Punjab Flood Solution: उझ दरिया के उफान पर लगेगा स्थायी ब्रेक! पंजाब के सीमावर्ती क्षेत्रों में बाढ़ रोकने और पाकिस्तान जाने वाले पानी को साधने के लिए बांध निर्माण की मांग तेज
पंजाब के सीमावर्ती जिलों में हर साल मानसून के दौरान आने वाली प्रलयंकारी बाढ़, हजारों एकड़ उपजाऊ भूमि का कटाव और किसानों की बर्बादी पर अब एक स्थायी समाधान की दिशा में बड़ी सुगबुगाहट शुरू हो गई है। जम्मू-कश्मीर की पहाड़ियों से निकलकर पंजाब के पठानकोट, गुरदासपुर और अमृतसर के अजनाला सेक्टर में भारी तबाही मचाने वाली 'उझ दरिया' (Ujh River) के पानी को नियंत्रित करने के लिए विशाल बांध (Ujh Dam Project) के निर्माण की मांग ने जोर पकड़ लिया है। पंजाब विधानसभा से लेकर केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय और सुरक्षा तंत्र तक इस मुद्दे पर गंभीर मंथन चल रहा है। सीमावर्ती जनप्रतिनिधियों और किसानों का स्पष्ट कहना है कि यदि उझ नदी पर रणजीत सागर बांध (थीन डैम) की तर्ज पर एक आधुनिक बहुउद्देशीय बांध और जल विनियमन प्रणाली विकसित कर दी जाए, तो न केवल पंजाब के सैकड़ों गांवों को बाढ़ के अभिशाप से हमेशा के लिए मुक्ति मिल जाएगी, बल्कि भारत अपने हिस्से के उस पानी का भी शत-प्रतिशत सदुपयोग कर सकेगा जो वर्तमान में अनियंत्रित होकर सीमा पार पाकिस्तान चला जाता है।
उझ दरिया का अनियंत्रित बहाव: हर साल पंजाब के सीमावर्ती गांवों में तबाही की दास्तान
उझ नदी, जो रावी नदी की एक प्रमुख सहायक नदी है, जम्मू-कश्मीर के कठुआ जिले की पहाड़ियों से निकलती है। जम्मू क्षेत्र से बहते हुए यह नदी पंजाब के पठानकोट जिले के बामियाल सेक्टर में प्रवेश करती है और आगे जाकर गुरदासपुर जिले के मकोड़ा पतन के पास सीधे रावी दरिया में विलीन हो जाती है। मानसून के मौसम में जब जम्मू-कश्मीर के ऊपरी पहाड़ी इलाकों में भारी बारिश होती है, बादल फटते हैं या भूस्खलन की घटनाएं होती हैं, तो उझ दरिया में जलस्तर अचानक विकराल रूप धारण कर लेता है।
लाखों क्यूसेक पानी के इस अप्रत्याशित सैलाब से मकोड़ा पतन पर रावी नदी का जलस्तर भी खतरे के निशान को पार कर जाता है। इसके परिणामस्वरूप गुरदासपुर के डेरा बाबा नानक, कलानौर और अमृतसर के अजनाला क्षेत्र में रावी और उझ के तटबंध टूट जाते हैं। पिछले कुछ वर्षों में इस बाढ़ के कारण दर्जनों लोगों की जान गई है, सैकड़ों मवेशी बह गए हैं और लगभग 60 हजार एकड़ से अधिक खड़ी फसलें पूरी तरह जलमग्न होकर बर्बाद हो चुकी हैं। इसके अलावा सड़कें, पुल, स्कूल और स्वास्थ्य केंद्र जैसे बुनियादी ढांचे को भी भारी क्षति पहुंचती है।
रणजीत सागर बांध की तर्ज पर उझ डैम की मांग: विधानसभा में गूंजा सीमावर्ती किसानों का दर्द
