DAP की किल्लत से पंजाब में हाहाकार: 5.5 लाख टन मांग के सामने आधे से भी कम मिली खाद, विधायक राणा इंद्रप्रताप सिंह ने खोला मोर्चा

DAP की किल्लत से पंजाब में हाहाकार: 5.5 लाख टन मांग के सामने आधे से भी कम मिली खाद, विधायक राणा इंद्रप्रताप सिंह ने खोला मोर्चा

पंजाब के कृषि प्रधान अंचल में धान की कटाई के बाद अब अगली मुख्य फसलों की तैयारी के बीच अन्नदाता एक बार फिर गंभीर संकट के मुहाने पर खड़ा हो गया है। रबी सीजन की जीवनरेखा कही जाने वाली डाई-अमोनियम फॉस्फेट यानी डीएपी (DAP) खाद की भारी किल्लत ने पूरे राज्य के किसानों की पेशानी पर बल ला दिए हैं। सुल्तानपुर लोधी से निर्दलीय विधायक राणा इंद्रप्रताप सिंह ने चंडीगढ़ में एक अहम प्रेस कॉन्फ्रेंस कर राज्य में खाद वितरण तंत्र और प्रशासनिक कार्यप्रणाली को लेकर तीखा हमला बोला है। विधायक ने आधिकारिक आंकड़ों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि पंजाब को मौजूदा कृषि चक्र में लगभग 5.5 लाख मीट्रिक टन डीएपी खाद की सख्त आवश्यकता है, लेकिन अब तक राज्य को इसकी आधी मात्रा भी उपलब्ध नहीं कराई जा सकी है।

खाद की अनुपलब्धता के कारण ग्रामीण इलाकों में सहकारी सोसायटियों और खाद बिक्री केंद्रों के बाहर सुबह से ही किसानों की लंबी कतारें लग रही हैं। मालवा, माझा और दोआबा के तमाम जिलों—कपूरथला, जालंधर, लुधियाना, बठिंडा, संगरूर और फिरोजपुर में स्थिति दिन-प्रतिदिन नाजुक होती जा रही है। समय पर खाद न मिलने से आलू और गेहूं की बुवाई में देरी का जोखिम बढ़ गया है, जिससे आने वाले महीनों में फसल की पैदावार सीधे तौर पर प्रभावित होने की आशंका गहरा गई है। प्रेस वार्ता के दौरान विधायक राणा इंद्रप्रताप सिंह ने खाद संकट के साथ-साथ पंजाब के प्रशासनिक महकमे में आर्म्स लाइसेंस जारी करने के नाम पर 3 से 5 लाख रुपये तक की कथित रिश्वतखोरी का सनसनीखेज आरोप लगाकर सियासी गलियारों में नई बहस छेड़ दी है।

5.5 लाख टन की भारी मांग और मिली आधी से भी कम: पंजाब में क्यों गहराया खाद संकट?

पंजाब की खेती की संरचना ऐसी है कि खरीफ फसलों की विदाई के तुरंत बाद रबी फसलों की बुवाई के लिए जमीन तैयार की जाती है। राज्य के कृषि विभाग के पूर्व आकलनों के अनुसार, गेहूं और अगेती आलू की बुवाई के लिए पंजाब को कम से कम 5.5 लाख मीट्रिक टन डीएपी की जरूरत होती है। इसमें से अकेले गेहूं की खेती के लिए लगभग 4.8 लाख मीट्रिक टन और आलू व अन्य मौसमी सब्जियों के लिए करीब 70 से 80 हजार मीट्रिक टन डीएपी का कोटा निर्धारित रहता है।

विधायक राणा इंद्रप्रताप सिंह ने दस्तावेजों के साथ दावा किया कि मौजूदा समय में पंजाब के गोदामों और वितरण केंद्रों तक मांग के मुकाबले 50 प्रतिशत से भी कम खाद पहुंची है। केंद्र सरकार से मिलने वाले रैक की अनियमितता और राज्य स्तर पर भंडारण के कमजोर प्रबंधन ने इस संकट को अप्रत्याशित रूप से बढ़ा दिया है। जब किसानों को बुवाई के पहले हफ्ते में ही खाद नहीं मिलेगी, तो पूरी कृषि समय-सारिणी पटरी से उतर जाएगी। राज्य की सहकारी सोसायटियों को प्राथमिक स्तर पर खाद आवंटित करने में भारी देरी हुई है, जिससे निजी व्यापारियों के हाथों में किसानों का शोषण होने का रास्ता साफ हो रहा है।

