95 ब्लॉकों में सुधरा जलस्तर, 4 डार्क जोन ब्लॉक पहुंचे 'सुरक्षित' श्रेणी में, जानिए नहरी क्रांति से कैसे दूर हो रहा सूखे का खतरा
पंजाब की उपजाऊ धरती पर पिछले कई दशकों से मंडरा रहा गंभीर भूजल संकट (Groundwater Crisis) अब धीरे-धीरे सकारात्मक बदलाव की ओर मुड़ता दिखाई दे रहा है। देश का 'अन्नदाता' कहे जाने वाले पंजाब में धान की सघन खेती, अत्यधिक ट्यूबवेलों के जाल और पानी के अनियंत्रित दोहन के चलते जमीन की कोख लगातार सूखती जा रही थी। नीति आयोग और केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) की कई रिपोर्टों में यह चेतावनी तक जारी कर दी गई थी कि यदि भूजल गिरने की रफ्तार यही रही, तो आने वाले कुछ वर्षों में पंजाब का बड़ा हिस्सा बंजर या रेगिस्तान में तब्दील हो सकता है।
लेकिन पंजाब सरकार के जल संसाधन विभाग, किसानों की जागरूकता और केंद्रीय भूजल मूल्यांकन के नवीनतम सर्वेक्षण में एक सुखद और क्रांतिकारी तस्वीर सामने आई है। राज्य के कुल 153 जल ब्लॉकों में से 95 ब्लॉकों में भूजल दोहन की दर में स्पष्ट गिरावट और जलस्तर में ठहराव व सुधार दर्ज किया गया है। सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही है कि चार ऐसे ब्लॉक जो वर्षों से 'अति-दोहित' (Over-Exploited / Dark Zone) या 'क्रिटिकल' श्रेणी में थे, वे अब आधिकारिक तौर पर 'सुरक्षित' (Safe Category) श्रेणी में वापस लौट आए हैं।
केंद्रीय भूजल रिपोर्ट का बड़ा खुलासा: 95 ब्लॉकों में सकारात्मक बदलाव, 4 डार्क जोन ब्लॉक बने 'सेफ'
केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) और पंजाब जल संसाधन विकास निगम के संयुक्त डायनामिक ग्राउंड वाटर असेसमेंट के आंकड़ों के अनुसार पंजाब में जल संरक्षण की दिशा में जमीनी स्तर पर ठोस असर दिखाई देने लगा है।
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चार ब्लॉक 'सुरक्षित' श्रेणी में शामिल: राज्य के चार प्रमुख संवेदनशील क्षेत्रों—जिनमें गुरदासपुर और मुक्तसर जिलों के ब्लॉक शामिल हैं—ने जल दोहन और रीचार्ज के संतुलन को साधते हुए 'ओवर-एक्सप्लॉइटेड' और 'सेमी-क्रिटिकल' श्रेणी से निकलकर 'सुरक्षित श्रेणी' (Safe Category) में प्रवेश किया है। इसका मतलब है कि इन ब्लॉकों में अब जितना पानी जमीन से निकाला जा रहा है, उससे अधिक पानी प्राकृतिक व कृत्रिम रूप से धरती में रीचार्ज हो रहा है।
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95 ब्लॉकों में दोहन दर में कमी: सर्वेक्षण के अनुसार 95 ब्लॉकों में ग्राउंडवाटर एक्सट्रैक्शन स्टेज (दोहन का प्रतिशत) पहले की तुलना में नीचे आया है। पहले जहां कई ब्लॉकों में 160% से 200% तक भूजल निकाला जा रहा था, वह आंकड़ा अब धीरे-धीरे घटकर संतुलित स्तर की तरफ बढ़ रहा है।
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डार्क जोन का दायरा सिकुड़ा: पंजाब में पहले लगभग 80 प्रतिशत से अधिक ब्लॉक 'डार्क जोन' में थे, जहां सबमर्सिबल पंपों की गहराई 200 से 400 फीट तक पहुंच चुकी थी। वर्तमान आंकड़ों के अनुसार डार्क जोन के ब्लॉकों में पानी का स्तर नीचे जाने की गति (Decline Rate) काफी हद तक थमी है।
