कनाडा में पढ़ाई का सपना अब और महंगा! GIC राशि बढ़कर हुई 23,448 कैनेडियन डॉलर, ऊपर से डॉलर के मजबूत होने से भारतीय अभिभावकों पर पड़ा दोहरा वित्तीय बोझ

कनाडा में पढ़ाई का सपना अब और महंगा! GIC राशि बढ़कर हुई 23,448 कैनेडियन डॉलर, ऊपर से डॉलर के मजबूत होने से भारतीय अभिभावकों पर पड़ा दोहरा वित्तीय बोझ

विदेश जाकर उच्च शिक्षा हासिल करने और अपने सुनहरे भविष्य की नींव रखने का सपना देखने वाले भारतीय छात्रों और उनके अभिभावकों को कनाडा सरकार ने एक और बड़ा आर्थिक झटका दे दिया है। इमिग्रेशन, रिफ्यूजीज एंड सिटिजनशिप कनाडा (IRCC) ने स्टडी परमिट के लिए अनिवार्य गारंटीड इन्वेस्टमेंट सर्टिफिकेट (GIC) यानी एक साल के न्यूनतम जीवन-यापन खर्च (Proof of Living Expenses) की सीमा में आधिकारिक तौर पर बढ़ोतरी कर दी है। यह नया नियम 1 सितंबर से प्रभावी हो चुका है। इस नीतिगत बदलाव के तहत अब अकेले जाने वाले छात्र को 23,448 कैनेडियन डॉलर (CAD) की वित्तीय क्षमता बैंक खाते में प्रमाणित करनी होगी।

इस फैसले का सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि एक तरफ कनाडाई सरकार ने अनिवार्य फंड की राशि बढ़ा दी है, तो दूसरी तरफ भारतीय रुपये के मुकाबले कैनेडियन डॉलर की कीमत में आई हालिया मजबूती ने इस मार को दोगुना कर दिया है। नतीजतन, जो परिवार पहले 20 से 22 लाख रुपये के अनुमानित बजट में अपने बच्चों को ओंटारियो, ब्रिटिश कोलंबिया, अल्बर्टा या मैनिटोबा के कॉलेजों में भेजने की तैयारी कर रहे थे, अब उनका कुल प्रारंभिक खर्च 30 से 35 लाख रुपये के आंकड़े को छूने लगा है। पंजाब, हरियाणा, दिल्ली-एनसीआर से लेकर उत्तर प्रदेश के मझोले शहरों तक के मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए यह स्थिति किसी भारी वित्तीय संकट से कम नहीं है।

1 सितंबर से लागू हुआ नया नियम: अब 23,448 कैनेडियन डॉलर की GIC राशि दिखाना अनिवार्य

कनाडा के आव्रजन विभाग (IRCC) द्वारा जारी की गई नई अधिसूचना के अनुसार, क्यूबेक प्रांत को छोड़कर कनाडा के अन्य सभी 9 प्रांतों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों में उच्च शिक्षा के लिए आवेदन करने वाले प्रत्येक विदेशी छात्र के लिए अब 23,448 कैनेडियन डॉलर की GIC राशि दिखाना अनिवार्य कर दिया गया है। इससे पूर्व, 31 अगस्त तक यह निर्धारित सीमा 22,895 कैनेडियन डॉलर थी। हालांकि पहली नजर में यह वृद्धि 553 डॉलर की एक सामान्य वार्षिक समायोजन (Cost of Living Adjustment) प्रतीत होती है, किंतु यदि पिछले तीन वर्षों के परिदृश्य का विश्लेषण किया जाए, तो यह इजाफा होश उड़ाने वाला है।

