US की धौंस खत्म, चीन बन जाएगा बॉस? BRICS में ड्रैगन ने चला डी-डॉलराइजेशन और कॉमन मार्केट का नया दांव; क्या भारत बनेगा जिनपिंग के इस गेमप्लान का हिस्सा?

US की धौंस खत्म, चीन बन जाएगा बॉस? BRICS में ड्रैगन ने चला डी-डॉलराइजेशन और कॉमन मार्केट का नया दांव; क्या भारत बनेगा जिनपिंग के इस गेमप्लान का हिस्सा?

नई दिल्ली में आयोजित 18वें ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन के मंच से दुनिया के सबसे बड़े आर्थिक और भू-राजनीतिक टकराव की नई रूपरेखा खुलकर सामने आ गई है। अमेरिका द्वारा हाल के महीनों में टैरिफ और प्रतिबंधों के जरिए बढ़ती आर्थिक आक्रामकता के बीच चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ब्रिक्स को वाशिंगटन के वित्तीय एकाधिकार के खिलाफ एक 'एंटी-वेस्टर्न आर्थिक मोर्चे' में बदलने की पुरजोर कोशिश की। चीनी रणनीतिकारों का मानना है कि यदि वैश्विक व्यापार से अमेरिकी डॉलर (USD) का दबदबा कमजोर होता है, तो उसकी जगह लेने की सबसे ज्यादा आर्थिक और विनिर्माण क्षमता केवल चीन के पास है। इसी महत्वाकांक्षा को साधने के लिए ड्रैगन ने ब्रिक्स मंच से वैकल्पिक भुगतान प्रणाली, साझा बाजार और ओपन-सोर्स एआई जैसे कई मोहरें आगे बढ़ाए।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या अमेरिका की हेजेमनी (धौंस) खत्म कर चीन दुनिया का नया 'बॉस' बनने की राह पर है? और क्या भारत, जो ब्रिक्स का संस्थापक और सबसे तेजी से बढ़ता सदस्य है, चीन के इस गुप्त एजेंडे का हिस्सा बनेगा?

ब्रिक्स में चीन ने क्या नया दांव चला?

सम्मेलन के दौरान शी जिनपिंग ने अमेरिकी वित्तीय प्रणाली के समानांतर एक वैकल्पिक इकोसिस्टम खड़ा करने के लिए तीन प्रमुख दांव चले:

  • आक्रामक डी-डॉलराइजेशन (De-Dollarization) और ब्रिक्स करेंसी का दबाव: रूस के साथ मिलकर चीन ने डॉलर और स्विफ्ट (SWIFT) बैंकिंग नेटवर्क को दरकिनार करने के लिए एक साझा ब्रिक्स भुगतान तंत्र और भविष्य की साझा मुद्रा की वकालत की। चूंकि रूस, ईरान और मिस्र पहले से अमेरिकी प्रतिबंधों और डॉलर की कमी से जूझ रहे हैं, चीन ने उन्हें राहत देने के बहाने अंतरराष्ट्रीय व्यापार में युआन (RMB) के इस्तेमाल को डिफ़ॉल्ट करेंसी बनाने की बिसात बिछाई।

  • 'इंटीग्रेटेड मार्केट' और टैरिफ में छूट: जिनपिंग ने ब्रिक्स देशों के बीच स्पेशल इकोनॉमिक जोन्स (SEZ) और मुक्त व्यापार जैसा ढांचा बनाने का प्रस्ताव रखा, ताकि अमेरिकी बाजारों में टैरिफ बढ़ने पर चीनी फैक्ट्रियों का बना माल बिना किसी रुकावट के ब्रिक्स सदस्य देशों में खप सके।

  • डिजिटल और तकनीकी एकाधिकार: ओपन-सोर्स लार्ज लैंग्वेज मॉडल (LLM) और साझा क्लाउड नेटवर्क पेश कर चीन ने पश्चिमी तकनीकी कंपनियों (गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, एनवीडिया) के विकल्प के रूप में खुद को ग्लोबल साउथ के 'टेक प्रोवाइडर' के रूप में पेश किया।

क्या चीन वाकई बन जाएगा दुनिया का बॉस?

चीन की इस महत्वाकांक्षा के रास्ते में कई गंभीर बुनियादी और संरचनात्मक अड़चनें हैं:

  • युआन पर वैश्विक अविश्वास: किसी मुद्रा को दुनिया की रिजर्व करेंसी बनने के लिए उस देश की वित्तीय प्रणाली में पूरी पारदर्शिता और फ्री कैपिटल फ्लो (मुक्त पूंजी प्रवाह) जरूरी होता है। चीन की मुद्रा 'रेनमिनबी/युआन' पूरी तरह चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) के नियंत्रण में है और वहां कड़े कैपिटल कंट्रोल्स लागू हैं। कोई भी देश अपने विदेशी मुद्रा भंडार को ऐसे देश की मर्जी पर नहीं छोड़ना चाहेगा।