पंजाब विधानसभा में हाल ही में अजनाला से विधायक और आम आदमी पार्टी के मुख्य प्रवक्ता कुलदीप सिंह धालीवाल ने उझ दरिया पर बांध बनाने के मुद्दे को पुरजोर तरीके से उठाया। उन्होंने सदन में मांग रखी कि पंजाब सरकार इस संवेदनशील मामले को केंद्र सरकार और केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय के समक्ष प्राथमिकता से उठाए। धालीवाल ने दलील दी कि जिस तरह रावी नदी पर रणजीत सागर बांध बनाकर पानी के बहाव को नियंत्रित किया गया और सिंचाई तथा बिजली उत्पादन में क्रांतिकारी बदलाव आया, ठीक उसी तर्ज पर कठुआ और पंजाब सीमा के निकट उझ दरिया पर एक विशाल जलाशय और बैराज की स्थापना की जानी चाहिए।
जनप्रतिनिधियों का कहना है कि केंद्र सरकार पिछले कई वर्षों से उझ बहुउद्देशीय परियोजना (Ujh Multipurpose Project) को लेकर केवल योजनाएं और आश्वासन देती रही है, लेकिन धरातल पर कंक्रीट कार्य शुरू होने में अनावश्यक देरी हो रही है। अजनाला, बामियाल और नरोट जैमल सिंह जैसे सीमावर्ती ब्लॉकों के किसानों का कहना है कि जब तक इस दरिया के उद्गम और पंजाब में प्रवेश बिंदु पर जल नियंत्रण ढांचा तैयार नहीं होगा, तब तक हर साल करोड़ों रुपये की राहत राशि बांटना केवल एक अस्थायी लीपापोती बनकर रह जाएगा।
सिंधु जल समझौता और पाकिस्तान पर सामरिक प्रहार: राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए क्यों जरूरी है यह बांध?
उझ दरिया पर बांध के निर्माण का पहलू केवल बाढ़ नियंत्रण या कृषि तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक बहुत बड़ा राष्ट्रीय और कूटनीतिक हित भी जुड़ा हुआ है। 1960 के 'सिंधु जल समझौते' (Indus Waters Treaty) के तहत भारत को तीन पूर्वी नदियों—रावी, ब्यास और सतलुज के जल पर पूर्ण और अनन्य अधिकार प्राप्त है। इसके बावजूद, भंडारण बुनियादी ढांचे के अभाव में उझ और रावी का लाखों क्यूसेक पानी हर साल अप्रयुक्त रहकर अंतरराष्ट्रीय सीमा पार कर पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में बह जाता है।
यदि उझ दरिया पर विशाल बांध का निर्माण पूरा हो जाता है, तो भारत अपने हिस्से के एक-एक बूंद पानी को रोककर उसका उपयोग अपने पंजाब, जम्मू-कश्मीर और राजस्थान के सूखाग्रस्त इलाकों के लिए कर सकेगा।
इसके साथ ही, इसका सीधा संबंध सीमा सुरक्षा से भी है। मानसून के दौरान जब सीमावर्ती दरिया उफान पर होते हैं, तो भारत-पाक सीमा पर लगी कंटीली तारें (Border Fencing), फ्लड लाइट्स और सीमा सुरक्षा बल (BSF) की कई सीमा चौकियां (BOPs) पानी में डूब जाती हैं या बह जाती हैं। यह स्थिति सीमा पार से घुसपैठियों, नशा तस्करों और ड्रोनों के माध्यम से होने वाली अवैध गतिविधियों के लिए असुरक्षित प्रवेश द्वार खोल देती है। बांध बनने से जल स्तर हमेशा नियंत्रित रहेगा और बीएसएफ के सुरक्षा बुनियादी ढांचे को प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षित रखा जा सकेगा।
90 हजार हेक्टेयर भूमि की सिंचाई और स्वच्छ ऊर्जा: क्या है उझ बहुउद्देशीय परियोजना का खाका?
