'सिस्टम झुका, लेकिन टूटा नहीं!' कॉकरोच प्रोटेस्ट पर केंद्र सरकार के ऐक्शन से खुश हुए शशि थरूर; पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका से तुलना कर बताया भारतीय लोकतंत्र का असली दम

'सिस्टम झुका, लेकिन टूटा नहीं!' कॉकरोच प्रोटेस्ट पर केंद्र सरकार के ऐक्शन से खुश हुए शशि थरूर; पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका से तुलना कर बताया भारतीय लोकतंत्र का असली दम

देश भर में प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितताओं, बेरोजगारी और युवाओं के मुद्दों को लेकर उपजे 'कॉकरोच आंदोलन' (Cockroach Protest) के बाद भारतीय राजनीति में एक दुर्लभ और सकारात्मक लोकतांत्रिक विमर्श देखने को मिला है। जहां आमतौर पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच हर मुद्दे पर तीखी तकरार ही देखने को मिलती है, वहीं वरिष्ठ कांग्रेस सांसद और प्रख्यात राजनयिक डॉ. शशि थरूर ने इस पूरे घटनाक्रम पर मोदी सरकार और भारतीय लोकतांत्रिक तंत्र की अप्रत्याशित परिपक्वता की खुलकर तारीफ की है। दक्षिण एशिया के पड़ोसी देशों—पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका और म्यांमार—में हाल के वर्षों में उपजे हिंसक जन-विद्रोहों और सत्ता परिवर्तनों का उदाहरण देते हुए थरूर ने स्पष्ट किया कि भारत का लोकतांत्रिक ढांचा किसी भी आंतरिक दबाव को झेलने और जनभावनाओं के अनुरूप खुद को ढालने में दुनिया के कई देशों से कहीं अधिक सक्षम साबित हुआ है।

भारतीय लोकतंत्र की असली ताकत: 'सिस्टम झुका, लेकिन टूटा नहीं'

शशि थरूर ने एक राष्ट्रीय साक्षात्कार में इस बात को रेखांकित किया कि युवाओं और छात्रों के नेतृत्व में उठे इस बड़े राष्ट्रव्यापी विरोध पर केंद्र सरकार और प्रशासनिक तंत्र ने जिस तरह से प्रतिक्रिया दी, वह भारतीय लोकतंत्र की आंतरिक मजबूती को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि जब किसी देश में युवाओं का आक्रोश सड़कों पर फूटता है, तो कमजोर लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं या तो तानाशाही में बदल जाती हैं या पूरी तरह बिखर जाती हैं।

थरूर के अनुसार, भारत में जब भारी संख्या में छात्र और जेन-जी (Gen-Z) युवा सड़कों पर उतरे, तो सरकार ने उनकी आवाज को पूरी तरह खारिज करने के बजाय दबाव को समझा और सुधारात्मक कदम उठाए। उन्होंने इस स्थिति को 'दबाव कुकर के सेफ्टी वॉल्व' की तरह बताते हुए कहा कि व्यवस्था ने दबाव को बाहर निकलने का रास्ता दिया। थरूर ने टिप्पणी की कि सरकार विरोधी लहर के बीच भी भारत का सिस्टम 'झुका, लेकिन टूटा नहीं'। उन्होंने जोर देकर कहा कि एक विपक्षी सांसद के तौर पर भी वे इस बात को स्वीकार करते हैं कि देश के लोकतंत्र में जनता के मूड को भांपने और उसके अनुरूप खुद को सुधारने (Self-Correction Mechanism) की जबरदस्त फुर्ती मौजूद है।

पड़ोसी मुल्कों की अराजकता बनाम भारत की संवैधानिक परिपक्वता

शशि थरूर ने अपने बयान में भारत के आसपास मौजूद दक्षिण एशियाई देशों की हालिया राजनीतिक और सामाजिक उथल-पुथल का विस्तृत खाका पेश किया। उन्होंने बताया कि कैसे पड़ोस के देशों में युवा और जनआंदोलनों ने पूरी व्यवस्था को ही तहस-नहस कर दिया:

  • श्रीलंका का संकट: आर्थिक बदहाली और महंगाई से भड़के युवाओं के सैलाब ने राष्ट्रपति भवन पर कब्जा कर लिया था और राजपक्षे परिवार को अपनी जान बचाकर देश छोड़कर भागना पड़ा था।

  • बांग्लादेश का सत्ता परिवर्तन: छात्रों के व्यापक आंदोलन के बाद प्रधानमंत्री शेख हसीना को अचानक इस्तीफा देकर मुल्क छोड़ना पड़ा, जिसके बाद देश में अंतरिम व्यवस्था लागू हुई।

  • पाकिस्तान में सैन्य दखल: सेना के खिलाफ जनता के सड़कों पर उतरने और सैन्य ठिकानों पर हमलों के बाद पाकिस्तानी सेना ने पर्दे के पीछे से सामने आकर नियंत्रण किया और एक कठपुतली सरकार बना दी।

  • म्यांमार की सैन्य तानाशाही: वहां की सेना ने लोकतांत्रिक सरकार को उखाड़ फेंकते हुए पूरी सत्ता पर जबरन कब्जा जमा लिया।

