे हमले किए थे। इसके बाद 24 सितंबर 2018 को उन्होंने इस भाषण का वीडियो अपने निजी सोशल मीडिया हैंडल (X, पूर्व में ट्विटर) पर पोस्ट करते हुए पीएम मोदी को कथित तौर पर 'कमांडर-इन-थीफ' (Commander-in-Thief) और 'चोरों का सरदार' कहकर संबोधित किया था।

इस बयान के खिलाफ भाजपा के सक्रिय कार्यकर्ता महेश श्रीश्रिमल ने मुंबई के गिरगांव स्थित मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट कोर्ट में भारतीय दंड संहिता की धारा 499 और 500 (आपराधिक मानहानि) के तहत शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायतकर्ता का तर्क था कि प्रधानमंत्री मोदी केवल एक व्यक्ति नहीं बल्कि भाजपा के प्रमुख चेहरा हैं। ऐसे में उन्हें 'चोरों का सरदार' कहना परोक्ष रूप से भाजपा के सभी सदस्यों और कार्यकर्ताओं को चोर बताने के समान है, जिससे पार्टी कार्यकर्ताओं की मानहानि हुई है। अगस्त 2019 में मजिस्ट्रेट कोर्ट ने राहुल गांधी को समन जारी कर तलब किया था, जिसे रद्द कराने के लिए वे हाईकोर्ट पहुंचे थे।

राहुल गांधी की दलील: 'न किसी पार्टी का नाम लिया, न कोई निश्चित समूह'

हाईकोर्ट में राहुल गांधी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सुदीप पासबोला ने दलील दी कि राहुल गांधी के बयान में न तो भारतीय जनता पार्टी का नाम था और न ही उन्होंने किसी विशेष वर्ग या संगठन को सीधे तौर पर निशाना बनाया था।

उन्होंने तर्क दिया कि मानहानि कानून के तहत वही व्यक्ति केस कर सकता है जो सीधे तौर पर 'पीड़ित' (Aggrieved Person) हो। किसी सामान्य कार्यकर्ता के पास इस आधार पर मुकदमा चलाने का कोई कानूनी अधिकार (Locus Standi) नहीं बनता। बचाव पक्ष ने कहा कि एक राजनीतिक टिप्पणी को तोड़-मरोड़कर पूरे दल से जोड़ना कानूनन सही नहीं है, इसलिए मजिस्ट्रेट द्वारा जारी समन को निरस्त किया जाना चाहिए। वहीं महाराष्ट्र सरकार की ओर से एडवोकेट जनरल ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि शिकायत में मानहानि के प्राथमिक तत्व मौजूद हैं।

हाईकोर्ट का सख्त रुख: 'बीजेपी एक पहचान योग्य संस्था, ट्रायल में तय होगा इरादा'

जस्टिस नितिन बोरकर की अदालत ने राहुल गांधी की दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि भारतीय जनता पार्टी एक पंजीकृत राष्ट्रीय राजनीतिक दल है और कानून के नजरिए से यह निश्चित रूप से एक स्पष्ट और 'पहचान योग्य संस्था' (Determinate Body) है।

अदालत ने कहा:

  • पार्टी के चेहरे पर हमला: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारतीय जनता पार्टी के सबसे प्रमुख चेहरा हैं। ऐसे में उनके खिलाफ की गई आपत्तिजनक टिप्पणियों का पार्टी के सक्रिय कार्यकर्ताओं और सदस्यों पर असर न पड़े, इस संभावना से सीधे इनकार नहीं किया जा सकता।

  • ट्रायल के दौरान तय होंगे तथ्य: अदालत ने स्पष्ट किया कि राहुल गांधी का वास्तविक आशय क्या था, क्या यह टिप्पणी केवल व्यक्तिगत थी या पूरे संगठन पर लांछन लगाने वाली थी, इसका फैसला केस की सुनवाई और गवाहों के बयानों (Trial Stage) के बाद ही हो सकता है। प्रारंभिक स्तर पर इस मामले को खारिज करना कानून सम्मत नहीं होगा।

  • शशि थरूर मामले की नजीर: हाईकोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस पुराने फैसले का भी हवाला दिया जिसमें माना गया था कि पंजीकृत राजनीतिक दल के कार्यकर्ता अपनी पार्टी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचने पर मानहानि की शिकायत दर्ज कराने का अधिकार रखते हैं।

बॉम्बे हाईकोर्ट से याचिका खारिज होने के बाद राहुल गांधी के पास अब सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने का ही विकल्प बचा है। यदि शीर्ष अदालत से भी राहत नहीं मिलती है, तो उन्हें मुंबई की निचली अदालत में इस आपराधिक मानहानि के मुकदमे में नियमित ट्रायल का सामना करना पड़ेगा।