दिसंबर 2023 तक एक अंतरराष्ट्रीय छात्र को कनाडा में केवल 10,000 कैनेडियन डॉलर की GIC राशि दिखानी पड़ती थी, जो पिछले दो दशकों से स्थिर थी। जनवरी 2024 में कनाडा सरकार ने आवास संकट और महंगाई का हवाला देते हुए इसे सीधे दोगुना से अधिक करते हुए 20,635 डॉलर कर दिया था। इसके बाद 2025 में इसे बढ़ाकर 22,895 डॉलर किया गया और अब 1 सितंबर से यह आंकड़ा उछलकर 23,448 डॉलर पर पहुंच चुका है। इसका सीधा अर्थ यह है कि पिछले तीन सालों में केवल लिविंग एक्सपेंस दिखाने की अनिवार्य शर्त में 134 प्रतिशत से भी ज्यादा की ऐतिहासिक वृद्धि दर्ज की गई है। यदि कोई छात्र अपने जीवनसाथी या परिवार के अन्य सदस्यों के साथ कनाडा जाने की योजना बना रहा है, तो दो सदस्यों के लिए यह न्यूनतम राशि 29,192 डॉलर और तीन सदस्यों के परिवार के लिए 35,888 डॉलर निर्धारित की गई है।

डॉलर के चढ़ते तेवर ने बिगाड़ा घरेलू बजट: 58 से 69 रुपये तक पहुंची कनाडाई मुद्रा की कीमत

जीआईसी की इस नई वृद्धि का सबसे तीखा प्रहार मुद्रा विनिमय दर (Currency Exchange Rate) के कारण हुआ है। वर्ष 2022-2023 के दौरान भारतीय मुद्रा बाजार में 1 कैनेडियन डॉलर की विनिमय दर लगभग 58 से 60 रुपये के आसपास झूल रही थी। उस दौर में 10,000 डॉलर की जीआईसी मात्र 6 लाख रुपये में पूरी हो जाती थी। किंतु बीते कुछ महीनों में वैश्विक आर्थिक उतार-चढ़ाव और कच्चे तेल की कीमतों के चलते कैनेडियन डॉलर मजबूत हुआ है और वर्तमान में 1 कैनेडियन डॉलर का विनिमय भाव लगभग 68.80 से 69 रुपये के उच्च स्तर पर कारोबार कर रहा है।

मुद्रा के इस अवमूल्यन का गणितीय विश्लेषण करें तो केवल 23,448 कैनेडियन डॉलर की जीआईसी को भारतीय मुद्रा में बदलने पर छात्रों के परिवारों को सीधे 16 लाख 15 हजार रुपये से लेकर 16 लाख 25 हजार रुपये की भारी-भरकम राशि केवल कनाडाई बैंक (जैसे Scotiabank, ICICI Bank Canada, CIBC या SBI Canada) में अग्रिम रूप से लॉक करानी पड़ रही है। इसमें बैंक ट्रांसफर चार्ज, फॉरेन एक्सचेंज कन्वर्जन टैक्स (TCS) और प्रशासनिक शुल्क जोड़ने पर यह खर्च आसानी से 17 लाख रुपये की दहलीज पार कर जाता है। डॉलर के महंगे होने से अभिभावकों की जेब पर सीधे तौर पर 60 से 70 हजार रुपये का अतिरिक्त तात्कालिक भार पड़ गया है, जो उनकी सुनियोजित वित्तीय योजना को पटरी से उतारने के लिए पर्याप्त है।

ट्यूशन फीस और रहने का खर्च मिलाकर 30 से 35 लाख का झटका: बैंक लोन और जमीन गिरवी रखने की नौबत

कनाडा में पढ़ाई के लिए जाने वाले विद्यार्थियों और उनके परिजनों को यह समझना जरूरी है कि 23,448 डॉलर की यह GIC राशि केवल पहले साल के रहने, खाने, यात्रा और दैनिक खर्चों का न्यूनतम पैमाना है। इसमें कॉलेज या यूनिवर्सिटी की ट्यूशन फीस रत्ती भर भी शामिल नहीं है। कनाडा के अधिकांश प्रतिष्ठित सरकारी कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में एक वर्ष की औसत ट्यूशन फीस 18,000 से 26,000 कैनेडियन डॉलर के बीच है।

