तमिलनाडु विधानसभा में अनोखी बहस: 'नागदोषम' पर थलपति विजय के मंत्री ने दिया 'जलदोषम' वाला जवाब
दक्षिण भारत की राजनीति और विशेषकर तमिलनाडु की विधायी बैठकों में इन दिनों एक अलग ही सियासी और सांस्कृतिक माहौल देखने को मिल रहा है। मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली नव-गठित सरकार और विपक्षी दल द्रमुक (डीएमके) के बीच तीखी राजनीतिक बहसों के बीच सदन के भीतर कुछ ऐसे हल्के-फुल्के और मजेदार पल भी सामने आ रहे हैं, जो जनता का खूब ध्यान खींच रहे हैं। हाल ही में तमिलनाडु विधानसभा के प्रश्नकाल के दौरान एक ऐसा ही अनूठा वाकया देखने को मिला, जब सांप काटने की घटनाओं पर चर्चा के दौरान 'नागदोषम' (सर्प दोष) और 'जलदोषम' (सामान्य सर्दी-जुकाम) शब्दों को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जबरदस्त जुबानी जंग और हंसी-मजाक का दौर चल पड़ा। इस अनोखी बहस ने न केवल सदन में मौजूद सभी नेताओं को मुस्कुराने पर मजबूर कर दिया, बल्कि सोशल मीडिया पर भी इस बहस के चर्चे आम जनता के बीच तेजी से फैल गए हैं।
इस पूरी घटना की शुरुआत विधानसभा में प्रश्नकाल के दौरान हुई, जब राज्य के विभिन्न विभागों की अनुदान मांगों और जनहित के मुद्दों पर तीखी चर्चा चल रही थी। इसी बीच, राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ विपक्षी विधायक ओ. पनीरसेल्वम (ओपीएस) ने अपनी बात रखते हुए तमिलनाडु के कई जिलों में हाल के दिनों में सामने आई सांप काटने की बढ़ती घटनाओं का विशेष रूप से जिक्र किया। पनीरसेल्वम ने अपने ही अंदाज में चुटकी लेते हुए कहा कि राज्य के कई प्रभावित क्षेत्रों में हालात को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि वहां किसी प्रकार का 'नाग दोषम' यानी सर्प दोष सक्रिय हो गया है। उन्होंने तंज कसते हुए यह सुझाव भी दे डाला कि यदि इन इलाकों में इस प्रकार का कोई पारंपरिक या ज्योतिषीय दोष है, तो क्या सरकार इसे दूर करने के लिए विशेष पूजा-पाठ या धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन करेगी। उनके इस बयान के बाद सदन की दीर्घाओं में बैठे लोगों और विधायकों के बीच फुसफुसाहट और मुस्कान का दौर शुरू हो गया, क्योंकि किसी ने भी यह उम्मीद नहीं की थी कि सदन की गंभीर कार्यवाही में इस तरह के पौराणिक और ज्योतिषीय संदर्भों को जोड़ा जाएगा।
स्वास्थ्य मंत्री का वैज्ञानिक पलटवार और 'जलदोषम' वाला बयान
ओ. पनीरसेल्वम के इस ज्योतिषीय और हल्के-फुल्के तंज पर थलपति विजय सरकार के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री डॉ. के. जी. अरुणराज ने तुरंत और बेहद सधा हुआ लेकिन करारा जवाब दिया। स्वास्थ्य मंत्री ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली वर्तमान सरकार पूरी तरह से आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और तार्किक दृष्टिकोण पर विश्वास करती है, न कि किसी प्रकार के अंधविश्वास, तंत्र-मंत्र या 'दोष' जैसी धारणाओं पर। मंत्री ने दो टूक अंदाज में कहा कि राज्य के स्वास्थ्य बजट का इस्तेमाल किसी भी प्रकार के धार्मिक अनुष्ठानों या नाग दोष को शांत करने के लिए नहीं किया जाएगा, क्योंकि प्रशासन पूरी तरह से वैज्ञानिक उपायों और चिकित्सकीय सहायता पर निर्भर है।
