क्या महंगा होगा UPI, ₹2000 से अधिक पर 0.4% MDR के फैसले पर घिरी सरकार
डिजिटल भुगतान क्रांति के नाम पर आम जनता और व्यापारियों को नकद रहित अर्थव्यवस्था की ओर मोड़ने के बाद अब केंद्र सरकार के एक नए फैसले ने देश भर में आर्थिक और राजनीतिक हलचल तेज कर दी है। पंजाब विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष प्रताप सिंह बाजवा ने 2,000 रुपये से अधिक के निर्दिष्ट यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू करने के केंद्र सरकार के फैसले की कड़े शब्दों में निंदा की है। उन्होंने इस प्रस्तावित शुल्क को डिजिटल इंडिया के मूल वादे से मुकरना और आम कारोबारियों की पीठ में छुरा घोंपने जैसा कदम करार दिया है।
चंडीगढ़ में पत्रकारों से बातचीत करते हुए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता बाजवा ने स्पष्ट किया कि 15 अक्टूबर से प्रभावी होने जा रहा यह निर्णय सीधे तौर पर शून्य-एमडीआर (Zero-MDR) मॉडल को खत्म करने की दिशा में उठाया गया कदम है। केंद्र सरकार ने पिछले कई वर्षों से लगातार देश के कोने-कोने में रेहड़ी-पटरी वालों, छोटे दुकानदारों और आम उपभोक्ताओं को यह भरोसा देकर क्यूआर कोड से जोड़ा था कि यूपीआई के माध्यम से लेन-देन हमेशा पूरी तरह निःशुल्क रहेगा। लेकिन अब जब पूरा देश डिजिटल भुगतान का आदी हो चुका है, तब पिछले दरवाजे से वित्तीय शुल्क थोपने की तैयारी की जा रही है।
छोटे व्यापारियों और एमएसएमई सेक्टर पर बढ़ेगा लागत का बोझ, मुनाफे में कटौती की आशंका
प्रताप सिंह बाजवा ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSME), खुदरा दुकानदार और छोटे व्यापारी पहले से ही बढ़ती महंगाई और जटिल कर प्रणाली के दबाव में हैं। खुदरा बाजार में अधिकांश कारोबारी बेहद मामूली मार्जिन या प्रॉफिट पर अपना व्यापार चलाते हैं। ऐसे में यदि 2,000 रुपये से अधिक के हर लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत की कटौती एमडीआर के रूप में की जाएगी, तो यह सीधे तौर पर उनके शुद्ध मुनाफे में भारी सेंध लगाएगा।
नेता प्रतिपक्ष ने इस तकनीकी दलील को भी खारिज कर दिया जिसमें कहा जा रहा है कि व्यापारी यह शुल्क सीधे ग्राहकों से नहीं वसूल सकेंगे। बाजवा ने कहा कि भले ही नियमों के तहत व्यापारियों पर उपभोक्ताओं से अतिरिक्त पैसे लेने की औपचारिक पाबंदी हो, लेकिन व्यापार का व्यावहारिक नियम यही है कि बढ़ी हुई संचालन लागत (Operating Cost) का अंतिम बोझ अप्रत्यक्ष रूप से बाजार में वस्तुओं और सेवाओं के दाम बढ़ाकर आम उपभोक्ता की जेब पर ही डाला जाता है। इससे न केवल बाजारों में उपभोक्ता मांग प्रभावित होगी, बल्कि नकद लेन-देन को दोबारा बढ़ावा मिलने का खतरा भी पैदा हो जाएगा।
विदेशी लॉबी के दबाव का आरोप: अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि की रिपोर्ट का दिया हवाला
केंद्र सरकार की नीतियों पर गंभीर सवाल उठाते हुए प्रताप सिंह बाजवा ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार रिपोर्टों का हवाला दिया। उन्होंने अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) की वर्ष 2026 की व्यापारिक रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए सनसनीखेज आरोप लगाया कि भारत के घरेलू यूपीआई और रुपे (RuPay) कार्ड नेटवर्क के जीरो-एमडीआर ढांचे पर अंतरराष्ट्रीय भुगतान कंपनियों और वैश्विक वित्तीय दिग्गजों द्वारा लंबे समय से कड़ी आपत्ति जताई जा रही थी। वैश्विक भुगतान कंपनियां भारत के इस स्वदेशी और मुफ्त डिजिटल ढांचे के कारण भारी मुनाफा कमाने से वंचित हो रही थीं।
बाजवा ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार घरेलू अर्थव्यवस्था, भारतीय दुकानदारों और आम जनता के हितों की रक्षा करने के बजाय अंतरराष्ट्रीय वित्तीय कंपनियों और वैश्विक दबाव के आगे झुकती दिखाई दे रही है। उन्होंने पूछा कि जब सरकारी खजाने से डिजिटल अवसंरचना को समर्थन देने की बात कही गई थी, तो अब अचानक ऐसा कौन सा वित्तीय संकट आ गया कि 2,000 रुपये से ऊपर के लेनदेन पर व्यापारियों से शुल्क वसूलने की नौबत आ गई है। यह कदम सीधे तौर पर उन लाखों स्टार्टअप्स और फिनटेक पहलों के लिए भी झटका साबित हो सकता है जो मुफ्त लेन-देन के दम पर फल-फूल रहे थे।
डिजिटल इंडिया के वादे पर अडिग रहने की मांग, एमडीआर व्यवस्था पर तत्काल पुनर्विचार की अपील
पंजाब के नेता प्रतिपक्ष ने प्रधानमंत्री और केंद्रीय वित्त मंत्रालय से इस फैसले पर तत्काल रोक लगाने और पूरी व्यवस्था पर पुनर्विचार करने का पुरजोर आग्रह किया है। उन्होंने मांग की कि डिजिटल इंडिया को वास्तव में जन-आंदोलन बनाए रखने के लिए सभी प्रकार के यूपीआई लेनदेन को हमेशा की तरह शून्य-शुल्क के दायरे में ही रखा जाना चाहिए। सरकार को अपने बजट से बैंकों और भुगतान सेवा प्रदाताओं को सब्सिडी प्रदान करनी चाहिए, न कि इसका बोझ व्यापारी वर्ग और आम जनता के कंधों पर डालना चाहिए।
बाजवा ने चेतावनी दी कि यदि 15 अक्टूबर से इस 0.4 प्रतिशत एमडीआर शुल्क को जबरन थोपा गया, तो देश भर के व्यापारी संगठन, व्यापारिक संघ और विपक्षी दल इसे लेकर सड़कों पर उतरने के लिए विवश होंगे। डिजिटल भुगतान प्रणाली को समावेशी, सुलभ और पूरी तरह किफायती बनाए रखना ही भारतीय अर्थव्यवस्था को पारदर्शी बनाने का एकमात्र रास्ता है, और किसी भी प्रकार का नया शुल्क इस पूरे सुधार को उल्टी दिशा में धकेल देगा।