इसका सीधा अर्थ यह है कि पहले साल की ट्यूशन फीस के रूप में लगभग 13 से 18 लाख रुपये का भुगतान भारत से ही कॉलेज को अग्रिम रूप से करना पड़ता है। यदि इसमें 16.20 लाख रुपये की GIC, भारत से कनाडा की वन-वे हवाई टिकट (लगभग 80 हजार से 1.20 लाख रुपये), बायोमेट्रिक्स व वीजा प्रोसेसिंग फीस (लगभग 20 हजार रुपये), अनिवार्य स्वास्थ्य बीमा (Health Insurance) और कनाडा पहुंचने के बाद शुरुआती दिनों में आवास की सिक्योरिटी डिपॉजिट को जोड़ दिया जाए, तो छात्र को विमान में बैठने से पहले ही अपनी जेब से 32 से 36 लाख रुपये की भारी नकदी का बंदोबस्त करना पड़ रहा है। जो मध्यमवर्गीय अभिभावक अपनी बचत, भविष्य निधि (PF) या बैंक से एजुकेशन लोन लेकर बच्चों को विदेश भेजते थे, उनके लिए बैंकों से 35 लाख रुपये का अनसिक्योर्ड लोन मिलना लगभग नामुमकिन हो गया है। परिणामस्वरूप, कई परिवारों को अपनी पैतृक जमीन, खेती के भूखंड या पुश्तैनी मकान गिरवी रखकर या बेचकर निजी साहूकारों से महंगे ब्याज पर कर्ज लेने के लिए विवश होना पड़ रहा है।

पंजाब से लेकर यूपी के उन्नाव-कानपुर तक अभिभावकों की उड़ी नींद: स्टडी परमिट में 30% तक की गिरावट

विदेश में पढ़ाई का रुझान अब केवल पंजाब, चंडीगढ़ और हरियाणा के पारंपरिक गढ़ों तक ही सीमित नहीं रहा है, बल्कि इसका विस्तार उत्तर प्रदेश के प्रमुख औद्योगिक और शहरी केंद्रों तक व्यापक रूप से हो चुका है। उत्तर प्रदेश के उन्नाव, औद्योगिक नगरी कानपुर, राजधानी लखनऊ, वाराणसी और मेरठ जैसे जनपदों से हर साल हजारों की तादाद में छात्र बीटेक, मैनेजमेंट, हेल्थकेयर, डाटा साइंस और हॉस्पिटैलिटी के डिप्लोमा व डिग्री कोर्सेज के लिए कनाडा का रुख करते हैं।

उन्नाव और कानपुर परिक्षेत्र में संचालित होने वाले विदेशी शिक्षा परामर्श केंद्रों (Overseas Education Consultancies) के अनुसार, कनाडा सरकार द्वारा लगातार कड़े किए जा रहे नियमों और वित्तीय बोझ के चलते इस सत्र में पूछताछ और वीजा आवेदनों में 30 से 35 प्रतिशत तक की भारी गिरावट दर्ज की गई है। उन्नाव के सिविल लाइंस और कानपुर के काकादेव व स्वरूप नगर में स्थित वीजा कंसल्टेंट्स का कहना है कि जहां पिछले वर्ष इस सीजन में कनाडा के लिए प्रतिदिन दर्जनों फाइलें प्रोसेस होती थीं, वहीं अब अभिभावक बढ़े हुए बजट और डॉलर की मजबूती के कारण अपने हाथ पीछे खींच रहे हैं। कई छात्रों ने जिन्होंने ऑफर लेटर प्राप्त कर लिए थे, अब वे बैंक लोन की शर्तें पूरी न कर पाने के कारण अपनी सीट छोड़ने या आवेदन को अगले साल तक टालने (Defer) के लिए मजबूर हो रहे हैं। मध्यमवर्गीय अभिभावकों का कहना है कि इतनी बड़ी पूंजी दांव पर लगाने के बाद भी यदि भविष्य सुरक्षित न हो, तो यह जोखिम उठाना उनके बस के बाहर की बात है।

केवल फंड दिखाना काफी नहीं, आय के स्रोत (Source of Funds) पर भी सख्त हुई IRCC की नजर

