वोटिंग से पहले ABVP को मिला SOI का साथ, 2027 विधानसभा चुनाव को लेकर गरमाई पंजाब की सियासत

वोटिंग से पहले ABVP को मिला SOI का साथ, 2027 विधानसभा चुनाव को लेकर गरमाई पंजाब की सियासत

पंजाब की छात्र राजनीति की धड़कन माने जाने वाले पंजाब यूनिवर्सिटी कैंपस स्टूडेंट्स काउंसिल (PUCSC) के चुनाव में मतदान से ठीक पहले एक बहुत बड़ा राजनीतिक और चुनावी उलटफेर देखने को मिला है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) की छात्र शाखा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) और शिरोमणि अकाली दल (SAD) के छात्र संगठन स्टूडेंट ऑर्गनाइजेशन ऑफ इंडिया (SOI) ने मतभेदों को भुलाकर आधिकारिक रूप से साझा गठबंधन का ऐलान कर दिया है। दोनों संगठनों के प्रमुख नेताओं ने यूनिवर्सिटी कैंपस स्थित श्री गुरुद्वारा साहिब में नतमस्तक होकर इस नए चुनावी तालमेल की संयुक्त घोषणा की।

छात्र राजनीति में हुए इस अप्रत्याशित समझौते ने केवल कैंपस का चुनावी गणित ही नहीं बदला, बल्कि चंडीगढ़ से लेकर पंजाब के सियासी गलियारों तक एक नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है। वर्ष 2020 में कृषि कानूनों के विवाद के बाद जब से अकाली दल और भाजपा का लगभग 24 साल पुराना गठबंधन टूटा था, तब से दोनों दल मुख्यधारा की राजनीति में अलग-अलग राह पर चल रहे हैं। लेकिन विधानसभा चुनाव 2027 से पहले पंजाब यूनिवर्सिटी के इस गठबंधन ने राजनीतिक विश्लेषकों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या छात्र राजनीति में बनी यह नई साझेदारी भविष्य में पंजाब की मुख्यधारा की राजनीति में भाजपा और अकाली दल के पुनर्मिलन का रास्ता तैयार कर रही है?

नामांकन रद्द होने के बाद बना नया समीकरण: गुरुद्वारा साहिब से हुआ ABVP-SOI गठबंधन का ऐलान

पंजाब यूनिवर्सिटी छात्र संघ चुनाव में मतदान से कुछ घंटे पहले घटे इस घटनाक्रम की पटकथा तकनीकी कारणों और रणनीतिक मजबूरी के चलते तैयार हुई।

  • SOI उम्मीदवार का नामांकन रद्द होना: इस बार PU चुनाव में SOI की ओर से अध्यक्ष पद के लिए उतारे गए प्रत्याशी प्रणव का नामांकन उपस्थिति (Attendance) और पात्रता से जुड़े तकनीकी विवाद के चलते विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा रद्द कर दिया गया था। इसके बाद संगठन ने डीन स्टूडेंट वेलफेयर (DSW) कार्यालय के बाहर कड़ा विरोध प्रदर्शन भी किया, लेकिन राहत न मिलने पर SOI अध्यक्ष पद की सीधी दौड़ से बाहर हो गया।

  • ABVP के अंकित बिधान को समर्थन: अध्यक्ष पद की दौड़ से बाहर होने के बाद SOI ने अपने मजबूत कैडर और वोट बैंक को बिखरने से बचाने के लिए ABVP के अध्यक्ष पद उम्मीदवार अंकित बिधान को बिना शर्त समर्थन देने का फैसला किया।

  • सिख-हिंदू एकता और कैंपस विकास का संदेश: गठबंधन का ऐलान करते हुए छात्र नेताओं ने कहा कि यह फैसला पंजाबियत, छात्र कल्याण और कैंपस में सामाजिक सौहार्द को मजबूत करने के लिए लिया गया है। उन्होंने इसे सिख-हिंदू एकता का प्रतीक बताते हुए कहा कि छात्र राजनीति को टकराव के बजाय विकास और सकारात्मक प्रतिनिधित्व पर केंद्रित होना चाहिए।

  • अन्य संगठनों का भी साथ: ABVP को पहले ही हिमाचल स्टूडेंट्स एसोसिएशन (HIMSA) और इंडिपेंडेंट स्टूडेंट्स एसोसिएशन (ISA) का समर्थन मिल चुका था। अब SOI का विशाल नेटवर्क जुड़ जाने से अध्यक्ष पद के मुकाबले में ABVP का पलड़ा काफी मजबूत हो गया है।

2027 विधानसभा चुनाव के सियासी कयास: क्या फिर साथ आएंगे अकाली दल और भाजपा?