नहरी सिंचाई का दायरा 80% तक पहुंचा: ट्यूबवेलों पर निर्भरता घटी और धरती की कोख में लौटा पानी
पंजाब में भूजल सुधार की इस सफलता के पीछे सबसे बड़ा योगदान राज्य के नहरी ढांचे का पुनरुद्धार और नहरी पानी को अंतिम छोर (टेल-एंड) तक पहुंचाना रहा है।
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26% से 80% नहरी सिंचाई: वर्ष 2022 से पहले पंजाब की कुल कृषि योग्य भूमि का मात्र 26 से 27 प्रतिशत हिस्सा ही नहरी पानी से सिंचित होता था, जबकि लगभग 73 प्रतिशत खेती पूरी तरह भूजल और ट्यूबवेलों पर निर्भर थी। पिछले तीन वर्षों में नहरी तंत्र के विस्तार के चलते नहरी सिंचाई का दायरा बढ़कर लगभग 80 प्रतिशत तक पहुंच चुका है।
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1,400 से अधिक गांवों तक पहुंची पहली बार नहर: मालवा और माझा के सीमावर्ती क्षेत्रों के 1,446 ऐसे गांवों में पक्के खाले और माइनर्स बनाकर नहरी पानी पहुंचाया गया, जहां आजादी के बाद से कभी नहर का पानी नहीं पहुंचा था।
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लाखों ट्यूबवेलों का बंद होना: जब किसानों को धान की रोपाई और सिंचाई के लिए नहरों से भरपूर और स्वच्छ पानी मिलने लगा, तो उन्होंने भारी हॉर्सपावर वाले ट्यूबवेल और सबमर्सिबल पंपों का उपयोग बेहद सीमित कर दिया। इससे अरबों लीटर भूजल जमीन के नीचे सुरक्षित बच गया।
धान की सीधी बिजाई (DSR) और कम अवधि वाली किस्में: पानी की बचत में किसानों का बड़ा योगदान
पारंपरिक रूप से धान (Paddy) की खेती में खेत में हफ्तों तक पानी भरकर रखना पड़ता है, जिससे भूजल का सबसे अधिक नुकसान होता है। पंजाब में कृषि विभाग की नीतियों और किसानों की पहल ने इस दिशा में गेम-चेंजर की भूमिका निभाई है:
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डायरेक्ट सीडिंग ऑफ राइस (DSR तकनीक): धान की सीधी बिजाई को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार द्वारा दी गई वित्तीय प्रोत्साहन राशि और जागरूकता अभियानों के कारण लाखों हेक्टेयर भूमि पर बिना कद्दू किए (Puddling) सीधे धान बोया गया। इस तकनीक से सिंचाई के पानी में 20 से 25 प्रतिशत की सीधी बचत हुई।
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कम समय में पकने वाली किस्में (PR-126): पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (PAU) द्वारा विकसित 'पीआर-126' जैसी धान की किस्मों को बड़े पैमाने पर अपनाया गया, जो मात्र 90 से 95 दिनों में तैयार हो जाती हैं। पूसा-44 जैसी लंबी अवधि (140-150 दिन) वाली किस्मों के मुकाबले पीआर-126 में 3 से 4 बार कम सिंचाई की आवश्यकता होती है, जिससे करोड़ों क्यूसेक भूजल की खपत रुकी।
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फसल विविधीकरण की शुरुआत: मालवा और कंडी क्षेत्रों में किसानों ने धान के चक्र से हटकर मक्का, बासमती, दालें, नरमा (कपास) और सब्जियों की खेती की ओर कदम बढ़ाया है, जो भूजल संरक्षण में सहायक सिद्ध हो रहा है।
