'जमीन-मकान सब है पर दुल्हन नहीं मिलती', कर्नाटक के कुंवारे किसानों की डीके शिवकुमार से गुहार
कर्नाटक के मैसूरु जिले के पेरियापटना में आयोजित एक सरकारी जनसुनवाई कार्यक्रम के दौरान उस समय अजीबोगरीब और भावुक स्थिति बन गई, जब एक ग्रामीण किसान अपनी शिकायत लेकर सीधे मंच पर पहुंच गया। सैकड़ों लोगों और अधिकारियों की मौजूदगी में उसने किसी सड़क, बिजली या पानी की शिकायत नहीं की, बल्कि सीधे तौर पर राज्य के नेतृत्व से हाथ जोड़कर कहा—"साहब! हमारे पास अपनी जमीन है, पक्का मकान है और खेती है, लेकिन शादी के लिए कोई लड़की नहीं मिल रही। अन्नदाता को कोई अपनी बेटी देने को तैयार नहीं है। कृपया सरकार हमारे लिए कोई 'दुल्हन योजना' शुरू करे।" इस अनोखी गुहार पर पहले तो कार्यक्रम में ठहाके गूंज उठे, लेकिन किसान के दर्द और आंकड़ों ने पूरे सभागार को एक गंभीर सामाजिक संकट पर सोचने को मजबूर कर दिया।
पेरियापटना की जनसुनवाई में गूंजा कुंवारे युवकों का दर्द
तालुक स्तर पर आम जनता की समस्याएं सुनने के लिए आयोजित 'जनस्पंदन' (प्रजासेवा) कार्यक्रम में तहसीलदार निसर्गा प्रिया के अनुसार करीब 1,400 शिकायतें और याचिकाएं दर्ज कराई गई थीं। इसी दौरान मंच पर पहुंचे स्थानीय युवक ने अपनी बात रखते हुए कहा कि आज ग्रामीण क्षेत्रों में शादी का संकट इतना भयावह हो चुका है कि 35 से 40 वर्ष की आयु पार कर चुके लाखों युवा आज भी अविवाहित घूमने को मजबूर हैं। युवक ने बेहद गंभीर लहजे में कहा कि लोग इसे सुनकर हंस रहे हैं, लेकिन हकीकत यह है कि शादी न होने और सामाजिक तानों के चलते कई ग्रामीण युवक गहरे अवसाद और मानसिक तनाव में जी रहे हैं, यहां तक कि कुछ हताश होकर आत्महत्या जैसे आत्मघाती कदम तक उठाने को मजबूर हो रहे हैं।
'खेती की जमीन से ज्यादा सरकारी चपरासी की नौकरी को तरजीह'
युवक ने ग्रामीण समाज में आ रहे बुनियादी सोच के बदलाव को उजागर करते हुए बताया कि शादी के बाजार में अब पारंपरिक पैमानों की कोई अहमियत नहीं रह गई है। पहले जहां कई एकड़ उपजाऊ खेती की जमीन और पुश्तैनी जायदाद को संपन्नता और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता था, वहीं आज दुल्हन के परिवार वाले खेती करने वाले लड़कों से अपनी बेटियों की शादी करने से साफ इनकार कर रहे हैं। चाहे युवक के पास 10 एकड़ जमीन हो और वह सालाना लाखों रुपये कमाता हो, फिर भी अभिभावक किसी छोटे शहर में मामूली वेतन वाली प्राइवेट या सरकारी नौकरी करने वाले लड़के को अपनी पहली पसंद बना रहे हैं। इसका नतीजा यह है कि मेहनत-मजदूरी कर मिट्टी से सोना उगाने वाले किसानों के बेटों को समाज में शादी के अयोग्य समझा जाने लगा है।
'इसे मजाक मत समझिए': नेताजी की हंसी पर किसान की दो टूक
शुरुआत में इस अनोखी अर्जी को सुनकर मंच पर मौजूद नेताओं और अधिकारियों के साथ डीके शिवकुमार भी अपनी हंसी नहीं रोक पाए। लेकिन फरियादी ने तुरंत हाथ जोड़कर टोकते हुए कहा कि इसे कृपया मजाक या चुटकुला न समझा जाए। उसने कहा कि यह केवल उसकी व्यक्तिगत समस्या नहीं है, बल्कि कर्नाटक के कोने-कोने में रहने वाले लाखों किसान परिवारों और उनके माता-पिताओं की रात की नींद उड़ी हुई है। जब किसान ने भावुक होकर पूरे समाज के लिए अन्न पैदा करने वाले किसानों की इस उपेक्षा को रेखांकित किया, तो माहौल गंभीर हो गया। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए नेता ने भी माना कि गांवों से शहरों की ओर हो रहे पलायन और वेतनभोगी नौकरियों के प्रति बढ़ती सामाजिक प्राथमिकता ने ग्रामीण जीवनशैली और वैवाहिक संबंधों को बुरी तरह प्रभावित किया है। उन्होंने मजाकिया अंदाज में यह भी कहा कि सरकार इस पर विचार कर सकती है और अधिकारियों से बातचीत करेगी।
मांड्या से चामराजनगर तक पदयात्राएं और मठ बनाने की मांग
कर्नाटक के ग्रामीण इलाकों में शादी न हो पाने का यह संकट कोई नई बात नहीं है। इससे पहले राज्य के मांड्या जिले से भी ऐसी कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं, जिन्होंने पूरे देश का ध्यान खींचा था। मांड्या जिले के मद्दूर तालुक के मरालिगा गांव में 30 से अधिक कुंवारे युवकों ने अपनी ग्राम पंचायत को एक आधिकारिक ज्ञापन सौंपकर मांग की थी कि गांव में उनके लिए अलग से 'कुंवारों का मठ' बना दिया जाए, क्योंकि उनकी शादी की सारी उम्मीदें खत्म हो चुकी हैं। वहीं, मांड्या के अवेरेहल्ली गांव के करीब 80 से अधिक अविवाहित युवकों ने दुल्हन पाने की मन्नत के साथ चामराजनगर जिले के सुप्रसिद्ध माले महादेश्वर मंदिर तक 100 किलोमीटर से अधिक की कठिन पदयात्रा की थी।
खेती से विमुख होती नई पीढ़ी और गहराता जनसांख्यिकीय संकट
समाजशास्त्रियों का मानना है कि कर्नाटक के कावेरी बेसिन, मैसूरु, हासन, मांड्या और बेलगावी जैसे कृषि प्रधान जिलों में यह समस्या लगातार विकराल रूप धारण करती जा रही है। पढ़ी-लिखी युवतियां और उनके परिवार अब गांवों के कठिन जीवन, खेती की अनिश्चितता, मौसम की मार और फसल के उतार-चढ़ाव भरे जोखिम से दूर रहना चाहते हैं। हर कोई अपनी बेटी के लिए शहर की आरामदायक जिंदगी और हर महीने एक तय बैंक बैलेंस सुनिश्चित करना चाहता है। लेकिन इस सामाजिक बदलाव का सबसे डरावना पहलू यह है कि यदि खेती-किसानी करने वाले युवाओं का सामाजिक और पारिवारिक बहिष्कार इसी तरह जारी रहा, तो भविष्य में कोई भी युवा खेती करने का जोखिम नहीं उठाएगा, जिससे देश की खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के अस्तित्व पर ही संकट खड़ा हो सकता है।