बिना परमिशन सोशल मीडिया पर PGI का नाम-लोगो इस्तेमाल किया तो नपेगी नौकरी
उत्तर भारत के सबसे प्रतिष्ठित चिकित्सा और अनुसंधान संस्थानों में शुमार स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (PGIMER) चंडीगढ़ अब सोशल मीडिया के बढ़ते दुरुपयोग, मरीजों की निजता के हनन और संस्थान की आधिकारिक छवि को सुरक्षित रखने के लिए बेहद कड़े कदम उठाने जा रहा है। संस्थान से जुड़े रेजिडेंट डॉक्टरों, मेडिकल छात्रों, प्रोफेसर्स, पैरामेडिकल स्टाफ और विभिन्न कर्मचारी व छात्र संगठनों द्वारा इंटरनेट मीडिया पर पीजीआई के नाम और आधिकारिक लोगो (Logo) के बेलगाम इस्तेमाल पर लगाम लगाने के लिए प्रशासन ने पूरी रूपरेखा तैयार कर ली है। नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) की सख्त सोशल मीडिया पॉलिसी की तर्ज पर अब पीजीआई चंडीगढ़ में भी व्यापक दिशा-निर्देश लागू किए जाएंगे। इस पूरे मामले को लेकर एक उच्चस्तरीय विशेषज्ञ कमेटी का गठन कर दिया गया है, जिसकी सिफारिशों के आधार पर संस्थान की आधिकारिक सोशल मीडिया आचार संहिता जारी होगी। नए प्रस्तावित नियमों के तहत संस्थान का नाम भुनाकर व्यक्तिगत प्रचार करने या मरीजों के केस हिस्ट्री को बिना अनुमति इंटरनेट पर डालने वालों के खिलाफ सीधे अनुशासनात्मक और दंडात्मक कार्रवाई अमल में लाई जाएगी।
एम्स नई दिल्ली की तर्ज पर बनेगा नया नियम: पीजीआई के नाम और लोगो के उपयोग के लिए लेनी होगी लिखित मंजूरी
प्रस्तावित मसौदे के अनुसार, अब कोई भी डॉक्टर, स्वास्थ्यकर्मी या मेडिकल छात्र अपनी निजी सोशल मीडिया प्रोफाइल, यूट्यूब चैनल, फेसबुक पेज, पॉडकास्ट या एक्स (ट्विटर) हैंडल पर पीजीआई का आधिकारिक लोगो या संस्थान का नाम बिना पूर्व लिखित अनुमति के प्रदर्शित नहीं कर सकेगा। यह नियम सभी रेजिडेंट डॉक्टरों, सीनियर फैकल्टी मेंबर्स, गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों और यहां तक कि परिसर में सक्रिय छात्र संगठनों पर भी पूरी तरह बाध्यकारी होगा। अक्सर देखा जाता है कि कई मेडिकल प्रोफेशनल्स और स्टूडेंट्स अपने निजी फॉलोअर्स बढ़ाने, रील्स बनाने या अपने विचारों को आधिकारिक पीजीआई का रुख दिखाने के लिए संस्थान की पहचान का उपयोग करते हैं। प्रशासन का स्पष्ट मानना है कि संस्थान की प्रतिष्ठा और साख किसी भी व्यक्ति के निजी सोशल मीडिया एजेंडे से कहीं ऊपर है। इसलिए एक पारदर्शी अनुमति व्यवस्था बनाई जा रही है, जहां संस्थान के जनसंपर्क विभाग और सक्षम प्राधिकारी से अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) मिलने के बाद ही विशिष्ट शैक्षणिक या जागरूकता उद्देश्यों के लिए पीजीआई की पहचान का उपयोग किया जा सकेगा।
मरीजों की निजता पर कोई समझौता नहीं: फोटो, मेडिकल रिपोर्ट और इलाज का ब्योरा साझा करने पर लगा पूर्ण प्रतिबंध
