मैप में क्यों बदलने जा रही दुनिया, UN में भारत की हां; लेकिन जम्मू-कश्मीर और लद्दाख पर रखी एक सख्त शर्त
दुनिया भर की कक्षाओं, डिजिटल प्लेटफॉर्मों, किताबों और दफ्तरों में सदियों से देखे जा रहे विश्व मानचित्र (World Map) के स्वरूप में अब एक ऐतिहासिक बदलाव होने जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) ने अफ्रीकी देशों की अगुवाई में लाए गए एक ऐतिहासिक प्रस्ताव 'करेक्ट द मैप' (Correct the Map) को भारी बहुमत से मंजूरी दे दी है। इस प्रस्ताव का मुख्य उद्देश्य दुनिया के नक्शे पर महाद्वीपों और देशों के वास्तविक भौगोलिक आकार (Landmass) को सटीक अनुपात में दिखाना है। भारत ने भी इस वैज्ञानिक और निष्पक्ष मानचित्रण का पुरजोर समर्थन करते हुए प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया। हालांकि, अपनी सैद्धांतिक सहमति देने के साथ ही नई दिल्ली ने वैश्विक मंच पर एक बहुत बड़ी राजनयिक शर्त (Territorial Red Line) खींच दी है। भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) ने साफ कर दिया है कि संयुक्त राष्ट्र समर्थित किसी भी नए नक्शे में केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को केवल और केवल भारत के आधिकारिक मानचित्र के अनुरूप ही दर्शाया जाना अनिवार्य होगा; देश की संप्रभुता पर कोई भी गलत या भ्रामक चित्रण कतई स्वीकार नहीं किया जाएगा।
सदियों पुराने 'मरकेटर मैप' में क्या है खोट और क्यों बदलने जा रही दुनिया?
वर्तमान में दुनिया भर में जिस मानचित्र का सबसे ज्यादा प्रचलन है, वह 1569 में फ्लेमिश भूगोलवेत्ता गेरार्डस मरकेटर द्वारा डिजाइन किया गया 'मरकेटर प्रोजेक्शन' (Mercator Projection) है। उस दौर में इसे मुख्य रूप से समुद्री जहाजों के नेविगेशन के लिए सीधी रेखाओं में दिशा तय करने हेतु बनाया गया था।
लेकिन गोल पृथ्वी को सपाट कागज पर उतारने के इस यूरोपीय मॉडल में भारी भौगोलिक विकृति (Distortion) थी:
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ध्रुवों की ओर जमीन का अस्वाभाविक फैलाव: भूमध्य रेखा (Equator) से दूर उत्तर और दक्षिण की ओर जाने पर देशों का आकार कृत्रिम रूप से बहुत बड़ा दिखने लगता है।
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अफ्रीका और ग्लोबल साउथ का छोटा चित्रण: मौजूदा नक्शों में ग्रीनलैंड और अफ्रीका महाद्वीप लगभग एक ही आकार के दिखाई देते हैं, जबकि असलियत यह है कि अफ्रीका (लगभग 30.3 मिलियन वर्ग किमी) ग्रीनलैंड (2.1 मिलियन वर्ग किमी) से 14 गुना बड़ा है।
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यूरोप का प्रभुत्व: मरकेटर मैप में यूरोप और उत्तरी अमेरिका को असल भूभाग से कहीं ज्यादा विशाल और केंद्र में दिखाया गया, जिससे विकासशील देशों और अफ्रीका की भौगोलिक महत्ता दब गई।
संयुक्त राष्ट्र के नए प्रस्ताव में ऐसे 'इक्वल-एरिया प्रोजेक्शंस' (Equal-Area Map Projections) जैसे 'इक्वल अर्थ' (Equal Earth) या गैल-पीटर्स जैसे मॉडलों को बढ़ावा देने की अपील की गई है, जिनमें हर महाद्वीप अपने वास्तविक अनुपातिक क्षेत्रफल में दिखाई दे।
UN में मतदान का गणित: 164 देशों का समर्थन, सिर्फ अमेरिका ने किया विरोध
टोगो द्वारा अफ्रीकी समूह की ओर से पेश किए गए इस प्रस्ताव (A/80/L.104) को संयुक्त राष्ट्र के 193 सदस्य देशों में से 164 देशों का भारी समर्थन मिला।
