भारत से मिली करारी हार के बाद श्रीलंका को आई मुरलीधरन-रंगना हेराथ की याद, बोले- उनकी जगह भरना कतई आसान नहीं

भारत से मिली करारी हार के बाद श्रीलंका को आई मुरलीधरन-रंगना हेराथ की याद, बोले- उनकी जगह भरना कतई आसान नहीं

भारतीय क्रिकेट टीम के खिलाफ घरेलू मैदान पर मिली करारी हार के बाद श्रीलंकाई क्रिकेट टीम के रणनीतिकारों और प्रशंसकों के बीच आत्ममंथन का दौर शुरू हो गया है। कभी अपनी ही टर्निंग पिचों पर दुनिया की बड़ी से बड़ी टीमों को घुटनों पर ला देने वाली श्रीलंकाई टीम अब अपने ही मजबूत गढ़ में बेअसर साबित हो रही है।

भारतीय बल्लेबाजों ने जिस अधिकार और आक्रामकता के साथ श्रीलंकाई स्पिनरों का सामना किया, उसने मेजबान टीम के गेंदबाजी आक्रमण की पोल खोलकर रख दी। इस एकतरफा मुकाबले के बाद श्रीलंकाई टीम प्रबंधन और पूर्व खिलाड़ियों ने खुले तौर पर स्वीकार किया कि टीम को आज भी अपने महान स्पिनरों की कमी बुरी तरह खल रही है।

मुथैया मुरलीधरन और रंगना हेराथ के सुनहरे दौर की यादें

मैच के बाद हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस और विशेषज्ञों की चर्चा में महान ऑफ स्पिनर मुथैया मुरलीधरन और बाएं हाथ के दिग्गज रंगना हेराथ का नाम सबसे प्रमुखता से उभरा। श्रीलंकाई टीम प्रबंधन के प्रतिनिधियों ने माना कि मुरलीधरन और हेराथ जैसे गेंदबाज केवल विकेट नहीं चटकाते थे, बल्कि वे विरोधी बल्लेबाजों पर ऐसा मनोवैज्ञानिक दबाव बनाते थे कि रन बनाना नामुमकिन हो जाता था।

मुरलीधरन ने अपने अंतरराष्ट्रीय करियर में 800 टेस्ट विकेट और 534 वनडे विकेट चटकाकर जो मानक स्थापित किए थे, उसके बाद रंगना हेराथ ने 433 टेस्ट विकेट लेकर उस परंपरा को बखूबी आगे बढ़ाया था। यह दोनों दिग्गज किसी भी पिच से टर्न और उछाल निकालकर अकेले दम पर मैच का रुख पलटने का माद्दा रखते थे।

'उनकी जगह भरना आसान नहीं': मौजूदा स्पिनरों की निरंतरता पर सवाल

श्रीलंकाई टीम के रणनीतिकारों ने साफ तौर पर कहा कि मुथैया मुरलीधरन और रंगना हेराथ जैसी पीढ़ीगत प्रतिभाएं रोज-रोज पैदा नहीं होतीं और उनके जाने के बाद बनी शून्यता को भरना कतई आसान काम नहीं है। वर्तमान टीम में वानिंदु हसरंगा, महीश तीक्ष्णा और प्रभात जयसूर्या जैसे प्रतिभाशाली गेंदबाज मौजूद जरूर हैं, लेकिन लंबे स्पेल फेंकने और शीर्ष स्तर के बल्लेबाजों के सामने लगातार एक टप्पे पर गेंदबाजी करने में निरंतरता की भारी कमी दिख रही है।

भारतीय बल्लेबाजों ने श्रीलंकाई स्पिनरों की ढीली गेंदों का पूरा फायदा उठाया और उन्हें क्रीज पर सेट होने का कोई मौका नहीं दिया। जब तक स्पिनर किसी योजना पर टिकते, तब तक भारतीय टीम मैच को अपनी मुट्ठी में कर चुकी थी।

घरेलू सर्किट और स्पिनरों को तराशने के सिस्टम पर उठती उंगलियां

इस हार ने श्रीलंका के घरेलू क्रिकेट ढांचे पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्रिकेट विशेषज्ञों का मानना है कि केवल रहस्यमयी एक्शन या सफेद गेंद के वेरिएशन पर निर्भर रहने वाले स्पिनर टेस्ट और वनडे के लंबे प्रारूप में टिक नहीं सकते।

जब तक देश के युवा स्पिनरों को पारंपरिक फ्लाइट, डिप, ड्रिफ्ट और धैर्यपूर्वक एक ही जगह गेंद टप्पा खिलाने का कड़ा अभ्यास नहीं कराया जाएगा, तब तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी टीमों के खिलाफ मैच जीतना असंभव रहेगा। हेराथ और मुरलीधरन घंटों तक एक ही लाइन-लेंथ पर गेंद फेंककर बल्लेबाजों को गलतियां करने पर मजबूर करते थे, जिसकी आज की युवा ब्रिगेड में साफ कमी नजर आ रही है।

श्रीलंकाई क्रिकेट के लिए आगे का कठिन रास्ता

आने वाले महीनों में श्रीलंका को कई महत्वपूर्ण द्विपक्षीय सीरीज और आईसीसी टूर्नामेंट्स खेलने हैं। भारत जैसी मजबूत टीम के हाथों मिली यह हार श्रीलंकाई क्रिकेट के लिए एक कड़ा वेक-अप कॉल है।

टीम मैनेजमेंट को अब पुराने दिग्गजों की यादों से बाहर निकलकर अपने मौजूदा स्पिनरों के साथ तकनीकी सुधारों पर काम करना होगा। यदि श्रीलंका को विश्व क्रिकेट के शीर्ष पर अपनी खोई हुई पहचान वापस पानी है, तो उसे अपनी गेंदबाजी की रीढ़ यानी स्पिन विभाग को दोबारा धारदार और आक्रामक बनाना ही होगा।