सुल्तानपुर लोधी से बटाला के लिए रवाना हुई श्री गुरु नानक देव जी की बारात, सदियों पुरानी अनूठी परंपरा आज भी पूरी शान से कायम

सुल्तानपुर लोधी से बटाला के लिए रवाना हुई श्री गुरु नानक देव जी की बारात, सदियों पुरानी अनूठी परंपरा आज भी पूरी शान से कायम

सिख पंथ के संस्थापक, मानवता के मार्गदर्शक और सिखों के पहले पातशाह श्री गुरु नानक देव जी के पावन विवाह पर्व यानी 'ब्याह पुरब' को लेकर पंजाब भर में भक्ति, उल्लास और श्रद्धा का अद्भुत संगम देखने को मिल रहा है। ऐतिहासिक नगरी सुल्तानपुर लोधी (कपूरथला) से जगतगुरु श्री गुरु नानक देव जी की अलौकिक बारात पूरे शाही ठाठ-बाट, धार्मिक मर्यादा और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ बटाला (गुरदासपुर) के लिए रवाना हो गई है। पवित्र गुरुद्वारा श्री बेर साहिब से जब 'बोले सो निहाल, सत श्री अकाल' के गगनभेदी जयकारों के बीच श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की छत्रछाया में भव्य नगर कीर्तन रूपी बारात आगे बढ़ी, तो पूरी नगरी गुरुमयी वातावरण में सराबोर हो गई।

सिख इतिहास में इस ऐतिहासिक दिन का विशेष महत्व है। सदियों पूर्व विक्रम संवत 1544 में भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को श्री गुरु नानक देव जी का विवाह माता सुलखनी जी के साथ बटाला में संपन्न हुआ था। आज 500 से अधिक वर्ष बीत जाने के बाद भी यह पावन परंपरा उसी जीवंतता, श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ निभाई जा रही है। देश-विदेश से उमड़ी लाखों की संगत इस आलौकिक बारात में बाराती बनकर स्वयं को सौभाग्यशाली मान रही है।

फूलों की वर्षा और पंज प्यारों की अगुवाई में रवाना हुई अलौकिक बारात

प्रातः काल ऐतिहासिक गुरुद्वारा श्री बेर साहिब में श्री अखंड पाठ साहिब के भोग डाले गए, जिसके उपरांत हजूरी रागी जत्थों ने गुरुबाणी के वैराग्यमयी और आनंदमयी कीर्तन से संगतों को निहाल किया। इसके पश्चात शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) के पदाधिकारियों, संतों-महापुरुषों और प्रशासनिक अधिकारियों की उपस्थिति में अरदास संपन्न हुई।

अरदास के बाद फूलों से अत्यंत मनमोहक रूप से सजाई गई पालकी साहिब में श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी को सुशोभित किया गया। पारंपरिक वेशभूषा में सजे पंज प्यारों की अगुवाई में यह विशाल नगर कीर्तन आरंभ हुआ। नगर कीर्तन के आगे-आगे घुड़सवार निहंग सिंह अपनी पारंपरिक पोशाक में चल रहे थे, वहीं गतका जत्थों ने अपने अद्भुत युद्ध कौशल और हैरतअंगेज करतब दिखाकर उपस्थित जनसमूह को मंत्रमुग्ध कर दिया। मार्ग में सुल्तानपुर लोधी के स्थानीय निवासियों और श्रद्धालुओं ने छतों से पुष्प वर्षा कर बारात का स्वागत किया।

जगह-जगह भव्य स्वागत और लंगरों की अटूट सेवा

सुल्तानपुर लोधी से आरंभ होकर यह पावन बारात नगर कीर्तन डडविंडी, सुभानपुर, ब्यास, बाबा बकाला और दयालगढ़ होते हुए देर शाम बटाला पहुंचेगी। पूरे यात्रा मार्ग पर सिख संगतों और विभिन्न धार्मिक-सामाजिक संस्थाओं द्वारा बारात के स्वागत के लिए तोरण द्वार बनाए गए हैं।

मार्ग में जगह-जगह विभिन्न प्रकार के लंगर लगाए गए हैं। मिठाइयों, ठंडे-मीठे जल, फल, खीर और पूड़ी-छोले के अटूट लंगर वितरित किए जा रहे हैं। स्थानीय लोग बारात में शामिल देश-विदेश से आई संगतों की सेवा में पूरी विनम्रता से जुटे हुए हैं। पुलिस व जिला प्रशासन द्वारा यातायात व्यवस्था और संगतों की सुरक्षा के लिए कड़े इंतजाम किए गए हैं ताकि नगर कीर्तन निर्बाध रूप से अपने गंतव्य तक पहुंच सके।

बटाला की ऐतिहासिक कच्ची दीवार और विवाह से जुड़ा अमर इतिहास

श्री गुरु नानक देव जी के ब्याह पुरब का केंद्र बिंदु गुरदासपुर जिले का ऐतिहासिक शहर बटाला है, जिसे ससुराल नगरी के रूप में जाना जाता है। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, जब गुरु नानक देव जी बारात लेकर बटाला पहुंचे थे, तो वे माता सुलखनी जी के पिता मूल चंद खत्री के घर के पास एक कच्ची मिट्टी की दीवार के सहारे विश्राम करने बैठे थे।

कथा के अनुसार, स्थानीय लोगों ने दूल्हे बने नानक जी के साथ हास्य-परिहास और परीक्षा लेने के उद्देश्य से एक वृद्ध महिला को भेजा जिसने गुरु जी से कहा कि यह दीवार अत्यंत कच्ची है और किसी भी क्षण गिर सकती है, अतः वे यहां से हट जाएं। इस पर अंतर्यामी गुरु नानक देव जी ने मंद-मंद मुस्कुराते हुए फरमाया—"माता, यह दीवार सदियों तक इसी प्रकार अडिग रहेगी और कभी नहीं गिरेगी।" आज भी गुरुद्वारा श्री कंध साहिब (बटाला) में वह कच्ची दीवार शीशे के फ्रेम में सुरक्षित रूप से संरक्षित है, जो गुरु साहिब के वचनों और आस्था का जीता-जागता प्रमाण है।

गुरुद्वारा डेहरा साहिब में संपन्न होंगी विवाह की पारंपरिक रस्में

बटाला पहुंचने पर बारात का स्वागत 'लाडली बेटी के मायके' की तरह भव्य और आत्मीय तरीके से किया जाएगा। मुख्य धार्मिक समागम ऐतिहासिक गुरुद्वारा श्री डेहरा साहिब में आयोजित किए जा रहे हैं, जो माता सुलखनी जी का पैतृक निवास स्थान माना जाता है। यहीं पर गुरु नानक देव जी और माता सुलखनी जी के विवाह की मूल रस्में संपन्न हुई थीं।

रात्रि के समय पारंपरिक 'मिलनी' की रस्म निभाई जाएगी, जिसके बाद देर रात तक रागी जत्थे 'सुणि सजण प्रेम संदेसड़ा' और आनंद कारज के शबदों का गायन करेंगे। गुरुद्वारा कंध साहिब, गुरुद्वारा डेहरा साहिब और गुरुद्वारा तंबू साहिब को रंग-बिरंगी दूधिया रोशनी और देशी-विदेशी फूलों से दुल्हन की तरह सजाया गया है। यह आलौकिक पर्व न केवल एक ऐतिहासिक विवाह का स्मरण कराता है, बल्कि गुरु नानक देव जी द्वारा दिए गए गृहस्थ जीवन के महत्व, समानता और सादगी के दिव्य संदेश को भी जन-जन तक पहुंचाता है।