केंद्रीय जल आयोग (CWC) और वाप्कोस (WAPCOS) द्वारा तैयार की गई उझ बहुउद्देशीय परियोजना की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) के अनुसार, यह प्रोजेक्ट दोनों राज्यों की अर्थव्यवस्था की तस्वीर बदल सकता है:
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विशाल सिंचाई नेटवर्क: इस परियोजना से एक आधुनिक नहर प्रणाली निकाली जाएगी, जो पंजाब के पठानकोट और गुरदासपुर के साथ-साथ जम्मू-कश्मीर के कठुआ जिले की लगभग 90,000 हेक्टेयर से अधिक असिंचित कृषि भूमि को बारहमासी सिंचाई की सुविधा उपलब्ध कराएगी।
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पनबिजली उत्पादन: बांध पर हाइड्रो-इलेक्ट्रिक पावर प्लांट स्थापित किए जाने का प्रस्ताव है, जिससे 80 से 100 मेगावाट से अधिक पर्यावरण-अनुकूल और सस्ती बिजली पैदा होगी। यह बिजली स्थानीय ग्रिड को मजबूती देगी और ग्रामीण उद्योगों को बढ़ावा देगी।
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पेयजल संकट का समाधान: परियोजना के जरिए सीमावर्ती दर्जनों कस्बों और सैकड़ों गांवों को शुद्ध, फिल्टर युक्त पेयजल की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित की जा सकेगी।
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भूजल पुनर्भरण: नहरों और जलाशयों के निर्माण से उन क्षेत्रों में भूजल स्तर (Groundwater Level) में उल्लेखनीय सुधार होगा जहां अत्यधिक नलकूपों के कारण पानी का स्तर काफी नीचे जा चुका है।
पुनर्वास, पर्यावरण और स्थानीय चिंताओं का वैज्ञानिक समाधान जरूरी
किसी भी बड़े बांध परियोजना के साथ विस्थापन और पर्यावरणीय संतुलन एक बेहद संवेदनशील मुद्दा होता है। उझ परियोजना को लेकर जम्मू-कश्मीर के कठुआ और बिलावर क्षेत्र की कुछ स्थानीय पंचायतों ने अपनी कृषि भूमि और गांवों के डूब क्षेत्र में आने को लेकर चिंताएं जताई हैं।
विशेषज्ञों और प्रशासनिक अधिकारियों का मानना है कि परियोजना के नए संशोधित डिजाइन में डूब क्षेत्र (Submergence Area) को 41 वर्ग किलोमीटर से घटाकर लगभग 34.5 वर्ग किलोमीटर कर दिया गया है ताकि कम से कम आबादी प्रभावित हो। सरकार को चाहिए कि वह 2017 की राष्ट्रीय राहत एवं पुनर्वास नीति के तहत प्रभावित परिवारों को अग्रिम मुआवजा, आधुनिक कॉलोनियों में पुनर्वास और युवाओं को रोजगार के अवसर प्रदान करे। यदि स्थानीय जनता के विश्वास और पर्यावरण सुरक्षा मानकों को साथ लेकर चला जाए, तो यह परियोजना पूरे उत्तर भारत के लिए एक रोल मॉडल बन सकती है।
सीमावर्ती अर्थव्यवस्था को मिलेगी नई उड़ान
उझ दरिया पर बांध निर्माण की मांग केवल एक राजनीतिक घोषणा नहीं, बल्कि पंजाब के सीमांत क्षेत्रों के किसानों के अस्तित्व, आजीविका और राष्ट्रीय संप्रभुता से जुड़ा बुनियादी सवाल है। पठानकोट, गुरदासपुर और अमृतसर के सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले लोग दशकों से बाढ़ के डर के साए में जीने को मजबूर हैं। केंद्र और पंजाब सरकार के बीच मजबूत समन्वय के साथ यदि इस परियोजना को युद्धस्तर पर मंजूरी देकर काम शुरू कराया जाता है, तो यह पंजाब को प्राकृतिक आपदाओं से बचाने, किसानों की आय दोगुनी करने और देश की जल सुरक्षा को सुदृढ़ करने की दिशा में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर साबित होगा।