क्या आर्यवीर पर है वीरेंद्र सहवाग का बेटा होने का भारी दबाव? जूनियर ओपनर ने दिया दो टूक और बेबाक जवाब

क्या आर्यवीर पर है वीरेंद्र सहवाग का बेटा होने का भारी दबाव? जूनियर ओपनर ने दिया दो टूक और बेबाक जवाब

भारतीय क्रिकेट में जब किसी दिग्गज खिलाड़ी की संतान 22 गज की पट्टी पर बल्ला या गेंद थामती है, तो उसके साथ उम्मीदों और तुलनाओं का एक भारी-भरकम बोझ अपने आप जुड़ जाता है। पूर्व विस्फोटक सलामी बल्लेबाज वीरेंद्र सहवाग के बड़े बेटे आर्यवीर सहवाग भी इन दिनों घरेलू सर्किट और एज-ग्रुप क्रिकेट में अपनी बल्लेबाजी को लेकर लगातार चर्चा में बने हुए हैं। क्रीज पर खड़े होने का अंदाज, बेखौफ शॉट चयन और हाथ-आंखों का बेहतरीन तालमेल देखकर अक्सर क्रिकेट प्रेमी और कमेंटेटर्स उनमें उनके पिता 'मुल्तान के सुल्तान' की झलक तलाशने लगते हैं।

लेकिन क्या एक महान विश्व विजेता क्रिकेटर का बेटा होना मैदान पर अतिरिक्त दबाव लाता है? क्या लोग जब उनकी तुलना वीरेंद्र सहवाग से करते हैं, तो वह असहज महसूस करते हैं? इन सभी सवालों पर 17 वर्षीय जूनियर ओपनर आर्यवीर ने बिना किसी झिझक के बेहद परिपक्व और बेबाक अंदाज में अपनी बात रखी है।

'पापा का नाम गर्व है, दबाव नहीं': आर्यवीर सहवाग

अक्सर यह माना जाता है कि बड़े क्रिकेटरों के बच्चों के लिए पिता की विरासत को आगे बढ़ाना मानसिक रूप से काफी तनावपूर्ण होता है। लेकिन आर्यवीर का नजरिया बिल्कुल अलग और सकारात्मक है।

तुलना और उम्मीदों के सवाल पर आर्यवीर ने स्पष्ट कहा:

"लोग क्या कहते हैं या वे मुझसे क्या उम्मीद करते हैं, यह उनके सोचने का तरीका है। मैं मैदान पर यह सोचकर कभी नहीं उतरता कि मुझे किसी को साबित करना है कि मैं वीरेंद्र सहवाग का बेटा हूं। मेरे लिए मेरे पिता का नाम कोई दबाव नहीं, बल्कि बहुत बड़ा गर्व और प्रेरणा है। जब मैं क्रीज पर बल्ला पकड़कर खड़ा होता हूं, तो सिर्फ सामने से आ रही गेंद को देखता हूं, यह नहीं सोचता कि मेरे नाम के पीछे क्या सरनेम लगा है।"

घरेलू सर्किट में दिखाया दम: दोहरा शतक जड़कर बटोरी थीं सुर्खियां

आर्यवीर सहवाग केवल अपने नाम के सहारे नहीं, बल्कि अपने बल्ले के दम पर भारतीय क्रिकेट के गलियारों में पहचान बना रहे हैं। दिल्ली क्रिकेट के जूनियर सेटअप (अंडर-16 और अंडर-19) में उन्होंने लगातार शानदार पारियां खेली हैं।

  • कूच बिहार ट्रॉफी में धमाका: बीसीसीआई के प्रतिष्ठित अंडर-19 टूर्नामेंट 'कूच बिहार ट्रॉफी' में मेघालय के खिलाफ खेलते हुए आर्यवीर ने महज 229 गेंदों में 200 रनों की नाबाद दोहरी शतकीय पारी खेलकर सबका ध्यान खींचा था।

  • स्ट्रोक प्ले और टाइमिंग: अपनी इस मैराथन पारी में उन्होंने चौकों-छक्कों की झड़ी लगाकर दिखाया था कि आक्रामकता उनके डीएनए में है, लेकिन साथ ही लंबी पारियां खेलने का धैर्य भी उनके पास मौजूद है।

  • दिल्ली एवं जिला क्रिकेट संघ (DDCA) के चयनकर्ताओं और कोचों का भी मानना है कि आर्यवीर की तकनीक और गेंद की लाइन को जल्दी भांपने की क्षमता उन्हें अपनी उम्र के बाकी खिलाड़ियों से अलग बनाती है।

पिता से क्या मिलती है सबसे बड़ी सलाह?

जब आर्यवीर से पूछा गया कि घर पर क्रिकेट को लेकर वीरेंद्र सहवाग से क्या बातचीत होती है और वह उन्हें किस तरह की सलाह देते हैं, तो उन्होंने बताया कि उनके पिता कभी भी उन पर अपने खेलने का तरीका थोपने की कोशिश नहीं करते।

आर्यवीर के अनुसार:

  • वीरू हमेशा उनसे यही कहते हैं कि अपनी खुद की पहचान और शैली विकसित करो।

  • सहवाग की मूल सलाह रहती है— "गेंद को उसकी मेरिट पर खेलो, मन को पूरी तरह शांत और खाली (Clutter-free) रखो, और खेल का आनंद लो।"

  • तकनीक में बहुत ज्यादा बदलाव करने के बजाय मानसिक दृढ़ता और सकारात्मक सोच पर ध्यान देने की सीख उन्हें घर से ही मिलती है।

तुलनाओं से दूर अपनी राह बनाने की जिद

रोहन गावस्कर से लेकर अर्जुन तेंदुलकर तक, भारतीय क्रिकेट में स्टार खिलाड़ियों के बेटों के सफर को हमेशा काफी बारीकी से आंका गया है। हालांकि, आर्यवीर सहवाग जिस सहजता और मानसिक मजबूती के साथ इन अपेक्षाओं को संभाल रहे हैं, वह काबिले-तारीफ है।

आर्यवीर का पूरा ध्यान फिलहाल दिल्ली की सीनियर टीम के दरवाजे खटखटाने और लाल गेंद के प्रारूप में अपनी निरंतरता को और मजबूत करने पर है। उन्होंने साफ कर दिया है कि वह किसी की परछाई बनने के बजाय 'आर्यवीर' के तौर पर अपनी अलग पहचान गढ़ने के लिए पूरी मेहनत कर रहे हैं।