  • चीन की अपनी आंतरिक मंदी: रियल एस्टेट संकट, घटती घरेलू खपत और बढ़ती बेरोजगारी के बीच चीन खुद गहरे आर्थिक दबाव में है। वह अमेरिका को चुनौती देने के लिए दूसरों का सहारा तो ढूंढ रहा है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय वित्तीय स्थिरता की गारंटी देने की स्थिति में नहीं है।

  • ब्रिक्स के नए सदस्यों की विविधता: ब्रिक्स अब केवल पांच देशों का समूह नहीं है। इसमें यूएई और सऊदी अरब जैसे समृद्ध ऊर्जा निर्यातक भी हैं, जिनका अमेरिका और पश्चिमी बैंकों से गहरा वित्तीय जुड़ाव है। वे डॉलर को पूरी तरह खारिज करके चीनी युआन के मातहत काम करने को तैयार नहीं हैं।

क्या भारत बनेगा चीन के इस प्लान का हिस्सा?

इस सवाल का सीधा और सपाट जवाब है: बिल्कुल नहीं। भारत ने नई दिल्ली सम्मेलन के दौरान ही साफ कर दिया कि वह चीन के एंटी-वेस्टर्न या चीन-केंद्रित एजेंडे में मोहरा नहीं बनेगा।

भारत का कूटनीतिक और आर्थिक रुख इन 4 स्तंभों पर बिल्कुल स्पष्ट है:

1. 'नॉन-वेस्ट' होना मंजूर, 'एंटी-वेस्ट' बनना नहीं

विदेश मंत्री एस. जयशंकर और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बार-बार यह स्पष्ट कर चुके हैं कि भारत और ब्रिक्स 'नॉन-वेस्टर्न' (Non-Western) मंच हैं, 'एंटी-वेस्टर्न' (Anti-Western) नहीं। भारत अमेरिका, यूरोप और जापान के साथ 'क्वाड' (QUAD) और आई2यू2 (I2U2) जैसे मंचों पर रणनीतिक साझीदार है। भारत किसी भी ऐसे कदम का समर्थन नहीं करेगा जो अमेरिका के साथ उसके विशाल व्यापार और तकनीकी साझेदारी को नुकसान पहुंचाए।

2. डॉलर के बदले युआन की गुलामी नामंजूर

भारत का मानना है कि अगर अंतरराष्ट्रीय व्यापार से डॉलर की निर्भरता घटानी भी है, तो उसकी जगह चीनी युआन का दबदबा कायम नहीं होना चाहिए। भारत की प्राथमिकता 'लोकल करेंसी सेटलमेंट' (स्थानीय मुद्राओं में व्यापार) है—यानी भारत जब यूएई से तेल खरीदे तो भारतीय रुपये (INR) और दिरहम (AED) में व्यापार हो, न कि चीनी युआन में। भारत ने ब्रिक्स में किसी भी 'साझा मुद्रा' के विचार को स्पष्ट रूप से खारिज किया है।

3. चीनी सामान की डंपिंग रोकने की नीति

भारत पहले ही चीन के साथ 100 अरब डॉलर से अधिक के भारी व्यापार घाटे (Trade Deficit) से जूझ रहा है। यदि भारत ब्रिक्स को एक एकीकृत मुक्त व्यापार क्षेत्र (Free Trade Area) बनने देता है, तो भारत का घरेलू मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर (मेक इन इंडिया) तबाह हो जाएगा। भारत कभी भी ब्रिक्स के जरिए चीन को अपना बैकडोर मार्केट नहीं बनने देगा।

4. 'मल्टीपोलर वर्ल्ड' में 'मल्टीपोलर एशिया' की शर्त

भारत बहुध्रुवीय विश्व (Multipolar World) का समर्थन करता है, लेकिन भारत का साफ कहना है कि बहुध्रुवीय विश्व तभी संभव है जब एशिया भी बहुध्रुवीय (Multipolar Asia) रहे। यानी पूरे एशिया पर केवल चीन की दादागिरी नहीं चल सकती।

चीन के मंसूबों के आगे भारत ही है सबसे बड़ी दीवार

ब्रिक्स के भीतर भारत की मौजूदगी ही वह सबसे बड़ा कारण है जिसकी वजह से चीन इस समूह को 'नाटो' या 'जी-7' के खिलाफ अपना निजी हथियार नहीं बना पा रहा है। भारत ने नई दिल्ली घोषणापत्र में यह सुनिश्चित किया कि ब्रिक्स का ध्यान केवल विकासशील देशों की आवाज (Global South), वैश्विक संस्थाओं में सुधार (UNSC/WTO रिफॉर्म्स) और व्यावहारिक सहयोग तक सीमित रहे, न कि पश्चिमी देशों के खिलाफ किसी नए शीत युद्ध (Cold War) का केंद्र बने।

चीन भले ही अमेरिका को नीचा दिखाकर खुद को विकासशील दुनिया का 'बॉस' साबित करने का दांव चल रहा हो, लेकिन भारत की सतर्कता और स्वतंत्र विदेश नीति ने साफ कर दिया है कि नई दिल्ली किसी एक महाशक्ति की धौंस खत्म करने के नाम पर दूसरे विस्तारवादी देश के आगे कभी घुटने नहीं टेकेगी।