14 हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स तबाह होने के बाद अंधेरे में डूबा पड़ोसी देश, पावर ग्रिड संभालने के लिए भारत से मांग सकता है इमरजेंसी बिजली सप्लाई
हिमालयी देश नेपाल में 26 अगस्त को रसुवा और त्रिशूली नदी घाटी में आए भीषण फ्लैश फ्लड और मलबे के प्रलयंकारी सैलाब ने न केवल सैकड़ों जिंदगियों और बस्तियों को तबाह किया है, बल्कि देश की समूची ऊर्जा रीढ़ को भी ध्वस्त कर दिया है। तिब्बत सीमा से सटे इलाकों में ग्लेशियर टूटने और मलबे के तीव्र बहाव के कारण नदी किनारे स्थित 14 से अधिक प्रमुख हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स (चालू और निर्माणाधीन) पानी और गाद में समा चुके हैं। इस अप्रत्याशित तबाही के कारण नेपाल के राष्ट्रीय पावर ग्रिड से अचानक 430 मेगावाट से अधिक बिजली गायब हो गई है, जिससे राजधानी काठमांडू सहित देश के बड़े हिस्से में गंभीर बिजली संकट और ब्लैकआउट का खतरा पैदा हो गया है। मानसून के जिन महीनों में नेपाल भारत को अतिरिक्त पनबिजली का निर्यात करता था, अब उन्हीं महीनों में अपनी घरेलू जरूरतों को पूरा करने और ग्रिड को टूटने से बचाने के लिए नेपाल को भारत से आपातकालीन बिजली सहायता (पावर इंपोर्ट) लेने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।
14 हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स मलबे में तब्दील: 748 मेगावाट की स्थापित व निर्माणाधीन क्षमता को झटका
नेपाल विद्युत प्राधिकरण (NEA) और ऊर्जा मंत्रालय द्वारा जारी किए गए प्रारंभिक क्षति आकलन के अनुसार, भोटेकोशी-त्रिशूली नदी कॉरिडोर में स्थित कुल 748 मेगावाट क्षमता की 14 जलविद्युत परियोजनाएं इस जलप्रलय की सीधी चपेट में आई हैं। इनमें 354 से 430 मेगावाट क्षमता वाले 9 चालू पावर प्लांट्स और लगभग 394 मेगावाट क्षमता के 5 निर्माणाधीन प्रोजेक्ट्स शामिल हैं। नेपाल की कुल स्थापित विद्युत उत्पादन क्षमता लगभग 4,200 से 4,300 मेगावाट है, जिसका 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा अकेले हाइड्रोपावर पर निर्भर है। ऐसे में राष्ट्रीय उत्पादन क्षमता के लगभग 8 से 10 प्रतिशत हिस्से का एक ही झटके में पूरी तरह बंद हो जाना देश के ऊर्जा इतिहास का सबसे बड़ा ढांचागत आघात है।
तबाही का सबसे खौफनाक मंजर 111 मेगावाट क्षमता वाले रसुवागढ़ी हाइड्रोपावर प्लांट में देखने को मिला। नेपाल के राष्ट्रीय ग्रिड का मुख्य आधार माना जाने वाला यह अत्याधुनिक प्लांट महज डेढ़ साल पहले दिसंबर 2024 में ही पूरी तरह से चालू हुआ था। बाढ़ के प्रचंड वेग ने इसके मुख्य पावरहाउस, टरबाइन और 220 केवी के विशाल सब-स्टेशन को पूरी तरह नष्ट कर दिया है। इसके ठीक नीचे स्थित 60 मेगावाट का अपर त्रिशूली-3A प्लांट भी पूरी तरह गाद और पानी में डूब गया है। इसके अलावा त्रिशूली (24 मेगावाट), देवीघाट (14.1 मेगावाट), चिलिमे, सांजेन खोला और निर्माणाधीन अपर त्रिशूली-1 (216 मेगावाट) जैसे विशाल प्रोजेक्ट्स के स्ट्रक्चर बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए हैं। लांगटांग खोला प्रोजेक्ट में तो सुरंग के भीतर काम कर रहे दर्जनों कर्मचारियों के लापता होने की खबर है।
मॉनसून में सरप्लस से अचानक घाटे में: कैसे पलटा नेपाल का ऊर्जा संतुलन?
