देश में पर्याप्त बिजली, फिर भी क्यों हो रही कटौती? उत्पादन सरप्लस होने के बावजूद बिजली गुल रहने की 5 असली वजहें
कागजों और आधिकारिक आंकड़ों पर नजर डालें तो भारत आज ऊर्जा के क्षेत्र में 'पावर सरप्लस' यानी बिजली की अधिकता वाला देश बन चुका है। देश की कुल स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता (Installed Power Capacity) 520 गीगावाट (GW) का ऐतिहासिक आंकड़ा पार कर चुकी है, जबकि पीक आवर्स के दौरान देश में बिजली की अधिकतम मांग लगभग 240 से 270 गीगावाट के आसपास ही रहती है।
गणित के हिसाब से देश में मांग से कहीं अधिक बिजली पैदा करने की क्षमता मौजूद है। बावजूद इसके, चिलचिलाती गर्मी, उमस भरे मौसम या सामान्य दिनों में भी देश के कई छोटे-बड़े शहरों, कस्बों और ग्रामीण इलाकों में घंटों अघोषित बिजली कटौती (Load Shedding) का सामना करना पड़ता है। आम जनता के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि "जब देश में बिजली पर्याप्त है, तो फिर कटौती क्यों?"
बिजली उत्पादन (Generation), पारेषण (Transmission) और वितरण (Distribution) की कड़ी में छिपी वो 5 मुख्य वजहें इस अंतर को स्पष्ट करती हैं:
1. बिजली कंपनियों (DISCOMs) की माली हालत और 'नो-परचेज' फॉर्मूला
बिजली उत्पादन केंद्र (पावर प्लांट्स) केंद्रीय या निजी कंपनियों के पास होते हैं, लेकिन आम जनता के घरों तक बिजली पहुंचाने का काम राज्यों की वितरण कंपनियां (DISCOMs) करती हैं।
-
घाटे में डूबी डिस्कॉम्स: बिजली चोरी, बिलों की कम वसूली और राजनीतिक कारणों से सस्ती या मुफ्त बिजली देने के चलते कई राज्यों की डिस्कॉम्स भारी वित्तीय संकट में रहती हैं।
-
बिजली खरीदने से परहेज: ऊर्जा एक्सचेंजों (Power Exchanges) में बिजली उपलब्ध होने के बावजूद कई राज्यों की बिजली कंपनियां पीक आवर्स के दौरान महंगी दरों पर अतिरिक्त बिजली खरीदने से बचती हैं। घाटे से बचने के लिए वे अतिरिक्त बिजली खरीदने के बजाय सीधे 'लोड शेडिंग' (बिजली काट देना) का रास्ता चुनती हैं।
2. ट्रांसमिशन और लोकल डिस्ट्रीब्यूशन का जर्जर बुनियादी ढांचा
बिजली संयंत्रों में बिजली पैदा हो जाना ही काफी नहीं है, उसे उपभोक्ता के मीटर तक सुरक्षित पहुंचाना सबसे बड़ी चुनौती है।
-
लोकल फॉल्ट और ओवरलोडिंग: कॉलोनियों और मोहल्लों में लगे डिस्ट्रीब्यूशन ट्रांसफॉर्मर अक्सर 10-15 साल पुराने होते हैं। गर्मियों में जब हर घर में एसी और कूलर एक साथ चलते हैं, तो ओवरलोडिंग के कारण ट्रांसफॉर्मर फुंक जाते हैं या उनमें आग लग जाती है।
-
तार टूटना और मेंटेनेंस: भूमिगत केबलिंग (Underground Cabling) के अभाव में तेज हवा, आंधी या बारिश होते ही हाई-टेंशन तार टूट जाते हैं या शॉर्ट सर्किट हो जाता है। यह कटौती बिजली की कमी से नहीं, बल्कि लोकल इंफ्रास्ट्रक्चर की खराबी के कारण होती है।
