संसद में शून्य, यूपी विधानसभा में एक भी विधायक नहीं: क्या छिन जाएगा मायावती की BSP का 'राष्ट्रीय पार्टी' का दर्जा
देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में चार बार सरकार बना चुकी बहुजन समाज पार्टी (BSP) अपने चार दशक के राजनीतिक इतिहास के सबसे गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है। 1984 में मान्यवर कांशीराम द्वारा स्थापित और मायावती के नेतृत्व में राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने वाली बसपा के सामने अब संसद और विधानसभा दोनों ही जगह अस्तित्व का बड़ा संकट खड़ा हो गया है।
निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा उत्तर प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटों पर चुनाव कार्यक्रम घोषित किए जाने के बाद यह तय हो गया है कि उच्च सदन में पार्टी के एकमात्र सांसद रामजी गौतम का कार्यकाल 25 नवंबर को समाप्त होते ही राज्यसभा में बसपा की सदस्य संख्या शून्य हो जाएगी। लोकसभा चुनाव 2024 में पार्टी पहले ही खाता खोलने में नाकाम रही थी। इस तरह 1989 में पहली बार संसद पहुंचने के बाद यह पहला मौका होगा जब देश की संसद के दोनों सदनों में बसपा का एक भी सांसद नहीं होगा।
यूपी विधानसभा में भी 'शून्य', विधान परिषद में भी कोई नहीं
बसपा का मुख्य गढ़ माने जाने वाले उत्तर प्रदेश में पार्टी की जमीनी स्थिति चिंताजनक हो चुकी है:
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विधानसभा में शून्य: 2022 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने केवल एक सीट (बलिया की रसड़ा सीट) जीती थी। अगस्त में रसड़ा से लगातार तीन बार के विधायक उमाशंकर सिंह के निधन के बाद अब 403 सदस्यीय यूपी विधानसभा में बसपा का एक भी विधायक नहीं है।
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राज्यसभा में दावेदारी खत्म: यूपी से एक राज्यसभा सीट जीतने के लिए कम से कम 37 विधायकों के वोटों की जरूरत है। संख्याबल शून्य होने के चलते बसपा अपना उम्मीदवार उतारने की स्थिति में भी नहीं है।
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विधान परिषद में सूपड़ा साफ: राज्य की विधान परिषद में भी पार्टी का प्रतिनिधित्व पहले ही पूरी तरह समाप्त हो चुका है।
क्या छिन जाएगा बसपा का 'राष्ट्रीय पार्टी' का दर्जा?
संसद और यूपी विधानसभा में संख्याबल शून्य होने के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या चुनाव आयोग बसपा का राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा वापस ले सकता है?
चुनाव चिह्न (आरक्षण व आवंटन) आदेश, 1968 के तहत किसी दल को राष्ट्रीय पार्टी की मान्यता बनाए रखने के लिए इन तीन शर्तों में से कम से कम एक शर्त पूरी करनी होती है:
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शर्त 1: लोकसभा या विधानसभा चुनाव में कम से कम 4 राज्यों में 6% से अधिक वैध मत प्राप्त हों और साथ ही लोकसभा में कम से कम 4 सांसद हों। (बसपा इसे पूरा नहीं करती क्योंकि लोकसभा में उसके 0 सांसद हैं)।
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शर्त 2: लोकसभा की कुल सीटों का कम से कम 2% (यानी 11 सीटें) जीती हों और ये सांसद कम से कम 3 अलग-अलग राज्यों से चुने गए हों। (बसपा 2024 में 0 पर सिमट गई)।
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शर्त 3: पार्टी को कम से कम 4 राज्यों में 'राज्य स्तरीय दल' (State Party) के रूप में मान्यता प्राप्त हो।
बसपा का राष्ट्रीय दर्जा फिलहाल इसी तीसरी शर्त पर टिका रहा है। पार्टी को अतीत में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में मिले वोट शेयर और सीटों के आधार पर राज्य स्तरीय दल का दर्जा मिला था।
हालांकि, पिछले कुछ विधानसभा चुनावों में यूपी को छोड़कर अन्य राज्यों (जैसे मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़) में पार्टी का वोट शेयर लगातार 6% के मानक से नीचे खिसका है। यदि चुनाव आयोग आगामी समीक्षा में पाता है कि बसपा चार राज्यों में राज्य स्तरीय पार्टी होने की पात्रता खो चुकी है, तो तृणमूल कांग्रेस (TMC), एनसीपी (NCP) और सीपीआई (CPI) की तरह बसपा का राष्ट्रीय दर्जा भी खतरे में पड़ सकता है।
2007 में पूर्ण बहुमत से लेकर 2026 में हाशिए तक: कैसे हुआ पतन?
बसपा के इस ऐतिहासिक ढलान की शुरुआत 2012 के बाद से मानी जाती है:
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2007 का शिखर: 2007 के यूपी विधानसभा चुनाव में बसपा ने सोशल इंजीनियरिंग (दलित-ब्राह्मण गठजोड़) के दम पर 206 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी और मायावती चौथी बार मुख्यमंत्री बनी थीं।
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2014 और 2024 का झटका: 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को 4.19% राष्ट्रीय वोट मिले लेकिन सीटें शून्य रहीं। 2019 में सपा के साथ गठबंधन कर 10 सीटें जीतीं, लेकिन 2024 में 'एकला चलो' की नीति के चलते वोट प्रतिशत गिरकर 2.06% रह गया और सीटें फिर शून्य हो गईं।
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कोर वोट बैंक में बिखराव: उत्तर प्रदेश की करीब 21% दलित आबादी में से गैर-जाटव दलितों में भाजपा ने मजबूत सेंध लगाई है। वहीं, नगीना से सांसद बने चंद्रशेखर आजाद (आजाद समाज पार्टी) युवाओं के बीच तेजी से विकल्प बनकर उभरे हैं, जिससे बसपा का पारंपरिक काडर बंट गया है।
2027 का यूपी चुनाव: करो या मरो की लड़ाई
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बसपा के लिए अब वर्ष 2027 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव ही वापसी का एकमात्र रास्ता बचा है। यदि 2027 में पार्टी अपने विधायकों की संख्या बढ़ाने और सम्मानजनक वोट प्रतिशत हासिल करने में विफल रहती है, तो न केवल उसका राष्ट्रीय प्रतीक 'हाथी' पूरे देश में आरक्षित रहने पर संकट आ सकता है, बल्कि पार्टी की पहचान केवल एक क्षेत्रीय दल के रूप में सीमित होकर रह जाएगी।