पंजाब यूनिवर्सिटी को हमेशा से राज्य की मुख्य राजनीति की 'नर्सरी' और राजनीतिक मूड का बैरोमीटर माना जाता रहा है। यही वजह है कि ABVP और SOI के इस गठबंधन को केवल एक छात्र चुनाव तक सीमित रखकर नहीं देखा जा रहा है।

  • 24 साल पुराने ऐतिहासिक गठबंधन की पृष्ठभूमि: पंजाब में शिरोमणि अकाली दल और भारतीय जनता पार्टी का गठबंधन पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री सरदार प्रकाश सिंह बादल के दौर में फला-फूला था। इसे पंजाब में 'नाखून और मांस का रिश्ता' (सिख और हिंदू भाईचारे का प्रतीक) कहा जाता था। 2020 में केंद्र के कृषि सुधार कानूनों के विरोध में अकाली दल ने एनडीए (NDA) से अपना नाता तोड़ लिया था।

  • मजीठिया का हालिया बयान और बदलता माहौल: हाल ही में अकाली दल के वरिष्ठ नेता बिक्रम सिंह मजीठिया ने सार्वजनिक बयान देते हुए कहा था कि पंजाब एक संवेदनशील सीमावर्ती राज्य है और यहां के सामाजिक ताने-बाने व शांति के लिए लोग चाहते हैं कि अकाली दल और भाजपा दोबारा एक साथ आएं।

  • रणनीतिक सहयोग की नई जमीन: हालांकि भाजपा के प्रदेश नेतृत्व और पंजाब प्रभारियों की ओर से सार्वजनिक रूप से सभी 117 सीटों पर अपने दम पर चुनाव लड़ने की बात कही जा रही है, लेकिन राजनीतिक पंडितों का मानना है कि पंजाब में आम आदमी पार्टी (AAP) और कांग्रेस को मात देने के लिए दोनों दलों के बीच अंदरखाने किसी समझौते की गुंजाइश को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता। छात्र राजनीति में यह कदम दोनों दलों के कार्यकर्ताओं के बीच जमीनी तालमेल को परखने का एक पायलट टेस्ट (परीक्षण) भी हो सकता है।

PU में पहले भी बन चुका है यह समीकरण: 2016 के इतिहास और कैंपस गणित पर एक नजर

पंजाब यूनिवर्सिटी में अकाली दल और भाजपा से जुड़े छात्र संगठनों का एक मंच पर आना कोई पहली घटना नहीं है। विश्वविद्यालय का इतिहास बताता है कि जब-जब चुनावी हित साझा हुए हैं, इन संगठनों ने मिलकर चुनाव लड़ा है।

  • वर्ष 2016 का महा-गठबंधन: 2016 के PUCSC चुनाव में SOI, ABVP, इनसो (INSO - जननायक जनता पार्टी/चौटाला परिवार से जुड़ा संगठन) और HPSO ने मिलकर एक संयुक्त पैनल उतारा था। उस चुनाव में इस गठबंधन ने अध्यक्ष पद के लिए पीयूष आनंद को उम्मीदवार बनाया था, जो बेहद कड़े मुकाबले में दूसरे स्थान पर रहे थे।

  • वोट ट्रांसफर की सबसे बड़ी चुनौती: इस गठबंधन की असली परीक्षा यह है कि क्या SOI का ग्रामीण और मालवा-दोआबा से आने वाला पारंपरिक छात्र वोट बैंक पूरी तरह से ABVP के उम्मीदवार के पक्ष में ट्रांसफर हो पाएगा। यदि यह वोट ट्रांसफर सुचारू रूप से होता है, तो यह परिणाम राज्य की मुख्यधारा की राजनीति के लिए एक बड़ा मनोवैज्ञानिक संदेश देगा।

  • कैंपस में बहुकोणीय मुकाबला: इस बार PU में कांग्रेस की छात्र शाखा NSUI, आम आदमी पार्टी की छात्र इकाई ASAP (जिसने INSO और PUDF के साथ मोर्चा बनाया है), यूनिवर्सिटी का स्वतंत्र समूह 'साथ' (Sath) और ABVP-SOI गठबंधन के बीच कांटे की टक्कर देखने को मिल रही है।

क्या यह केवल चुनावी मजबूरी है या भविष्य की बड़ी राजनीतिक पटकथा का शुरुआती अध्याय?

पंजाब की मौजूदा राजनीति चार प्रमुख ध्रुवों—आम आदमी पार्टी, कांग्रेस, शिरोमणि अकाली दल और भारतीय जनता पार्टी—के बीच बंटी हुई है। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों ने यह स्पष्ट कर दिया था कि वोटों के बिखराव का सीधा फायदा सत्ताधारी दल को मिलता है।

अकाली दल का मुख्य आधार पंजाब का ग्रामीण पंथक और किसान वर्ग रहा है, जबकि भाजपा का प्रभाव पारंपरिक रूप से पंजाब के शहरी और हिंदू बहुल क्षेत्रों में मजबूत माना जाता रहा है। दोनों दलों के अलग होने के बाद से दोनों को ही चुनावी नुकसान झेलना पड़ा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पंजाब यूनिवर्सिटी में ABVP और SOI का साथ आना यह दर्शाता है कि शीर्ष स्तर पर भले ही बयानबाजी अलग हो, लेकिन कैडर के स्तर पर दोनों संगठनों में एक-दूसरे के प्रति स्वाभाविक स्वीकार्यता अभी भी बची हुई है।

यदि आने वाले दिनों में अकाली दल के पंथक हलकों और भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के बीच कृषि मुद्दों और बंदी सिंहों की रिहाई जैसे संवेदनशील विषयों पर कोई न्यूनतम साझा सहमति बनती है, तो पंजाब यूनिवर्सिटी से शुरू हुआ यह गठबंधन 2027 के विधानसभा चुनाव में पंजाब की राजनीति का सबसे बड़ा गेमचेंजर साबित हो सकता है।