भारत पर 100% टैरिफ वाले अमेरिकी बिल का समर्थन करने वाले इकलौते भारतीय-अमेरिकी सांसद: पार्टी लाइन तोड़कर राजा कृष्णमूर्ति ने दिया वोट
अमेरिकी प्रतिनिधि सभा (House of Representatives) द्वारा पारित 'लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग ऑफ रशिया एंड ईरान एक्ट' ने भारत और अमेरिका के कूटनीतिक रिश्तों में नई हलचल पैदा कर दी है। इस कानून के तहत राष्ट्रपति को यह अधिकार दिया गया है कि वे रूस से कच्चा तेल और गैस आयात करने वाले शीर्ष खरीदार देशों—जिनमें मुख्य रूप से भारत और चीन शामिल हैं—पर 100 प्रतिशत तक का दंडात्मक आयात शुल्क (Tariff) लगा सकते हैं।
इस विधेयक पर वोटिंग के दौरान वॉशिंगटन में एक दिलचस्प सियासी मोड़ सामने आया। अमेरिकी संसद में मौजूद छह भारतीय मूल के सांसदों में से राजा कृष्णमूर्ति (Raja Krishnamoorthi) इकलौते ऐसे सांसद रहे जिन्होंने अपनी पार्टी और बाकी साथी सांसदों की लाइन से अलग हटकर इस सख्त बिल के पक्ष में मतदान किया।
छह में से 5 भारतीय-अमेरिकी सांसदों ने किया विरोध, कृष्णमूर्ति ने तोड़ी पार्टी लाइन
अमेरिकी निचले सदन में कुल छह भारतीय-अमेरिकी सांसद हैं, और सभी डेमोक्रेटिक पार्टी से ताल्लुक रखते हैं:
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बिल के खिलाफ वोट देने वाले 5 सांसद: रो खन्ना (Ro Khanna), प्रमिला जयपाल (Pramila Jayapal), अमी बेरा (Ami Bera), श्री थानेदार (Shri Thanedar) और सुहास सुब्रमण्यम (Suhas Subramanyam) ने पार्टी रुख के अनुसार इस कानून के खिलाफ मतदान किया। उन्होंने इस बात पर भी सवाल उठाया कि अमेरिका अपने लिए रूस से यूरेनियम खरीद को प्रतिबंधों से छूट दे रहा है, लेकिन दूसरे देशों पर पाबंदियां थोप रहा है।
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अकेले खड़े रहे कृष्णमूर्ति: 262 के मुकाबले 159 मतों से पास हुए इस बिल में 58 डेमोक्रेट्स ने बिल का समर्थन किया, जिनमें राजा कृष्णमूर्ति शामिल थे। वे एकमात्र भारतीय मूल के प्रतिनिधि बने जिन्होंने इस विधेयक का खुला समर्थन किया।
वोटिंग से पहले यूक्रेनी गुट से की थी मुलाकात
मतदान से ठीक पहले इलिनॉय से आने वाले सांसद कृष्णमूर्ति ने यूक्रेन समर्थक एक नागरिक समूह ('इलिनॉय यूक्रेन एक्शन') के प्रतिनिधियों से मुलाकात की थी।
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वोट के बाद सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हुए उन्होंने लिखा कि यूक्रेन के लोग अपनी संप्रभुता और आजादी के लिए बहादुरी से लड़ रहे हैं, और अमेरिका को उनके साथ मजबूती से खड़ा रहना चाहिए।
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उनका मुख्य तर्क यह था कि रूस की अर्थव्यवस्था और युद्ध मशीनरी को मिलने वाले ऊर्जा राजस्व को हर हाल में रोकना जरूरी है। हालांकि, उनके इस कदम की आलोचना इसलिए हो रही है क्योंकि इस बिल का सीधा असर भारत की ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक हितों पर पड़ सकता है।
कौन हैं राजा कृष्णमूर्ति?
राजा कृष्णमूर्ति अमेरिकी राजनीति में एक प्रभावशाली और वरिष्ठ भारतीय-अमेरिकी चेहरा माने जाते हैं।
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दिल्ली में जन्म और अमेरिका का सफर: उनका पूरा नाम सुब्रमणियन राजा कृष्णमूर्ति है। उनका जन्म 19 जुलाई 1973 को नई दिल्ली में एक तमिल परिवार में हुआ था। जब वे महज तीन महीने के थे, तब उनका परिवार अमेरिका चला गया और वे इलिनॉय राज्य के पियोरिया में पले-बढ़े।
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उच्च शिक्षा: उन्होंने प्रिंसटन यूनिवर्सिटी से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिग्री ली और इसके बाद प्रतिष्ठित हार्वर्ड लॉ स्कूल (Harvard Law School) से कानून की पढ़ाई ऑनर्स के साथ पूरी की।
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बराक ओबामा के साथ पुराना जुड़ाव: कृष्णमूर्ति ने साल 2000 में बराक ओबामा के हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और 2004 के उनके ऐतिहासिक अमेरिकी सीनेट अभियान में महत्वपूर्ण रणनीतिक भूमिका निभाई थी। वे ओबामा के करीबी सहयोगियों में गिने जाते रहे हैं।
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2017 से लगातार सांसद: वे 2016 में पहली बार इलिनॉय के 8वें कांग्रेसनल डिस्ट्रिक्ट से सांसद चुने गए और जनवरी 2017 से लगातार सदन में अपनी सीट बरकरार रखे हुए हैं। वे यूएस हाउस इंटेलिजेंस कमेटी और चीन पर बनी विशेष संसदीय समिति के प्रमुख सदस्य भी रहे हैं।
राजनीतिक भविष्य और कार्यकाल
राजा कृष्णमूर्ति ने हाल ही में अमेरिकी सीनेट के प्राइमरी चुनाव में किस्मत आजमाई थी, लेकिन उसमें उन्हें सफलता नहीं मिली। वे जनवरी में हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स से अपना मौजूदा कार्यकाल पूरा कर रिटायर होने जा रहे हैं।
अपने कार्यकाल के अंतिम दौर में भारत पर संभावित रूप से असर डालने वाले 100% टैरिफ बिल का समर्थन करके उन्होंने एक बड़ा राजनीतिक विवाद छेड़ दिया है। एक तरफ जहां भारतीय प्रवासी समुदाय में उनकी स्वतंत्र विदेश नीति की समझ को लेकर सवाल उठ रहे हैं, वहीं वाशिंगटन के सुरक्षा हलकों में वे रूस के खिलाफ आक्रामक रुख के हिमायती के रूप में देखे जा रहे हैं।