टी ने सीएम रेवंत रेड्डी पर दागे तीखे सियासी बाण, तो मंत्री मां कोंडा सुरेखा की कैबिनेट से हो गई छुट्टी

टी ने सीएम रेवंत रेड्डी पर दागे तीखे सियासी बाण, तो मंत्री मां कोंडा सुरेखा की कैबिनेट से हो गई छुट्टी

दक्षिण भारत के प्रमुख राज्य तेलंगाना में सत्तारूढ़ कांग्रेस सरकार के भीतर अनुशासन, पारिवारिक वफादारी और सियासी वर्चस्व की रस्साकशी ने एक अत्यंत नाटकीय और विस्फोटक मोड़ ले लिया है। मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी ने अपनी कैबिनेट की प्रमुख महिला एवं पिछड़ा वर्ग (बीसी) चेहरा मानी जाने वाली वन एवं पर्यावरण तथा धर्मार्थ बंदोबस्ती मंत्री कोंडा सुरेखा को मंत्रिपरिषद से तत्काल प्रभाव से बर्खास्त करने की औपचारिक सिफारिश राज्यपाल को भेज दी है। इस अप्रत्याशित और कड़े फैसले की जड़ें किसी नीतिगत मतभेद या भ्रष्टाचार के आरोपों में नहीं, बल्कि कोंडा सुरेखा की बालिग बेटी कोंडा सुष्मिता पटेल द्वारा मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी और प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व पर खुले मंच से किए गए तीखे हमलों में जुड़ी हैं। बेटी की विवादित बयानबाजी पर मां द्वारा सार्वजनिक तौर पर माफी मांगने या पल्ला झाड़ने से इनकार करने के बाद छिड़े इस संग्राम ने 20 से अधिक कांग्रेस विधायकों को लामबंद कर दिया था। कैबिनेट से बेदखल होने के बाद कोंडा सुरेखा ने भी आक्रामक तेवर अपनाते हुए इसे 'प्रतिशोध की राजनीति' करार दिया और सवाल दागा कि जब बेटी एक स्वतंत्र नागरिक है, तो उसकी बातों की सजा एक मां और समर्पित जनप्रतिनिधि को क्यों दी जा रही है।

वारंगल से भड़की चिंगारी: बेटी सुष्मिता पटेल ने सीएम रेवंत रेड्डी पर क्या लगाए थे आरोप?

इस पूरे राजनीतिक बवाल की शुरुआत वारंगल जिले में आयोजित एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान हुई, जहां कोंडा सुरेखा की बेटी कोंडा सुष्मिता पटेल ने अपनी ही पार्टी के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी की कार्यशैली को सीधे कटघरे में खड़ा कर दिया। सुष्मिता ने अत्यंत आक्रामक अंदाज में आरोप लगाया कि कांग्रेस की सरकार बनने के बाद पार्टी के मूल, निष्ठावान और दशकों तक संघर्ष करने वाले पुराने कार्यकर्ताओं को हाशिए पर धकेला जा रहा है।

उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री अन्य दलों—विशेष रूप से तेलुगु देशम पार्टी (TDP) और भारत राष्ट्र समिति (BRS)—से कांग्रेस में शामिल हुए पैराशूट नेताओं और अपने चहेतों को सत्ता और संगठन में खुली प्राथमिकता दे रहे हैं। विवाद तब और गहरा गया जब सुष्मिता ने परकल (Parkal) विधानसभा सीट पर मौजूदा कांग्रेस विधायक के प्रति मुख्यमंत्री के खुले समर्थन पर सार्वजनिक रूप से आपत्ति जताई और परकल को ऐतिहासिक रूप से 'कोंडा परिवार का मजबूत गढ़' बताते हुए खुद वहां से अगला विधानसभा चुनाव लड़ने का एकतरफा ऐलान कर दिया। मुख्यमंत्री के कार्यक्षेत्र और पार्टी की टिकट वितरण नीति पर खुलेआम दिए गए इस चुनौती भरे बयान का वीडियो सोशल मीडिया पर जंगल की आग की तरह फैल गया, जिसने हैदराबाद से लेकर दिल्ली तक पार्टी आलाकमान के कान खड़े कर दिए।

20 विधायकों का खुला मोर्चा: 'बेटी बोले और मंत्री मां चुप रहे, यह अनुशासनहीनता है'