गेहूं और आलू की बुवाई पर सीधा प्रहार: डीएपी की अनुपलब्धता से पैदावार घटने का खतरा

कृषि विज्ञान के जानकारों के मुताबिक डीएपी खाद में 46 प्रतिशत फॉस्फोरस और 18 प्रतिशत नाइट्रोजन का संतुलित मिश्रण होता है। यह रासायनिक संरचना पौधे की शुरुआती वृद्धि, विशेष रूप से जड़ों के फैलाव (Root Development) और तने की मजबूती के लिए अपरिहार्य मानी जाती है। जब किसान गेहूं के बीज को मिट्टी में डालता है, तो उसी समय बीज के साथ डीएपी का संपर्क होना जरूरी होता है ताकि पौधा ठंड शुरू होने से पहले जमीन में अपनी पकड़ मजबूत कर सके।

विशेष रूप से दोआबा क्षेत्र, जिसमें जालंधर, होशियारपुर और कपूरथला आते हैं, वहां आलू की नकदी फसल बड़े पैमाने पर लगाई जाती है। आलू की खेती में समय की पाबंदी बेहद संवेदनशील होती है। यदि बुवाई के निर्धारित चक्र में 10 से 15 दिन की भी देरी हो जाए या शुरुआती खुराक में डीएपी न मिले, तो कंद का आकार छोटा रह जाता है और उत्पादन में 20 से 30 प्रतिशत तक की सीधी गिरावट आ सकती है। किसानों का कहना है कि वे पहले ही बेमौसम बारिश, पराली प्रबंधन की सख्ती और मंडियों में धान खरीद की धीमी गति से जूझ रहे थे, और अब डीएपी की किल्लत ने उनकी कमर पूरी तरह तोड़ दी है।

सहकारी सोसायटियों के बाहर कतारें और कालाबाजारी की आशंका: पिसता हुआ आम किसान

जमीनी स्तर पर स्थिति यह है कि गांव-गांव में सहकारी कृषि सभाओं के बाहर खाद का एक-एक थैला पाने के लिए किसानों के बीच छीना-झपटी जैसे हालात बन रहे हैं। सोसायटियों में खाद का स्टॉक आते ही कुछ ही घंटों में खाली हो रहा है, जबकि अधिकांश छोटे और सीमांत किसान खाली हाथ घर लौटने को मजबूर हैं। कई स्थानों पर किसानों को टोकन बांटकर कई-कई दिनों बाद आने को कहा जा रहा है।

सप्लाई की इस कृत्रिम कमी का फायदा उठाकर बाजार में कालाबाजारी का खतरा भी मंडराने लगा है। आरोप लग रहे हैं कि कई निजी डीलर निर्धारित सरकारी दर से ज्यादा कीमत वसूल रहे हैं या डीएपी की एक बोरी के साथ जबरन कीटनाशक, सल्फर अथवा नैनो यूरिया की बोतलें खरीदने का दबाव बना रहे हैं। यदि कोई किसान अतिरिक्त उत्पाद खरीदने से मना करता है, तो उसे डीएपी उपलब्ध न होने का बहाना बनाकर लौटा दिया जाता है। इस दोहरी मार से सबसे ज्यादा नुकसान उन बटाईदारों और छोटे किसानों को हो रहा है जिनकी क्रय क्षमता बेहद सीमित है।

आर्म्स लाइसेंस के नाम पर 3 से 5 लाख की रिश्वत का सनसनीखेज आरोप: प्रशासनिक व्यवस्था पर उठाए सवाल

चंडीगढ़ में आयोजित इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में विधायक राणा इंद्रप्रताप सिंह ने केवल कृषि संकट तक ही अपनी बात सीमित नहीं रखी, बल्कि उन्होंने पंजाब के गृह विभाग और प्रशासनिक महकमे में फैले कथित भ्रष्टाचार की पोल खोलते हुए बड़ा हमला बोला। उन्होंने खुले तौर पर आरोप लगाया कि राज्य में सुरक्षा कारणों या खेल कोटे के तहत आर्म्स लाइसेंस बनवाने के लिए आम नागरिकों से 3 से 5 लाख रुपये तक की रिश्वत की मांग की जा रही है।