  • नेपाल का राजनीतिक गतिरोध: वहां भी लगातार युवा असंतोष और सत्ता परिवर्तनों के बीच शासन व्यवस्था लंबे समय तक अस्थिरता से जूझती रही।

इन सभी उदाहरणों की तुलना करते हुए थरूर ने कहा कि भारत में युवा असंतोष के बावजूद कोई अराजकता, सैन्य हस्तक्षेप या संवैधानिक संकट पैदा नहीं हुआ। यहां की निर्वाचित सरकार ने लोकतांत्रिक सीमाओं के भीतर रहकर जनता से संवाद किया और समाधान का रास्ता निकाला।

'इस्तीफों से बचने वाली सरकार का झुकना बड़ी बात': केंद्र के ऐक्शन पर थरूर की बेबाकी

शशि थरूर ने अपने विश्लेषण में केंद्र की भाजपा सरकार की कार्यशैली का भी निष्पक्ष आकलन किया। उन्होंने कहा कि भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार का यह पुराना रिकॉर्ड रहा है कि वह विपक्ष या सार्वजनिक दबाव में अपने मंत्रियों के इस्तीफे की मांग पर आसानी से ध्यान नहीं देती है। अतीत में कई बड़े राजनीतिक विवादों के दौरान भी सरकार ने अपने मंत्रियों का बचाव किया था।

हालांकि, इस बार कॉकरोच आंदोलन और छात्रों के राष्ट्रव्यापी आक्रोश की गंभीरता को देखते हुए सरकार ने अपनी पुरानी नीति में बदलाव किया। तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का नाम लिए बिना थरूर ने कहा कि भारी जनदबाव के बीच केंद्रीय स्तर पर इस्तीफा हुआ और सरकार ने सुधारों का आश्वासन दिया। थरूर ने इसे भारतीय लोकतंत्र की जीत करार दिया और कहा कि यह इस बात का स्पष्ट सबूत है कि जब देश का युवा एकजुट होकर वास्तविक मुद्दों पर आवाज उठाता है, तो सत्ता के सबसे मजबूत स्तंभों को भी झुकना पड़ता है और फैसले बदलने पड़ते हैं।

पारंपरिक विपक्षी दलों के लिए कड़ा संदेश: युवाओं ने नई राह क्यों चुनी?

अपनी ही पार्टी और समूचे विपक्षी खेमे को आईना दिखाते हुए शशि थरूर ने इस आंदोलन से एक गंभीर राजनीतिक सबक सीखने की अपील की। उन्होंने कहा कि मुख्यधारा के राजनीतिक दलों को गंभीरता से आत्ममंथन करना चाहिए कि आखिर देश के युवाओं ने अपनी समस्याओं के लिए कांग्रेस या अन्य स्थापित विपक्षी दलों का मंच चुनने के बजाय 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) जैसे एक व्यंग्यात्मक और गैर-पारंपरिक आंदोलन का सहारा क्यों लिया।

थरूर ने कहा कि पारंपरिक विपक्षी दल लंबे समय से जातिगत समीकरणों, धार्मिक ध्रुवीकरण और पुराने राजनीतिक ढर्रे में उलझे रहे हैं। जबकि आज के जेन-जी युवाओं की प्राथमिकताएं बिल्कुल अलग हैं। वे पेपर लीक, भर्ती परीक्षाओं में सालों की देरी, कोचिंग माफिया के शोषण और नौकरियों के अभाव जैसे ठोस और दैनिक जीवन से जुड़े मुद्दों पर तुरंत परिणाम चाहते हैं। सीजेपी ने सोशल मीडिया, मीम्स और सीधी डिजिटल भाषा के जरिए युवाओं से सीधा संवाद साधा, जिसे समझने में पारंपरिक दल पीछे रह गए। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि स्थापित दल समय रहते युवाओं की इस नई राजनीतिक चेतना और आकांक्षाओं को नहीं समझेंगे, तो वे देश की मुख्यधारा की राजनीति से अप्रासंगिक हो जाएंगे।

डिजिटल जनआंदोलनों का नया युग: व्यंग्य से बनी जवाबदेही की मिसाल

कॉकरोच आंदोलन की शुरुआत सुप्रीम कोर्ट की एक सुनवाई के दौरान बेरोजगार युवाओं और कार्यकर्ताओं पर आई विवादास्पद टिप्पणियों के जवाब में एक व्यंग्यात्मक मंच के रूप में हुई थी। लेकिन कुछ ही महीनों में यह आंदोलन सोशल मीडिया के दायरे से निकलकर जंतर-मंतर और सड़कों पर लाखों छात्रों के वास्तविक जन-आंदोलन में तब्दील हो गया।

थरूर ने कहा कि लोकतंत्र में शांतिपूर्ण व्यंग्य और आलोचना जनता के असंतोष को व्यक्त करने का सबसे खूबसूरत और अहिंसक माध्यम है। उन्होंने कहा कि वे अराजकता और हिंसा के बजाय रचनात्मक व्यंग्य और लोकतांत्रिक दबाव को हमेशा प्राथमिकता देंगे। जब सरकार ऐसे आंदोलनों की बात सुनती है और समाधान की दिशा में कदम बढ़ाती है, तो इससे देश के प्रत्येक नागरिक का संविधान और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर भरोसा और अधिक मजबूत होता है।