हाई कोर्ट ने ‘तलाक-ए-हसन’ को बताया वैध कानूनी प्रक्रिया, दखल से किया इनकार; जानिए बैन हो चुके तीन तलाक से कैसे अलग है यह तरीका
मुस्लिम समुदाय में तलाक के तौर-तरीकों को लेकर चल रही कानूनी बहसों के बीच उच्च न्यायालय (High Court) ने 'तलाक-ए-हसन' (Talaq-e-Hasan) की वैधता पर एक अहम व्यवस्था दी है। अदालत ने इस प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगाने या इसे अवैध घोषित करने वाली याचिकाओं पर हस्तक्षेप से इनकार करते हुए स्पष्ट किया है कि यह प्रक्रिया कानूनन वैध और शरई नियमों के तहत मान्य है।
अदालतों ने अपने फैसलों में यह साफ किया है कि संसद द्वारा पारित 'मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 2019' (Muslim Women Protection of Rights on Marriage Act, 2019) केवल 'तलाक-ए-बिद्दत' यानी एक झटके में दिए जाने वाले 'इंस्टेंट तीन तलाक' को गैर-कानूनी और दंडनीय अपराध बनाता है। 2019 का यह कानून पारंपरिक और चरणबद्ध तरीके से दिए जाने वाले 'तलाक-ए-हसन' या 'तलाक-ए-अहसन' पर लागू नहीं होता।
क्या होता है 'तलाक-ए-हसन' और कैसे काम करती है इसकी प्रक्रिया?
'तलाक-ए-हसन' को इस्लामिक पर्सनल लॉ में 'तलाक-उस-सुन्नत' (Talaq-us-Sunnat) की श्रेणी में एक स्वीकृत और अनुशासित प्रक्रिया माना गया है:
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तीन महीनों में तीन अलग-अलग घोषणाएं: इसमें शौहर अपनी पत्नी को एक ही बार में तीन बार तलाक नहीं बोल सकता। तलाक की पहली घोषणा के बाद कम से कम 30 दिनों (एक माह/एक तुह्र यानी माहवारी के बीच की अवधि) का अनिवार्य अंतराल रखा जाता है।
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सुलह की पूरी गुंजाइश (Revocable Period): पहली घोषणा के बाद यदि दोनों पक्षों के बीच बातचीत, मध्यस्थता या परिवार के हस्तक्षेप से सुलह हो जाती है या वे फिर से साथ रहने लगते हैं, तो तलाक स्वतः निरस्त (Revoke) हो जाता है।
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दूसरी घोषणा: यदि एक महीने बाद भी विवाद नहीं सुलझता, तो दूसरे महीने में दूसरी बार तलाक बोला जाता है। इस दौरान भी सुलह और समझौता करने का अवसर खुला रहता है।
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तीसरी घोषणा और अंतिम विच्छेद: यदि पूरे 90 दिनों की इद्दत अवधि के दौरान सुलह का कोई रास्ता नहीं निकलता और तीसरे महीने में तीसरी बार तलाक उच्चारित किया जाता है, तभी जाकर यह विवाह पूरी तरह विच्छेदित (Irrevocable) माना जाता है।
'तलाक-ए-हसन' और बैन हो चुके 'तीन तलाक' (तलाक-ए-बिद्दत) में मुख्य अंतर
अक्सर आम चर्चाओं में लोग इन दोनों प्रक्रियाओं को एक समझ लेते हैं, जबकि कानूनी और धार्मिक दृष्टि से दोनों में जमीन-आसमान का फर्क है:
| पहलू | तीन तलाक (Talaq-e-Biddat) | तलाक-ए-हसन (Talaq-e-Hasan) |
| प्रक्रिया की रफ्तार | एक ही बैठक में, फोन या मैसेज पर एक साथ 3 बार 'तलाक' बोलना। | तीन अलग-अलग महीनों में 30-30 दिन के अंतराल पर घोषणा। |
| सुलह (Reconciliation) का मौका | तुरंत विवाह खत्म, पछतावे या समझौते की कोई कानूनी गुंजाइश नहीं। | पहले दो महीनों तक किसी भी वक्त साथ रहने पर तलाक रद्द हो जाता है। |
| वर्तमान कानूनी स्थिति | सुप्रीम कोर्ट द्वारा असंवैधानिक और 2019 के कानून में 3 साल तक की जेल। | अदालतों द्वारा गैर-अपराधिक और शरीयत कानून के तहत वैध प्रक्रिया मान्य। |
| मध्यस्थता (Arbitration) | इसमें किसी पंच या परिवार की सुनवाई का समय नहीं मिलता। | दो घोषणाओं के बीच रिश्तेदारों और मध्यस्थों द्वारा सुलह के प्रयास अनिवार्य माने जाते हैं। |
महिलाओं के अधिकारों और लैंगिक समानता की बहस
भले ही उच्च न्यायालयों ने इसे 2019 के कानून के दायरे से बाहर और वैध माना हो, लेकिन 'तलाक-ए-हसन' की संवैधानिकता को लेकर सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) में कई जनहित याचिकाएं लंबित हैं।
याचिकाकर्ताओं की दलील है कि यह अधिकार केवल पुरुषों के पास एकतरफा (Unilateral) रूप से केंद्रित है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 15 (भेदभाव का निषेध) और अनुच्छेद 21 (गरिमापूर्ण जीवन) का हनन करता है। वहीं, इसके पक्षधरों का तर्क है कि जिस तरह महिलाओं को 'खुला' (Khula) के जरिए विवाह से अलग होने का अधिकार प्राप्त है, उसी तरह पुरुषों के लिए 'तलाक-ए-हसन' एक संतुलित और सोच-समझकर कदम उठाने वाली प्रक्रिया है, जिसमें कोई मनमानी या जल्दबाजी नहीं होती।
हाई कोर्ट के इस रुख से उन मामलों में राहत मिली है जहां पतियों पर तलाक-ए-हसन का नोटिस भेजने पर भी 'तीन तलाक कानून' के तहत आपराधिक एफआईआर दर्ज कराने की कोशिश की जा रही थी। अदालत ने साफ कर दिया है कि पुलिस या निचली अदालतें हर प्रकार के तलाक को 'तलाक-ए-बिद्दत' मानकर आपराधिक कार्रवाई शुरू नहीं कर सकतीं।