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एस्टोनिया, जॉर्जिया, लिथुआनिया, मोल्दोवा, सर्बिया और यूक्रेन सहित 6 देशों ने मतदान में भाग नहीं लिया (Abstain रहे)।
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इस पूरे प्रस्ताव के खिलाफ एकमात्र वोट संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) ने डाला।
भारत ने क्यों रखी शर्त: विदेश मंत्रालय का दो टूक संदेश
प्रस्ताव के पक्ष में मतदान करने के बाद भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने एक आधिकारिक बयान जारी कर देश का पक्ष पूरी स्पष्टता से दुनिया के सामने रखा:
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जम्मू-कश्मीर और लद्दाख पर स्पष्ट रुख: भारत ने दो टूक शब्दों में कहा—"केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर और लद्दाख समेत भारत के संप्रभु क्षेत्र को भारत के आधिकारिक मानचित्र के अनुरूप ही दिखाया जाना चाहिए। इसका कोई भी गलत या भ्रामक चित्रण पूरी तरह अस्वीकार्य होगा। देश की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता पर भारत का रुख बिल्कुल स्पष्ट, अडिग और गैर-समझौतावादी (Non-negotiable) है।"
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किसी खास नक्शे का समर्थन नहीं: भारत के राजनयिकों ने यूएन में अपने वोट की व्याख्या (Explanation of Vote) करते हुए स्पष्ट किया कि भारत का समर्थन केवल महाद्वीपों के क्षेत्रफल के 'समान अनुपात' (Equal-Area) के सिद्धांत को बढ़ावा देने के लिए है, न कि किसी एक खास वाणिज्यिक नक्शे या किसी नई राजनीतिक सीमा रेखा को मान्यता देने के लिए।
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राजनीतिक मानचित्रण से परे: विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि यह प्रस्ताव विशुद्ध रूप से तकनीकी और शैक्षणिक मानचित्रण के लिए है; इसका अंतरराष्ट्रीय सीमाओं, विवादित क्षेत्रों या स्थानों के राजनीतिक नामकरण से कोई लेना-देना नहीं है।
संयुक्त राष्ट्र के पुराने नक्शों पर क्यों सतर्क रहता है भारत?
दरअसल, संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी किए जाने वाले पारंपरिक नक्शों में ऐतिहासिक रूप से जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को लेकर विवादित दर्शाया जाता रहा है और नियंत्रण रेखा (LoC) को डॉटेड लाइन (Dotted Line) से दिखाकर एक अस्वीकरण (Disclaimer) जोड़ा जाता रहा है। वहीं, भारत का 2019 के पुनर्गठन के बाद का आधिकारिक संप्रभु नक्शा पूरे जम्मू-कश्मीर और लद्दाख (जिसमें पाकिस्तान और चीन के अवैध कब्जे वाले क्षेत्र भी शामिल हैं) को देश की अभिन्न बाहरी सीमाओं के भीतर दिखाता है।
भारत को यह भली-भांति अंदेशा था कि नई मानचित्र प्रणाली लागू होने की आड़ में कोई भी अंतरराष्ट्रीय एजेंसी या विरोधी देश भारत की संप्रभु सीमाओं के साथ छेड़छाड़ न कर सके। इसी कारण भारत ने वोट तो सही भौगोलिक अनुपात के पक्ष में दिया, लेकिन साथ ही संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को स्पष्ट चेतावनी दे दी कि नए नक्शे की किसी भी छपाई या डिजिटल डिस्प्ले में भारत की क्षेत्रीय अखंडता पर रत्ती भर भी समझौता नहीं होगा।