सुष्मिता पटेल के बयानों के बाद तेलंगाना कांग्रेस विधायक दल के भीतर असंतोष का ज्वालामुखी फूट पड़ा। पार्टी के करीब 20 से अधिक विधायकों, विधान परिषद सदस्यों (MLC) और कई वरिष्ठ मंत्रियों ने इसे मुख्यमंत्री के अधिकार और सरकार की सामूहिक साख पर सीधा हमला माना।

विधायकों के इस गुट ने सीधे तौर पर यह तर्क दिया कि कैबिनेट मंत्री पद की एक संवैधानिक और सामूहिक जवाबदेही (Collective Responsibility) होती है। यदि किसी कैबिनेट मंत्री के घर से ही मुख्यमंत्री की ईमानदारी और प्रशासनिक निष्पक्षता पर सवाल उठाए जाएंगे और मंत्री उस पर चुप्पी साधे रहेंगी, तो इससे सरकार की छवि धूमिल होगी और विपक्षी दलों को बैठे-बिठाए हमला करने का हथियार मिल जाएगा। विधायकों ने राज्य नेतृत्व से दो टूक मांग रखी कि कोंडा सुरेखा को सार्वजनिक रूप से अपनी बेटी के बयानों की निंदा करनी चाहिए और स्पष्ट रूप से पार्टी लाइन का समर्थन करना चाहिए। जब सुरेखा ने ऐसा करने से साफ मना कर दिया, तो विधायकों के इस दबाव समूह ने अनुशासन समिति और आलाकमान से मंत्री को पद से हटाने की अंतिम मांग रख दी।

'बेटी बालिग है, इसमें मेरा क्या दोष?': कारण बताओ नोटिस पर सुरेखा का कड़ा जवाब

विवाद को तूल पकड़ता देख तेलंगाना प्रदेश कांग्रेस कमेटी (टीपीसीसी) की अनुशासनात्मक कार्रवाई समिति ने 19 अगस्त को कोंडा सुरेखा को 'कारण बताओ नोटिस' थमा दिया और तीन दिनों के भीतर स्पष्टीकरण तलब किया। 20 अगस्त को सुरेखा द्वारा भेजे गए लिखित जवाब ने आग में घी डालने का काम किया।

सुरेखा ने नोटिस पर कड़ा ऐतराज जताते हुए लिखा कि उनकी बेटी सुष्मिता पटेल एक वयस्क, शिक्षित और स्वतंत्र सोच रखने वाली नागरिक हैं। उन्होंने अपने निजी विचार और राजनीतिक आकलन रखे हैं। सुरेखा ने सवाल किया कि एक बालिग संतान के बयानों के लिए उसकी मां से स्पष्टीकरण मांगना और मंत्री पद को दांव पर लगाना न्याय और लोकतंत्र के बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ है। उन्होंने अपने जवाब में स्पष्ट किया कि उन्होंने स्वयं कभी पार्टी या मुख्यमंत्री के खिलाफ कोई शब्द नहीं कहा, ऐसे में उन्हें जिम्मेदार ठहराना सरासर गलत है। जब उनसे यह पूछा गया कि क्या वे अपनी बेटी की आलोचना का खंडन करेंगी, तो सुरेखा ने दो टूक जवाब दिया कि अपनी बेटी के बयानों की निंदा करना उसे सार्वजनिक रूप से जलील और अपमानित करने जैसा होगा, जो एक मां के रूप में वे कतई नहीं कर सकतीं। उन्होंने राहुल गांधी के उस बयान का भी संदर्भ दिया जिसमें उन्होंने पितृसत्तात्मक सोच से बाहर निकलकर महिलाओं को स्वतंत्र आवाज देने की बात कही थी।

'सादे कागज पर बर्खास्तगी और बदले की राजनीति': फैसले के बाद सुरेखा का पलटवार

मुख्यमंत्री कार्यालय द्वारा कैबिनेट से हटाए जाने की औपचारिक सिफारिश की खबर बाहर आते ही कोंडा सुरेखा ने प्रेस वार्ता कर अपनी भड़ास निकाली। उन्होंने फैसले के तरीके पर सवाल उठाते हुए कहा कि उन्हें न तो कोई औपचारिक आदेश दिखाया गया, न लेटरहेड पर कोई लिखित सूचना दी गई, बल्कि केवल एक सादे कागज पर सूचना प्रसारित कर उनकी सार्वजनिक प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाई गई।