ग्रामीण तालाबों का कायाकल्प और चेक डैम: बारिश के पानी से रिचार्ज हुए पंजाब के एक्विफर्स
जमीन से पानी निकालने के साथ-साथ बारिश के पानी को वापस जमीन के अंदर उतारने (Aquifer Recharge) के लिए चलाए गए व्यापक अभियानों ने भी जलस्तर सुधारने में अहम भूमिका निभाई है:
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हजारों छप्पड़ों (तालाबों) का सीचेवाल मॉडल पर जीर्णोद्धार: राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में हजारों पुराने तालाबों को साफ कर 'सीचेवाल मॉडल' और आधुनिक जल शोधन तकनीक से लैस किया गया। गंदे पानी को साफ करके सिंचाई में उपयोग किया गया और बारिश के पानी को फिल्टर कर भूजल पुनर्भरण के लिए सीधे जमीन में उतारा गया।
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शाहपुरकंडी बांध और कंडी क्षेत्र में चेक डैम: कंडी के पहाड़ी और अर्ध-पहाड़ी क्षेत्रों में छोटे चेक डैम बनाकर बरसाती नालों के पानी को रोका गया, जिससे शिवालिक की तलहटी से जुड़े पूरे क्षेत्र का वाटर टेबल तेजी से रिचार्ज हुआ।
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औद्योगिक व शहरी रूफटॉप रेनवाटर हार्वेस्टिंग: शहरों और औद्योगिक फोकल प्वाइंट्स पर इमारतों में वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting) प्रणालियों को अनिवार्य किए जाने से मानसून के दौरान जमीन के भीतर पानी का प्रवाह तेज हुआ है।
पंजाब के सामने अब भी क्या हैं चुनौतियां? दीर्घकालिक जल सुरक्षा के लिए रोडमैप
हालांकि 95 ब्लॉकों में सुधार और 4 ब्लॉकों का सुरक्षित श्रेणी में आना एक बेहद उत्साहजनक संकेत है, लेकिन जल विशेषज्ञों का मानना है कि पंजाब को पूरी तरह जल-सुरक्षित बनाने के लिए अभी एक लंबा सफर तय करना बाकी है।
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शेष डार्क जोन्स को सामान्य बनाना: पंजाब के कई मध्यवर्ती जिलों (जैसे संगरूर, बरनाला, पटियाला, मोगा और जालंधर) में अभी भी कुछ ब्लॉक अत्यधिक दोहन की श्रेणी में हैं, जहां भूजल स्तर को ऐतिहासिक स्तर पर लाने के लिए अगले 5 से 10 वर्षों तक निरंतर प्रयासों की आवश्यकता है।
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नहरी पानी के उपयोग को 86% से पार ले जाना: राज्य सरकार का अगला लक्ष्य नहरी सिंचाई के दायरे को 86% से ऊपर ले जाना और माइक्रो-इरिगेशन (ड्रिप व स्प्रिंकलर सिंचाई प्रणाली) पर 80% तक सब्सिडी देकर हर खेत तक बूंद-बूंद पानी पहुंचाना है।
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भूजल गुणवत्ता की सुरक्षा: केवल पानी की मात्रा ही नहीं, बल्कि भूजल की रासायनिक गुणवत्ता (फ्लोराइड, आर्सेनिक और भारी धातुओं से बचाव) को बनाए रखना भी पंजाब के स्वास्थ्य और भविष्य के लिए अनिवार्य है।
पंजाब में 95 ब्लॉकों में दर्ज हुआ यह सुधार यह साबित करता है कि यदि सही सरकारी नीतियां, तकनीकी नवाचार और किसानों की जागरूकता एक साथ मिल जाएं, तो गहरे से गहरे पर्यावरणीय संकट को भी सकारात्मक बदलाव में बदला जा सकता है।