सोनम वांगचुक ने क्यों बनाई जंतर-मंतर से दूरी? फैज अहमद फैज के शेर से दिया जवाब

सोनम वांगचुक ने क्यों बनाई जंतर-मंतर से दूरी? फैज अहमद फैज के शेर से दिया जवाब

लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने और पर्यावरण संरक्षण की मांग को लेकर राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली तक पदयात्रा करने वाले प्रख्यात जलवायु कार्यकर्ता और शिक्षा सुधारक सोनम वांगचुक ने जंतर-मंतर पर चल रहे विपक्षी व छात्र आंदोलनों से पूरी तरह किनारा कर लिया है। चुनाव आयोग और विभिन्न राजनीतिक विवादों को लेकर जंतर-मंतर पर हो रहे प्रदर्शनों में उनकी गैर-मौजूदगी पर जब सवाल उठे, तो वांगचुक ने मशहूर शायर फैज अहमद फैज के एक शेर का सहारा लेते हुए बेहद सधे और मार्मिक अंदाज में अपनी बात रखी। उन्होंने साफ कर दिया कि उनका मकसद विशुद्ध रूप से लद्दाख के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र, स्थानीय संस्कृति और पर्यावरण की रक्षा तक सीमित है, न कि राजनीतिक दलों की खींचतान का हिस्सा बनना।

फैज अहमद फैज की शायरी से वांगचुक का सधा संदेश

जंतर-मंतर पर राजनीतिक मंच साझा करने के कयासों को विराम देते हुए सोनम वांगचुक ने फैज अहमद फैज की मशहूर नज़्म 'मुझसे पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न मांग' की तर्ज पर कहा:

"और भी दुख हैं जमाने में लद्दाख के सिवा,

राहतें और भी हैं इस आंदोलन की राहत के सिवा..."

इस काव्यात्मक जवाब के जरिए उन्होंने स्पष्ट संकेत दिया कि देश में कई अन्य सामाजिक और राजनीतिक मुद्दे हो सकते हैं, लेकिन उनका दायित्व और संकल्प केवल लद्दाख की वास्तविक चिंताओं से बंधा है। वांगचुक ने कहा कि वे किसी दलगत राजनीति या संस्थागत टकराव के आंदोलन में शामिल होकर लद्दाख के मूल मुद्दे को भटकाना नहीं चाहते।

राजनीतिक विवादों से लद्दाख के मूल मुद्दे को अलग रखने की रणनीति

सोनम वांगचुक और लेह एपेक्स बॉडी (LAB) के रणनीतिकारों का मानना है कि यदि लद्दाख का आंदोलन अन्य राजनीतिक दलों (जैसे AAP, लेफ्ट या CJP) के धरना-प्रदर्शनों के साथ घुल-मिल गया, तो केंद्र सरकार के साथ संवाद की संभावनाएं जटिल हो सकती हैं:

  • गैर-राजनीतिक स्वरूप की रक्षा: वांगचुक ने हमेशा अपने 'क्लाइमेट फास्ट' (पर्यावरण उपवास) और 'दिल्ली चलो' पदयात्रा को विशुद्ध रूप से गांधीवादी और गैर-दलीय बनाए रखा है।

  • मुद्दे के भटकने का अंदेशा: चुनाव आयोग या विपक्षी दलों के तीखे राजनीतिक मंचों पर खड़े होने से लद्दाख की छठी अनुसूची और राज्य के दर्जे की मुख्य मांग पृष्ठभूमि में चली जाने का जोखिम था।

  • राष्ट्रीय सुरक्षा का संवेदनशील क्षेत्र: लद्दाख एक संवेदनशील सीमावर्ती इलाका है। ऐसे में आंदोलन को किसी भी प्रकार के राजनीतिक टकराव या उग्र प्रदर्शन से दूर रखना ही आंदोलनकारियों की प्राथमिकता रही है।

केंद्र सरकार से बातचीत का सकारात्मक दौर और प्रगति

जंतर-मंतर से दूरी बनाने का एक प्रमुख कारण गृह मंत्रालय (MHA) के साथ चल रही औपचारिक बातचीत भी है। लद्दाख के प्रतिनिधियों और केंद्रीय गृह मंत्रालय की उच्चाधिकार प्राप्त समिति के बीच दिसंबर माह के लिए उच्चस्तरीय वार्ताओं का खाका तय किया जा चुका है। सोनम वांगचुक ने पहले भी कहा था कि जब सरकार बातचीत की मेज पर आने और स्थानीय चिंताओं को सुनने के लिए सहमत हो रही है, तब टकराव का रास्ता अख्तियार करना उचित नहीं होगा।

लद्दाख की 4 प्रमुख बुनियादी मांगें

सोनम वांगचुक और लद्दाख के नागरिकों का संघर्ष मुख्य रूप से इन चार बिंदुओं पर टिका है:

  1. छठी अनुसूची (Sixth Schedule): आदिवासी आबादी और जल-जंगल-जमीन के अधिकारों को संवैधानिक संरक्षण देना।

  2. पूर्ण राज्य का दर्जा (Statehood): लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश से आगे बढ़ाकर लोकतांत्रिक विधायिका और पूर्ण राज्य का अधिकार मिलना।

  3. रोजगार और लोक सेवा आयोग: स्थानीय युवाओं के लिए नौकरियों में आरक्षण और लद्दाख के लिए अलग लोक सेवा आयोग (PSC) का गठन।

  4. संसदीय प्रतिनिधित्व: लेह और कारगिल दोनों क्षेत्रों के लिए संसद में दो अलग-अलग लोकसभा सीटों की व्यवस्था।

वांगचुक का संदेश स्पष्ट है कि जब तक इन संवेदनशील विषयों पर कोई ठोस हल नहीं निकलता, उनका हर प्रयास केवल हिमालयी क्षेत्र की जैव विविधता और लद्दाख के भविष्य को सुरक्षित करने के इर्द-गिर्द ही केंद्रित रहेगा।