Chandigarh Waterlogging: सड़कें बनीं झील, गाड़ियां डूबीं; देश की पहली सुनियोजित सिटी चंडीगढ़ मानसून में क्यों बन गई तालाब?

Chandigarh Waterlogging: सड़कें बनीं झील, गाड़ियां डूबीं; देश की पहली सुनियोजित सिटी चंडीगढ़ मानसून में क्यों बन गई तालाब?

देश का पहला नियोजित और आधुनिक शहर, जिसे फ्रांसीसी वास्तुकार ली कोर्बुजिए (Le Corbusier) ने अपनी अनूठी वास्तुकला और ग्रिड-पैटर्न लेआउट के दम पर 'सिटी ब्यूटीफुल' का नाम दिया था, वह चंडीगढ़ मानसून की भारी बारिश के बाद पानी-पानी हो गया है। शहर की चौड़ी और साफ-सुथरी सड़कें झीलों में तब्दील हो चुकी हैं, प्रमुख अंडरपास पानी से लबालब भर गए हैं और रिहायशी कॉलोनियों से लेकर पार्किंग तक में खड़ी गाड़ियां पानी में तैरती नजर आ रही हैं। जो शहर देश में टाउन प्लानिंग और इंजीनियरिंग का रोल मॉडल माना जाता रहा है, वहां मानसून में ऐसे हालात देखकर स्थानीय निवासियों से लेकर नीति निर्माताओं तक के मन में यही सवाल उठ रहा है कि आखिर इस मास्टर-प्लान्ड शहर का ड्रेनेज सिस्टम मानसून की पहली तेज बारिश में ही क्यों घुटने टेक देता है।

चंडीगढ़ के 'तालाब' बनने के प्रमुख कारण

चंडीगढ़ में जलभराव की समस्या केवल प्राकृतिक बारिश का नतीजा नहीं है, बल्कि समय के साथ बढ़े शहरीकरण, पुराने पड़ चुके इंफ्रास्ट्रक्चर और ड्रेनेज सिस्टम पर पड़े अतिरिक्त दबाव का मिला-जुला परिणाम है:

  • 50 साल पुराना ड्रेनेज डिजाइन: ली कोर्बुजिए और उनकी टीम ने जब 1950 के दशक में चंडीगढ़ का स्टॉर्म वॉटर ड्रेनेज नेटवर्क डिजाइन किया था, तब इसे औसतन 15 से 20 मिमी प्रति घंटे की बारिश को झेलने के हिसाब से बनाया गया था। आज जलवायु परिवर्तन के कारण कुछ ही घंटों में 80 से 100 मिमी तक भारी बारिश (क्लाउडबर्स्ट जैसी स्थिति) हो जाती है, जिसे पुराने पाइप और नालियां बाहर निकालने में असमर्थ साबित होते हैं।

  • कंक्रीट का बढ़ता जाल और ग्राउंडवॉटर रिचार्ज की कमी: शहर में हरियाली और कच्चे पैच तेजी से कंक्रीट के रास्तों, पेवर्स और अवैध निर्माणों में बदल चुके हैं। बारिश का पानी जमीन में समाने (Seepage) के बजाय सीधे सड़कों पर बहता है, जिससे सरफेस रन-ऑफ कई गुना बढ़ जाता है।

  • नालों और स्टॉर्म ड्रेन्स की गाद (Siltation): मानसून से पहले नालों, रोड-गलियों और बरसाती पाइपों की समय पर और पूरी तरह डी-सिल्टिंग (सफाई) न होना पानी रुकने का बड़ा कारण है। प्लास्टिक कचरा और पेड़ों के सूखे पत्ते जालीदार ढक्कनों को जाम कर देते हैं।

  • सुखना चो और पटियाला की राव का ओवरफ्लो: शहर के किनारे बहने वाले प्राकृतिक बरसाती नाले—सुखना चो, पटियाला की राव और एन-चो जब भारी बारिश में उफान पर आ जाते हैं, तो शहर का बैक-वॉटर बाहर नहीं निकल पाता और उल्टा बस्तियों में लौटने लगता है।

  • ट्राइसिटी (मोहाली और पंचकूला) का अनियोजित विस्तार: चंडीगढ़ की सीमा से सटे मोहाली और पंचकूला के नए सेक्टरों का पानी भी भौगोलिक ढलान के कारण चंडीगढ़ के निचले इलाकों और अंडरपासों की तरफ बढ़ता है, जिससे शहर के मेन नालों पर भारी लोड आ जाता है।

अंडरपास बने सबसे खतरनाक 'डेथ ट्रैप्स'

चंडीगढ़ में ट्रैफिक को सुगम बनाने के लिए सेक्टर-11/15, सेक्टर-17/22, किशनगढ़ और ट्रिब्यून चौक के आसपास बनाए गए अंडरपास भारी बारिश में सबसे पहले जलमग्न हो जाते हैं। अंडरपासों में लगे ऑटोमैटिक ड्रेनेज पंप अक्सर बिजली गुल होने या भारी गाद फंसने की वजह से फेल हो जाते हैं, जिसके चलते कारें और बसें बीच रास्ते में ही पानी में डूब जाती हैं।

समस्या के स्थायी समाधान की दरकार

शहरी नियोजन विशेषज्ञों का मानना है कि केवल मानसून के समय पानी निकालने के लिए पंप लगाना अस्थायी उपाय है। चंडीगढ़ को इस संकट से उबारने के लिए निम्नलिखित कदम उठाने अनिवार्य हैं:

  • शहर के स्टॉर्म वॉटर नेटवर्क की क्षमता को 25 मिमी प्रति घंटे से बढ़ाकर कम से कम 50-60 मिमी प्रति घंटे के हिसाब से री-इंजीनियर किया जाए।

  • पेवर्स की जगह परमेबल (पानी सोखने वाले) पेवर्स और अधिक से अधिक रेन वाटर हार्वेस्टिंग पिट्स बनाए जाएं।

  • सुखना चो और अन्य बरसाती नालों की चौड़ाई और गहराई बढ़ाई जाए ताकि पानी का तेज निकास सुनिश्चित हो सके।

  • ट्राइसिटी (चंडीगढ़-मोहाली-पंचकूला) के स्तर पर एक संयुक्त ड्रेनेज मैनेजमेंट अथॉरिटी का गठन किया जाए।