नए नियमों के केंद्र में अस्पताल में आने वाले लाखों मरीजों की गरिमा और मेडिकल प्राइवेसी (Patient Privacy) की रक्षा करना है। पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड और पश्चिमी उत्तर प्रदेश समेत पूरे देश से गंभीर बीमारियों का इलाज कराने पीजीआई आने वाले मरीजों की पहचान को अत्यंत संवेदनशील माना गया है। कई बार डॉक्टर और मेडिकल इन्फ्लुएंसर्स दुर्लभ मामलों, सर्जिकल ऑपरेशनों या इलाज के दौरान मरीजों की तस्वीरें, वीडियो और उनकी मेडिकल रिपोर्ट्स को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर शैक्षणिक अध्ययन के नाम पर पोस्ट कर देते हैं। नए दिशानिर्देशों के तहत किसी भी मरीज की पहचान उजागर करने वाली तस्वीर, वीडियो, केस हिस्ट्री, डिस्चार्ज समरी या व्यक्तिगत डेटा को बिना विधिवत कानूनी सहमति और अस्पताल की संस्थागत समीक्षा बोर्ड (IRB) की मंजूरी के इंटरनेट पर अपलोड करना पूरी तरह प्रतिबंधित होगा। ऐसा करने को सीधे तौर पर मेडिकल एथिक्स का उल्लंघन माना जाएगा और आरोपी स्वास्थ्यकर्मी के खिलाफ कानूनी धाराओं के तहत भी कदम उठाए जा सकते हैं।
नियम तोड़ा तो 12 घंटे के भीतर हटानी होगी पोस्ट: छात्र संगठनों की मान्यता रद होने और निलंबन का प्रावधान
प्रस्तावित व्यवस्था में अनुशासनहीनता से निपटने के लिए बेहद कड़े और समयबद्ध दंडात्मक प्रावधान जोड़े जा रहे हैं। यदि कोई कर्मचारी, छात्र या रेजिडेंट डॉक्टर नियमों का उल्लंघन करते हुए कोई विवादित या आपत्तिजनक पोस्ट साझा करता है, तो शिकायत या नोटिस मिलने के महज 12 घंटे के भीतर उसे संबंधित सामग्री को अपने सोशल मीडिया हैंडल से हटाना होगा। तय समय सीमा में पोस्ट न हटाने पर संस्थान की अनुशासनात्मक समिति कठोर कदम उठाएगी। नियमों के उल्लंघन की गंभीरता के आधार पर लिखित चेतावनी जारी करने, वार्षिक वेतन वृद्धि रोकने, आंतरिक जांच बैठाने और आवश्यकता पड़ने पर सेवा या इंटर्नशिप से निलंबित करने तक की कार्रवाई की जा सकती है। इसके अलावा, यदि कोई पंजीकृत छात्र संघ या कर्मचारी संगठन बिना अनुमति के विरोध प्रदर्शनों या बयानों में संस्थान के नाम व लोगो का दुरुपयोग करता पाया गया, तो उसकी मान्यता तत्काल प्रभाव से रद करने की सिफारिश भी कमेटी के मसौदे में शामिल है।
उच्चस्तरीय कमेटी की रिपोर्ट का इंतजार: अंतिम मंजूरी के बाद पूरे संस्थान में लागू होगी नई सोशल मीडिया पॉलिसी
पीजीआई प्रशासन द्वारा गठित विशेष समिति फिलहाल देश के अन्य शीर्ष चिकित्सा संस्थानों के नियमों, कानूनी पहलुओं और सूचना प्रौद्योगिकी नियमों का बारीकी से अध्ययन कर रही है। कमेटी की रिपोर्ट और ड्राफ्ट अंतिम चरण में है, जिसे जल्द ही संस्थान के निदेशक और शासी निकाय (Governing Body) के समक्ष अंतिम स्वीकृति के लिए पेश किया जाएगा। रिपोर्ट पर मुहर लगते ही इस नई सोशल मीडिया पॉलिसी को आधिकारिक सर्कुलर के जरिए पूरे पीजीआई परिसर में लागू कर दिया जाएगा। इस कड़े कदम से जहां एक ओर डॉक्टरों और कर्मचारियों के बीच सोशल मीडिया पर जिम्मेदारी और पेशेवर मर्यादा का भाव पैदा होगा, वहीं दूसरी ओर चंडीगढ़ पीजीआई में उपचार कराने आने वाले गरीब और लाचार मरीजों की निजता को भी एक मजबूत सुरक्षा कवच मिल सकेगा।