विधायक ने कहा कि पंजाब एक सीमावर्ती राज्य है जहां किसानों और कारोबारियों को अपनी जान-माल की हिफाजत के लिए वैध हथियारों की जरूरत होती है। लेकिन मौजूदा व्यवस्था में ईमानदार और वैध आवेदकों की फाइलें महीनों तक दफ्तरों में धूल फांकती रहती हैं, जबकि दलालों और घूस के जरिए अयोग्य लोगों के काम फटाफट हो जाते हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री से इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच कराने की मांग करते हुए कहा कि जब तक सरकारी दफ्तरों से भ्रष्टाचार का यह मकड़जाल खत्म नहीं होगा, तब तक आम जनता को बुनियादी सहूलियतें भी बिना सिफारिश के नहीं मिल सकेंगी।

वैकल्पिक खादों के दावे और जमीनी हकीकत: एनपीके और एसएसपी पर क्यों हिचक रहे हैं किसान?

डीएपी के संकट को देखते हुए कृषि वैज्ञानिकों और सरकारी तंत्र की ओर से किसानों को वैकल्पिक खादों, जैसे एनपीके (NPK 12:32:16) और सिंगल सुपर फॉस्फेट (SSP) का इस्तेमाल करने की सलाह दी जा रही है। विशेषज्ञों का तर्क है कि एनपीके में फॉस्फोरस के साथ-साथ पोटाश की मात्रा भी होती है, जो फसल को रोग प्रतिरोधक क्षमता देती है। वहीं एसएसपी मिट्टी को सल्फर प्रदान करता है।

इसके बावजूद जमीनी स्तर पर किसान इन विकल्पों को तुरंत अपनाने में हिचकिचा रहे हैं। किसानों का मानना है कि पंजाब की जमीनों में दशकों से पारंपरिक डीएपी के प्रयोग की आदत रही है और सीड-कम-फर्टिलाइजर ड्रिल मशीनों की सेटिंग भी डीएपी के दानों के अनुकूल निर्धारित होती है। इसके अलावा बाजार में एनपीके और एसएसपी की उपलब्धता भी मांग के अनुपात में सुलभ नहीं है। कई इलाकों में किसानों का यह भी आरोप है कि सरकार अपनी आपूर्ति विफलता को छिपाने के लिए अचानक विकल्पों का प्रचार करने लगती है, जबकि सीजन शुरू होने से तीन महीने पहले बफर स्टॉक तैयार करना नीतिगत जिम्मेदारी थी।

रबी सीजन बचाने के लिए त्वरित कदमों की दरकार: किसान संगठनों ने दी आंदोलन की चेतावनी

पंजाब में खाद की कमी का यह मामला अब पूरी तरह से राजनीतिक और सामाजिक आंदोलन का रूप लेता नजर आ रहा है। विभिन्न किसान संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि अगले एक सप्ताह के भीतर रेलवे रैक के जरिए पंजाब के सभी जिलों में डीएपी की निर्बाध खेप नहीं पहुंचाई गई, तो वे जिला मुख्यालयों और मुख्य मार्गों पर प्रदर्शन करने को विवश होंगे।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस आसन्न संकट से निपटने के लिए पंजाब सरकार को तुरंत केंद्र सरकार के रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के साथ आपातकालीन तालमेल स्थापित करना होगा। साथ ही रेलवे के जरिए उर्वरक ले जाने वाली विशेष मालगाड़ियों को प्राथमिकता के आधार पर पंजाब के अनलोडिंग पॉइंट्स तक पहुंचाना होगा। इसके अलावा जिला उपायुक्तों (डीसी) और कृषि अधिकारियों की उड़नदस्ता टीमों का गठन कर निजी खाद विक्रेताओं के गोदामों की औचक जांच की जानी चाहिए, ताकि किसी भी प्रकार की जमाखोरी और टैगिंग को रोका जा सके। यदि इस दिशा में फौरी तौर पर ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो पंजाब की धरती से देश के अन्न भंडार को मिलने वाले अनाज के कोटे पर गंभीर आंच आ सकती है।