कनाडा सरकार ने केवल GIC की सीमा बढ़ाकर ही इतिश्री नहीं की है, बल्कि स्टडी परमिट जारी करने के पूरे वेरिफिकेशन प्रोसेस को पहले से कहीं ज्यादा जटिल और पारदर्शी बना दिया है। आव्रजन विभाग ने स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं कि अब बैंक खाते में केवल 23,448 डॉलर या ट्यूशन फीस की रकम का दिख जाना ही वीजा मिलने की गारंटी नहीं होगा।

नए दिशा-निर्देशों के तहत, वीजा अधिकारी अब 'सोर्स ऑफ फंड्स' (धन के मूल स्रोत) की बहुत बारीक और गहरी जांच कर रहे हैं। यदि किसी आवेदक के बैंक खाते में आवेदन से ठीक कुछ दिन या हफ्ते पहले अचानक मोटी रकम (Bulk Deposit) ट्रांसफर की गई है, तो उस पर तत्काल आपत्ति दर्ज की जा रही है और आय के वैध प्रमाण, आयकर रिटर्न (ITR), जमीन की बिक्री के रजिस्टर्ड दस्तावेज या लोन सैंक्शन लेटर की मांग की जा रही है। यदि फंड का कोई विश्वसनीय और पुराना रिकॉर्ड नहीं मिलता, तो वीजा अधिकारी तुरंत आवेदन को 'फाइनेंशियल इनस्टेबिलिटी' या 'बनावटी फंड' का हवाला देकर खारिज (Refuse) कर रहे हैं। इसके अलावा, यदि छात्र का कोर्स एक वर्ष से अधिक यानी दो से चार वर्ष की डिग्री का है, तो आवेदक को यह भी लिखित और दस्तावेजी रूप से प्रमाणित करना पड़ रहा है कि वह दूसरे, तीसरे और चौथे साल की ट्यूशन फीस और रहने का खर्च कहां से और किन वित्तीय स्रोतों से जुटाएगा।

वर्क परमिट और पीआर के बदलते नियम: क्या अब भी कनाडा जाना समझदारी है?

कनाडा में केवल पढ़ाई का खर्च ही नहीं बढ़ा है, बल्कि पढ़ाई के बाद मिलने वाले पोस्ट-ग्रेजुएशन वर्क परमिट (PGWP) और स्थायी निवास (PR) की राह भी अब कांटों भरी हो चुकी है। कनाडाई प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो के प्रशासन ने देश में जारी ऐतिहासिक हाउसिंग क्राइसिस, स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव और बेरोजगारी दर में वृद्धि को देखते हुए अंतरराष्ट्रीय छात्रों की संख्या पर राष्ट्रीय स्तर पर सख्त 'कैप' (कोटा) लगा दिया है।

इसके साथ ही, पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल पर चलने वाले दर्जनों निजी कॉलेजों के कई कोर्सेज से पीजीडब्ल्यूपी की सुविधा समाप्त कर दी गई है। अब केवल उन्हीं कोर्सेज और विश्वविद्यालयों के छात्रों को वर्क परमिट में प्राथमिकता दी जा रही है जो कनाडा के स्थानीय श्रम बाजार की कमी (जैसे हेल्थकेयर, एसटीईएम, स्किल्ड ट्रेड्स और कृषि) से सीधे जुड़े हुए हैं। पढ़ाई के दौरान मिलने वाले ऑफ-कैंपस वर्क आवर्स को भी नियंत्रित किया गया है, जिससे छात्रों के लिए पार्ट-टाइम नौकरी करके अपनी कॉलेज फीस निकालना अब लगभग असंभव हो चुका है। ऐसे में जो छात्र इस उम्मीद में 35 लाख रुपये का भारी निवेश कर रहे हैं कि वे वहां जाकर पढ़ाई के साथ-साथ कमाकर कर्ज चुका देंगे, उनके सामने एक बहुत बड़ा वित्तीय संकट खड़ा हो रहा है। यही कारण है कि अब भारतीय छात्र कनाडा के विकल्प के तौर पर जर्मनी (जहां ट्यूशन फीस नगण्य है), आयरलैंड, फ्रांस, न्यूजीलैंड और जापान जैसे देशों के विकल्पों पर गंभीरता से विचार करने लगे हैं।