सुरेखा ने तीखा हमला बोलते हुए कहा, "मेरे पूरे राजनीतिक जीवन में मुझ पर भ्रष्टाचार का एक भी दाग नहीं है। मैंने अपने विभाग में पूरी ईमानदारी से काम किया है। मंत्री पद हमारे लिए केवल एक आभूषण जैसा है, सत्ता के बिना भी हम जनता के दिलों पर राज करते हैं।" उन्होंने आरोप लगाया कि उनके खिलाफ यह एक सुनियोजित साजिश है, जिसमें राजस्व मंत्री पोंगुलेटी श्रीनिवास रेड्डी, राज्यसभा सांसद वेम नरेंद्र रेड्डी और मुख्यमंत्री के कुछ करीबी लोग शामिल हैं। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी में वह राजनीतिक संवाद और परिपक्वता नहीं है जो कभी संयुक्त आंध्र प्रदेश के दिग्गज मुख्यमंत्री वाई.एस. राजशेखर रेड्डी (YSR) में हुआ करती थी। उन्होंने सोनिया गांधी को भी पत्र लिखकर शिकायत दर्ज कराई कि एक वरिष्ठ पिछड़ा वर्ग (BC) महिला नेता होने के नाते उन्हें लगातार दबाने और प्रताड़ित करने का प्रयास किया जा रहा है।

दिल्ली में खरगे दरबार से लेकर हैदराबाद तक खींचतान: शक्ति संतुलन का इम्तिहान

सुरेखा को हटाने का यह फैसला इतनी आसानी से नहीं लिया गया। इसके पीछे दिल्ली से लेकर हैदराबाद तक बैठकों का लंबा दौर चला। कोंडा सुरेखा ने मामले को सुलझाने के लिए सीधे बेंगलुरु और दिल्ली का रुख किया था, जहां उन्होंने कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और राज्य प्रभारी मीनाक्षी नटराजन से मुलाकात कर अपना पक्ष रखा था। उन्होंने अपनी प्रशासनिक उपलब्धियां गिनाई थीं और दावा किया था कि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व उन्हें हटाने के पक्ष में नहीं था।

हालांकि, मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी, उपमुख्यमंत्री मल्लू भट्टी विक्रमार्क और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बी. महेश कुमार गौड़ ने आलाकमान को यह समझाने में सफलता पाई कि यदि सरकार के भीतर से उठने वाली खुली बगावत पर कड़ा कदम नहीं उठाया गया, तो सरकार की कमान कमजोर पड़ जाएगी और इसका असर पूरे प्रशासन पर पड़ेगा। आलाकमान ने अंततः मुख्यमंत्री के विशेषाधिकार और कैबिनेट की सामूहिक एकजुटता को प्राथमिकता देते हुए सुरेखा को हटाने के प्रस्ताव पर अपनी सहमति की मुहर लगा दी।

तेलंगाना की सियासत में आगे क्या? कोंडा परिवार का सियासी वजूद और आगे की राह

वारंगल की राजनीति में कोंडा परिवार—विशेषकर कोंडा सुरेखा और उनके पति पूर्व एमएलसी कोंडा मुरली—का अपना एक स्वतंत्र, आक्रामक और गहरा जमीनी प्रभाव रहा है। वे किसी पार्टी के मोहताज रहने के बजाय अपने व्यक्तिगत काडर और जनसमर्थन के बल पर चुनाव जीतने के लिए जाने जाते हैं।

कैबिनेट से हटाए जाने के बावजूद सुरेखा ने साफ कर दिया है कि वे विधायक पद से इस्तीफा नहीं देंगी और जनता के बीच रहकर अपनी आवाज उठाती रहेंगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस घटनाक्रम से तेलंगाना कांग्रेस के भीतर पिछड़ा वर्ग (BC) प्रतिनिधित्व को लेकर एक नई बहस छिड़ सकती है, जिसका फायदा उठाने की कोशिश मुख्य विपक्षी दल बीआरएस और भाजपा दोनों करेंगे। दूसरी ओर, रेवंत रेड्डी ने इस कड़े फैसले से अपनी ही पार्टी के भीतर यह सख्त संदेश दे दिया है कि चाहे कोई कितना भी बड़ा रसूखदार नेता क्यों न हो, सरकार और मुख्यमंत्री के नेतृत्व को सीधी चुनौती देने वाले को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा।