'कागजों में एसओपी, जमीन पर असर शून्य'; गिरफ्तारी और हिरासत नियमों पर पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट की पुलिस को कड़ी फटकार
नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और कानूनी अधिकारों के संरक्षण को लेकर पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने बेहद सख्त रुख अख्तियार किया है। एक मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने पंजाब, हरियाणा और केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ के पुलिस प्रशासन को आड़े हाथों लेते हुए दो टूक कहा कि गिरफ्तारी और हिरासत को लेकर बनाए गए मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) और दिशा-निर्देश केवल कागजों और फाइलों की शोभा बढ़ा रहे हैं, जबकि जमीनी हकीकत में उनका असर न के बराबर दिखता है।
अदालत ने नाराजगी जाहिर करते हुए टिप्पणी की कि शीर्ष अदालत और उच्च न्यायालयों के बार-बार दिए गए आदेशों के बावजूद पुलिस बल में मनमानी गिरफ्तारियों, कानूनी प्रक्रियाओं की अनदेखी और नियमों को ताक पर रखने की प्रवृत्ति खत्म नहीं हो रही है।
अर्नेश कुमार और डीके बसु दिशानिर्देशों की खुली अनदेखी पर जताई चिंता
उच्च न्यायालय ने सुनवाई के दौरान ऐतिहासिक फैसलों—विशेषकर 'डीके बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य' और 'अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य'—का हवाला दिया।
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7 साल से कम सजा वाले मामले: कानून के अनुसार, 7 वर्ष से कम सजा वाले मामलों में गिरफ्तारी अनिवार्य नहीं होती बल्कि नोटिस (धारा 41ए सीआरपीसी / बीएनएसएस प्रावधानों के तहत) जारी कर जांच में शामिल होने का अवसर दिया जाना चाहिए।
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अदालत की सख्त टिप्पणी: बेंच ने कहा कि जांच अधिकारी बिना ठोस आधार और बिना लिखित कारण दर्ज किए सीधे आरोपियों को गिरफ्तार कर लेते हैं। कई मामलों में गिरफ्तारी की सूचना परिजनों को समय पर नहीं दी जाती और न ही मेडिकल जांच व कानूनी सहायता के अनिवार्य नियमों का पालन किया जाता है।
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अदालत ने साफ कहा कि एसओपी का पालन न करना सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 21 (जीने और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार) का हनन है।
कागजी खानापूर्ति से आगे नहीं बढ़ रही पुलिस की कार्यशैली
अदालत ने इस बात पर गहरा असंतोष व्यक्त किया कि जब भी कोर्ट किसी मामले में संज्ञान लेता है, तो पुलिस विभाग तुरंत नए सर्कुलर और एसओपी जारी करने का हलफनामा पेश कर देता है।
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सिर्फ औपचारिकता बनी एसओपी: पीठ ने कहा कि उच्चाधिकारियों द्वारा जारी किए गए दिशा-निर्देश थानों और चौकियों के स्तर तक सिर्फ औपचारिकता बनकर रह जाते हैं। फील्ड में तैनात जांच अधिकारियों (IO) को या तो इन नियमों की पूरी जानकारी नहीं होती या वे जानबूझकर इनकी अवहेलना करते हैं।
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निगरानी तंत्र का अभाव: कोर्ट ने सवाल उठाया कि क्या राज्यों के पुलिस महानिदेशक (DGP) और चंडीगढ़ के आईजीपी यह सुनिश्चित करने के लिए कोई नियमित ऑडिट या निगरानी तंत्र चला रहे हैं कि उनके द्वारा जारी एसओपी का निचले स्तर पर पालन हो रहा है या नहीं?
तीनों राज्यों के शीर्ष अधिकारियों से मांगा एक्शन प्लान
उच्च न्यायालय ने पंजाब, हरियाणा के डीजीपी और चंडीगढ़ प्रशासन के गृह सचिव व पुलिस प्रमुख को निर्देश दिया है कि वे इस मामले में ठोस जवाब और कार्रवाई रिपोर्ट दाखिल करें। अदालत ने पूछा है कि:
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नियमों और एसओपी का उल्लंघन कर गैरकानूनी या मनमानी गिरफ्तारी करने वाले लापरवाह पुलिसकर्मियों के खिलाफ अब तक क्या विभागीय व कानूनी कार्रवाई की गई है?
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थानों के जांच अधिकारियों को आधुनिक कानूनी प्रक्रियाओं और मानवाधिकारों के प्रति संवेदनशील बनाने के लिए क्या प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं?
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क्या गिरफ्तार व्यक्ति को उसके अधिकारों की जानकारी देने के लिए थानों में स्पष्ट सूचना पट्ट (Notice Boards) और डिजिटल रिकॉर्डिंग की व्यवस्था की गई है?
अवहेलना करने वाले अधिकारियों पर व्यक्तिगत जवाबदेही तय होगी
अदालत ने कड़ा संदेश देते हुए स्पष्ट किया कि भविष्य में यदि किसी मामले में गिरफ्तारी से जुड़े वैधानिक नियमों और एसओपी का उल्लंघन पाया गया, तो संबंधित जांच अधिकारी के साथ-साथ पर्यवेक्षी अधिकारियों पर भी व्यक्तिगत जवाबदेही तय की जाएगी और उनके खिलाफ अदालत की अवमानना (Contempt of Court) की कार्रवाई शुरू की जा सकती है।
अदालत ने कहा कि पुलिस का काम कानून व्यवस्था बनाए रखना और अपराध की निष्पक्ष जांच करना है, न कि कानून की सीमाओं को लांघकर नागरिकों के मूलभूत अधिकारों को कुचलना। मामले की अगली सुनवाई के लिए संबंधित पक्षों को विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट के साथ पेश होने का आदेश दिया गया है।