नेपाल की मौसमी ऊर्जा प्रणाली का चक्र पूरी तरह हिमालयी नदियों के बहाव पर टिका होता है। सामान्य वर्षों में मॉनसून के दौरान (जून से अक्टूबर) जब नदियां उफान पर होती हैं, तो नेपाल अपनी आवश्यकता से अधिक बिजली का उत्पादन करता है और अतिरिक्त बिजली भारत को बेचता है। वहीं सर्दियों के महीनों में जब ग्लेशियरों का पिघलना और नदियों का जलस्तर कम हो जाता है, तब उत्पादन घटने पर नेपाल भारत से बिजली आयात करता है।
लेकिन इस प्राकृतिक आपदा ने पूरे ऊर्जा संतुलन को उलट दिया है। चालू प्लांट्स के तबाह होने और सब-स्टेशनों के बह जाने के कारण घरेलू ट्रांसमिशन लाइनें टूट गई हैं। नेपाल ऊर्जा मंत्रालय के प्रवक्ता शालिग्राम भंडारी के अनुसार, देश के सामने अब घरेलू मांग को बनाए रखना ही सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। यदि तुरंत वैकल्पिक स्रोत से बिजली की भरपाई नहीं की गई, तो देश में बड़े पैमाने पर औद्योगिक शटडाउन और 8 से 12 घंटे की दैनिक लोड-शेडिंग का दौर लौट सकता है।
भारत की क्रॉस-बॉर्डर ग्रिड बनेगी जीवनरेखा: ढलकेबर-मुजफ्फरपुर लाइन से मदद की तैयारी
इस ऊर्जा आपातकाल से निपटने के लिए नेपाल सरकार ने भारत के साथ जुड़े सीमा-पार ट्रांसमिशन नेटवर्क की ओर देखना शुरू किया है। नेपाल विद्युत प्राधिकरण के अधिकारियों के अनुसार, प्रभावित प्लांट्स की मरम्मत और नए सब-स्टेशन स्थापित करने में महीनों का समय लगेगा। ऐसे में बिजली की तत्काल कमी को पाटने के लिए नेपाल भारत के पावर एक्सचेंज मार्केट और द्विपक्षीय समझौतों के तहत अतिरिक्त आयात का अनुरोध करने की रूपरेखा बना रहा है।
भारत और नेपाल के बीच 400 केवी की 'ढलकेबर-मुजफ्फरपुर क्रॉस-बॉर्डर ट्रांसमिशन लाइन' पहले से ही पूरी तरह चालू है, जिसके जरिए लगभग 1,000 मेगावाट तक बिजली का आदान-प्रदान किया जा सकता है। इसके अलावा अन्य क्षेत्रीय इंटरकनेक्शन लाइनों (जैसे टनकपुर और गोरखपुर लिंक) के जरिए भी बिजली आपूर्ति को बढ़ाया जा सकता है। भारतीय ग्रिड से अतिरिक्त बिजली मिलने पर काठमांडू वैली, पोखरा और तराई के प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों में बिना किसी रुकावट के निर्बाध बिजली आपूर्ति बहाल रखी जा सकेगी।
10,000 मेगावाट एक्सपोर्ट समझौते और भावी निवेश पर बड़ा असर
यह आपदा ऐसे समय में आई है जब भारत और नेपाल के बीच ऊर्जा क्षेत्र में ऐतिहासिक साझेदारी नए मुकाम पर पहुंच रही थी। जनवरी 2024 में दोनों देशों के बीच अगले 10 वर्षों में नेपाल से भारत को 10,000 मेगावाट स्वच्छ जलविद्युत निर्यात करने का ऐतिहासिक दीर्घकालिक समझौता हुआ था। नेपाल ने वर्ष 2030 तक 13 गीगावाट और 2045 तक 26 गीगावाट उत्पादन का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा था।
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि रसुवा कॉरिडोर में 14 प्रोजेक्ट्स के ध्वस्त होने से नेपाल के निर्यात लक्ष्यों और निर्माणाधीन परियोजनाओं की समयसीमा को गहरा झटका लगा है। इन संयंत्रों के पुनर्निर्माण में अरबों डॉलर का खर्च आएगा। इसके साथ ही, हिमालयी घाटियों में बढ़ते जलवायु परिवर्तन के खतरों, ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट (GLOF) और मलबे के प्रवाह (Debris Flow) ने पनबिजली परियोजनाओं की इंजीनियरिंग डिजाइन, बीमा और सुरक्षा मानकों पर भी नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
आपदा राहत के साथ ऊर्जा सुरक्षा में भी भारत का अटूट साथ
संकट की इस घड़ी में भारत सरकार ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि वह नेपाल की हर संभव सहायता के लिए 24 घंटे तैयार है। भारतीय वायुसेना के विशेष विमानों द्वारा 47.5 टन से अधिक आपातकालीन राहत सामग्री, दवाइयां और जनरेटर काठमांडू पहुंचाए जा चुके हैं। अब यदि नेपाल औपचारिक रूप से बिजली आपूर्ति बढ़ाने का अनुरोध करता है, तो भारत का केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) और ग्रिड कंट्रोलर तुरंत तकनीकी समन्वय स्थापित कर अतिरिक्त मेगावाट बिजली रिलीज कर सकते हैं। यह कदम दोनों देशों के बीच 'नेबरहुड फर्स्ट' नीति और साझा ऊर्जा सुरक्षा की अटूट साझेदारी को एक बार फिर साबित करेगा।