अपने इस जवाब को और अधिक चुटीला बनाते हुए स्वास्थ्य मंत्री ने विपक्ष पर पलटवार करते हुए कहा कि वर्तमान में राज्य के भीतर यदि किसी बात का असर सबसे ज्यादा फैल रहा है, तो वह 'नागदोषम' नहीं बल्कि 'जलदोषम' यानी सामान्य सर्दी-जुकाम है। मंत्री की इस हाजिरजवाबी और 'जलदोषम' वाले ताने को सुनते ही सत्ता पक्ष की बेंचों पर बैठे विधायकों ने जोरदार ठहाके लगाए। मंत्री ने आगे यह भी जोड़ा कि यदि किसी विशेष विधायक को अपनी निजी आस्था के तहत ऐसे दोषों में विश्वास है, तो वे अपने निर्वाचन क्षेत्र में व्यक्तिगत स्तर पर ऐसे उपाय करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं, लेकिन सरकार केवल वैज्ञानिक और प्रशासनिक तरीकों से ही जनहित के कार्य करेगी। इसके बाद ओ. पनीरसेल्वम ने भी मजाकिया लहजे में यह कह दिया कि यदि मंत्री चाहें तो वे ऐसे दोषों को दूर करने वाले विशेष विशेषज्ञों की एक टीम उनकी मदद के लिए भेज सकते हैं, जिस पर स्वास्थ्य मंत्री ने साफ कर दिया कि उनकी ऐसी किसी भी प्रथा में न तो कोई रुचि है और न ही कोई आस्था।
इस दिलचस्प बहस के दौरान स्थिति में उस वक्त और गर्माहट आ गई जब लोक निर्माण और खेल विकास मंत्री आधार अर्जुन ने चर्चा में हस्तक्षेप किया। मंत्री आधार अर्जुन ने विपक्षी दल डीएमके पर निशाना साधते हुए कहा कि जो पार्टी खुद को महान सामाजिक सुधारक और तर्कवादी नेता पेरियार (ई.वी. रामासामी) के आदर्शों का सबसे बड़ा अनुयायी होने का दावा करती है, वही पार्टी आज विधानसभा के पटल पर 'दोष' और ज्योतिषीय मान्यताओं की बात कर रही है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि विजय सरकार पेरियार और अन्नादुरई के विचारों के मार्ग पर चलते हुए हर छोटी-बड़ी समस्या का समाधान अंधविश्वास या अनुष्ठानों के जरिए नहीं, बल्कि पूरी तरह से वैज्ञानिक, तार्किक और व्यावहारिक तरीकों से ढूंढ रही है।
विवाद को बढ़ता हुआ और बहस को एक अलग ही राजनीतिक मोड़ लेते देख अंततः विपक्ष के नेता और डीएमके के प्रमुख चेहरे उदयनिधि स्टालिन ने खुद मोर्चा संभाला। उदयनिधि स्टालिन ने स्पष्टीकरण देते हुए सदन को बताया कि उनके दल के वरिष्ठ सदस्य ओ. पनीरसेल्वम के कहने का वास्तविक उद्देश्य किसी अंधविश्वास को बढ़ावा देना बिल्कुल नहीं था, बल्कि उनका इशारा आम सर्दी-जुकाम यानी 'जलदोषम' की तरफ ही था। उन्होंने सदन को यह भी याद दिलाया कि पार्टी के उपनेता और पूर्व मंत्री के. एन. नेहरू पिछले दो दिनों से गंभीर सर्दी-जुकाम से पीड़ित होने के कारण अस्वस्थ चल रहे हैं और पनीरसेल्वम का संदर्भ असल में उसी स्वास्थ्य समस्या से जुड़ा हुआ था।
सदन के भीतर माहौल को पूरी तरह तनावमुक्त और खुशनुमा बनाए रखने के लिए विधानसभा के अध्यक्ष जे. सी. डी. प्रभाकर ने तुरंत हस्तक्षेप किया। अध्यक्ष ने मुस्कुराते हुए हल्के-फुल्के अंदाज में टिप्पणी की कि यदि के. एन. नेहरू को 'जलदोषम' यानी सर्दी-जुकाम है, तो बाकी सदस्यों को भी थोड़ा सतर्क रहना चाहिए ताकि यह संक्रमण दूसरों तक न फैले। अध्यक्ष की इस अंतिम टिप्पणी के साथ ही सदन में एक बार फिर से जोरदार ठहाके गूंज उठे और इस अनूठी बहस का सुखद अंत हुआ। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस प्रकार की हल्की-फुल्की और व्यंग्यात्मक बहसें भले ही सदन के मुख्य वैचारिक संघर्ष से अलग नजर आती हों, लेकिन ये लोकतांत्रिक संस्थाओं में संवाद की जीवंतता और राजनेताओं की आपसी सहजता को जरूर दर्शाती हैं, जो अंततः संसदीय लोकतंत्र की खूबसूरती को बनाए रखती हैं।