3. सोलर एनर्जी की 'इवनिंग पीक' (Evening Peak) समस्या
भारत में रिन्यूएबल एनर्जी—विशेषकर सौर ऊर्जा (Solar Power)—का उत्पादन तेजी से बढ़ा है। लेकिन सौर ऊर्जा की एक प्राकृतिक सीमा है:
-
दिन के समय जब धूप खिली होती है, तो ग्रिड में पर्याप्त सोलर बिजली होती है।
-
लेकिन जैसे ही शाम ढलती है (शाम 7 बजे से रात 11 बजे तक), सोलर उत्पादन शून्य हो जाता है, जबकि ठीक उसी समय घरों में एसी, पंखे, टीवी और लाइटें चालू होने से बिजली की मांग अपने चरम (Peak Demand) पर पहुंच जाती है।
-
वर्तमान में देश में बड़े पैमाने पर बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) पूरी तरह स्थापित नहीं हुए हैं। शाम के इस लोड को संभालने के लिए जब तक थर्मल या हाइड्रो प्लांट्स को तेजी से रैंप-अप नहीं किया जाता, तब तक कुछ इलाकों में ग्रिड बैलेंस करने के लिए पावर कट करना पड़ता है।
4. ट्रांसमिशन और कमर्शियल (AT&C) नुकसान
बिजली आपूर्ति में 'एग्रीगेट टेक्निकल एंड कमर्शियल' (AT&C) लॉस एक बड़ी चुनौती बना हुआ है:
-
बिजली संयंत्र से निकलते वक्त जो बिजली 100 यूनिट होती है, वह उपभोक्ता तक पहुंचते-पहुंचते कई राज्यों में 15% से 25% तक ट्रांसमिशन लॉस और बिजली चोरी (कटिया कनेक्शन) के कारण गायब हो जाती है।
-
जिन इलाकों में लाइन लॉस (बिजली चोरी) सबसे ज्यादा होता है, वहां बिजली विभाग वित्तीय नुकसान रोकने के लिए जानबूझकर दिन में 4 से 6 घंटे की कटौती करता है।
5. ग्रिड की सुरक्षा और ट्रिपिंग से बचाव
भारत का राष्ट्रीय पावर ग्रिड 'वन नेशन, वन ग्रिड, वन फ्रीक्वेंसी' पर काम करता है।
-
ग्रिड की फ्रीक्वेंसी 49.90 से 50.05 हर्ट्ज (Hz) के बीच स्थिर रहनी चाहिए।
-
यदि किसी राज्य में अचानक मांग क्षमता से बहुत ज्यादा बढ़ जाती है और ग्रिड फ्रीक्वेंसी खतरे के निशान से नीचे जाने लगती है, तो पूरे देश का ग्रिड फेल (ब्लैकआउट) होने से बचाने के लिए ऑटोमैटिक रिले सिस्टम उस विशेष फीडर की बिजली को तुरंत ट्रिप (बंद) कर देता है। इसे तकनीकी भाषा में 'ग्रिड स्टेबिलिटी कट' कहा जाता है।
समाधान क्या है?
बिजली कटौती की इस उलझन को सुलझाने के लिए केवल नए पावर प्लांट लगाना समाधान नहीं है। सरकार इसके लिए निम्नलिखित कदमों पर तेजी से काम कर रही है:
-
स्मार्ट मीटरिंग (RDSS स्कीम): देशभर में प्रीपेड स्मार्ट मीटर लगाए जा रहे हैं ताकि बिजली चोरी रुके और डिस्कॉम्स की बिलिंग 100% हो सके।
-
ग्रिड-स्केल बैटरी स्टोरेज: सोलर एनर्जी को स्टोर करने के लिए बड़े बैटरी स्टोरेज और पम्प्ड हाइड्रो स्टोरेज प्रोजेक्ट्स पर काम चल रहा है, ताकि शाम के समय पीक डिमांड को आसानी से पूरा किया जा सके।
-
लोकल इंफ्रास्ट्रक्चर अपग्रेड: सब-स्टेशनों की क्षमता बढ़ाने और ओवरहेड तारों को अंडरग्राउंड केबल में बदलने का काम तेज किया गया है।