पश्चिम बंगाल में ईसाई प्रार्थना सभाओं और कब्रिस्तानों पर बढ़ते हमलों से क्यों दहशत में अल्पसंख्यक?

पश्चिम बंगाल में ईसाई प्रार्थना सभाओं और कब्रिस्तानों पर बढ़ते हमलों से क्यों दहशत में अल्पसंख्यक?

पश्चिम बंगाल के ग्रामीण और उपनगरीय इलाकों से सामने आ रही हिंसक घटनाओं की एक नई श्रृंखला ने राज्य के ईसाई समुदाय और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के बीच गहरी चिंता और असुरक्षा की भावना पैदा कर दी है। हाल के हफ्तों में कई जिलों से रविवार की प्रार्थना सभाओं में बाधा डालने, गिरजाघरों और अस्थायी प्रार्थना हॉल्स में तोड़फोड़ करने तथा कथित धर्मांतरण के नाम पर पादरियों व विश्वासियों को धमकाने के मामले सामने आए हैं।

इस पूरे तनाव के बीच सबसे रोंगटे खड़े कर देने वाली घटना उस वक्त सामने आई, जब एक गांव में हाल ही में दफनाए गए एक ईसाई व्यक्ति के शव को जबरन कब्र से बाहर निकाल दिया गया। इस अमानवीय कृत्य के बाद अल्पसंख्यक समुदाय में रोष और भय का माहौल चरम पर पहुंच गया है, जिससे यह सवाल खड़ा हो गया है कि सांप्रदायिक सौहार्द के लिए पहचाने जाने वाले बंगाल में यह दरार इतनी गहरी क्यों होती जा रही है?

'कब्र से शव तक निकाल दिया': क्या है वह अमानवीय घटना जिसने सबको झकझोर दिया?

मामला राज्य के एक ग्रामीण अंचल का है, जहां एक स्थानीय परिवार ने ईसाई रीति-रिवाज से अपने एक मृत परिजन का अंतिम संस्कार किया था और शव को गांव के सार्वजनिक या नजदीकी कब्रिस्तान में दफनाया था:

  • जबरन कब्र खोदने की बर्बरता: स्थानीय कट्टरपंथी तत्वों और कुछ ग्रामीणों ने यह कहकर विरोध शुरू कर दिया कि चूंकि उक्त व्यक्ति ने कथित तौर पर धर्म परिवर्तन किया था, इसलिए उसे गांव की जमीन या पारंपरिक कब्रिस्तान में दफनाने की अनुमति नहीं दी जाएगी। भीड़ ने दबाव बनाकर और प्रशासन के पहुंचने से पहले ही कब्र खुदवाकर शव को बाहर निकलवा दिया।

  • परिजनों का छलका दर्द: मृतक के परिजनों ने रोते हुए बयान दिया कि अंतिम संस्कार इंसान का बुनियादी सम्मान और धार्मिक अधिकार होता है, लेकिन नफरत की इस हद ने उनके मृत परिजन की गरिमा को भी रौंद डाला। परिजनों को शव लेकर मीलों दूर दूसरे स्थान पर अंतिम संस्कार के लिए भटकना पड़ा।

  • सामाजिक बहिष्कार की धमकी: घटना के बाद पीड़ित परिवार और उनके साथ खड़े ईसाई परिवारों को राशन, पानी और सामाजिक कार्यक्रमों से बेदखल करने की धमकियां दी गईं।

प्रार्थना सभाओं पर हमले और 'धर्मांतरण' के आरोप: कहां-कहां बिगड़े हालात?

पश्चिम बंगाल के मिदनापुर, बांकुरा, पुरुलिया, उत्तर 24 परगना और मालदा जैसे सीमावर्ती व आदिवासी बहुल जिलों में इस तरह के तनाव की घटनाएं सबसे ज्यादा दर्ज की गई हैं:

  • रविवार की प्रार्थनाओं पर अचानक छापे: कई स्थानों पर जब लोग रविवार की सुबह घरों या छोटे कम्युनिटी हॉल्स में इकट्ठा होकर शांतिपूर्ण प्रार्थना कर रहे होते हैं, तभी लाठी-डंडों से लैस भीड़ वहां पहुंच जाती है। बाइबल और धार्मिक साहित्य छीनने, संगीत वाद्ययंत्र तोड़ने और मौजूद लोगों को पीटने के कई वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए हैं।

  • प्रलोभन देकर धर्मांतरण कराने का इल्जाम: हमलावर समूहों का दावा होता है कि ईसाई मिशनरियां और पादरी भोले-भाले गरीब आदिवासियों, दलितों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को इलाज, मुफ्त शिक्षा और पैसों का लालच देकर ईसाई बना रहे हैं।

  • पादरियों और समुदाय की सफाई: वहीं, ईसाई संगठनों और स्थानीय पादरियों का स्पष्ट कहना है कि वे किसी को लालच या जबरदस्ती से नहीं जोड़ते। लोग अपनी आस्था, आत्मिक शांति और बीमारी से चंगाई की प्रार्थना के लिए स्वेच्छा से आते हैं। किसी भी नागरिक को संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत अपनी पसंद के धर्म को मानने और उसका प्रचार करने की आजादी है।

पुलिस और स्थानीय प्रशासन की भूमिका पर क्यों उठ रहे सवाल?

ईसाई समुदाय के प्रतिनिधियों और नागरिक अधिकार मंचों का आरोप है कि पुलिस और स्थानीय प्रशासन ऐसे मामलों में कई बार मूकदर्शक बना रहता है या फिर दबाव में आकर दोनों पक्षों में 'समझौता' कराने की कोशिश करता है:

  • शिकायत दर्ज कराने में हिचकिचाहट: कई पीड़ित परिवारों ने आरोप लगाया कि जब वे स्थानीय थानों में एफआईआर दर्ज कराने जाते हैं, तो पुलिस उल्टा उनसे ही सवाल करने लगती है कि वे बिना अनुमति के सामूहिक प्रार्थना क्यों कर रहे थे।

  • सुरक्षा की गारंटी नहीं: समुदाय के नेताओं का कहना है कि जब तक आरोपियों के खिलाफ गैर-जमानती धाराओं में त्वरित कानूनी कार्रवाई नहीं होगी, तब तक असामाजिक तत्वों के हौसले बुलंद रहेंगे और ग्रामीण इलाकों में अल्पसंख्यकों का सुरक्षित रहना मुश्किल हो जाएगा।

मानवाधिकार आयोग और सामाजिक संगठनों ने उठाई सख्त कार्रवाई की मांग

इस तरह की बढ़ती घटनाओं पर विभिन्न मानवाधिकार संगठनों, नागरिक सुरक्षा मंचों और ईसाई वेलफेयर एसोसिएशन्स ने गहरी चिंता जताई है:

  • सरकार से हस्तक्षेप की अपील: संगठनों ने मुख्यमंत्री और गृह विभाग से तत्काल हस्तक्षेप करने और प्रार्थना सभाओं को सुरक्षा मुहैया कराने की मांग की है।

  • सांप्रदायिक ताने-बाने को खतरा: विश्लेषकों का मानना है कि बंगाल में चुनावी और स्थानीय राजनीति के ध्रुवीकरण के चलते धर्म परिवर्तन के मुद्दे को जानबूझकर हवा दी जा रही है। अगर समय रहते इस पर सख्त प्रशासनिक नकेल नहीं कसी गई, तो यह न केवल सामाजिक सौहार्द को हमेशा के लिए चोट पहुंचाएगा, बल्कि देश के धर्मनिरपेक्ष ढांचे पर भी गहरा धब्बा साबित होगा।