रविंद्र जडेजा का DRS पर 'निल बटे सन्नाटा' रिकॉर्ड: अगर ऐसा ही रहा तो कप्तानों का डिगेगा भरोसा, टीम इंडिया के लिए रिव्यू बना सबसे बड़ा सिरदर्द
भारतीय क्रिकेट टीम के दिग्गज ऑलराउंडर रविंद्र जडेजा की फिरकी और सटीक लाइन-लेंथ का लोहा पूरी दुनिया मानती है। टेस्ट क्रिकेट हो या सीमित ओवरों का प्रारूप, जडेजा जब हाथ में गेंद थामते हैं तो बल्लेबाजों के लिए रन बनाना और विकेट बचाना बेहद मुश्किल हो जाता है। उनकी अद्भुत फील्डिंग और उपयोगी बल्लेबाजी उन्हें दुनिया के सर्वश्रेष्ठ ऑलराउंडर्स की कतार में सबसे आगे रखती है। हालांकि, इस शानदार चमक के बीच एक ऐसा स्याह पहलू भी है, जो पिछले कुछ समय से भारतीय टीम मैनेजमेंट और कप्तानों के लिए लगातार सिरदर्द बना हुआ है। यह पहलू है डिसीजन रिव्यू सिस्टम यानी DRS को लेकर जडेजा का बेहद लचर और अप्रभावी ट्रैक रिकॉर्ड। मैदान पर हर दूसरी गेंद पर विकेट का दावा ठोकना और कप्तान पर रिव्यू लेने का भारी दबाव बनाना अब टीम इंडिया के लिए कई अहम मौकों पर भारी पड़ रहा है।
रविंद्र जडेजा और DRS का 'अजीबोगरीब' रिश्ता: क्यों हर बार मात खाती है टीम?
क्रिकेट में डीआरएस का उपयोग किसी भी टीम के लिए बेहद रणनीतिक हथियार होता है। एक पारी में सीमित रिव्यू मिलने की वजह से इसका इस्तेमाल सोच-समझकर करना अनिवार्य होता है। जब रविंद्र जडेजा गेंदबाजी करते हैं, तो उनकी गेंदों की गति तेज होती है और गेंद तेजी से पैड पर टकराती है। जडेजा अपनी अपील में इतने आश्वस्त और आक्रामक नजर आते हैं कि कई बार कप्तान उनकी आंखों में भरोसा देखकर रिव्यू लेने का इशारा कर बैठता है। लेकिन जैसे ही थर्ड अंपायर बड़ी स्क्रीन पर बॉल-ट्रैकिंग और रीप्ले चलाता है, गेंद या तो लेग स्टंप को मिस कर रही होती है या फिर उसका इम्पैक्ट (टकराव) ऑफ स्टंप के बाहर पाया जाता है। नतीजा यह होता है कि टीम इंडिया का बहुमूल्य रिव्यू बिना किसी परिणाम के बर्बाद हो जाता है।
जब कप्तान पर भारी पड़ा जडेजा का अति-उत्साह
मैदान पर भारतीय कप्तानों के साथ जडेजा की बातचीत के दृश्य अक्सर सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बनते हैं। रोहित शर्मा हों या अन्य कार्यवाहक कप्तान, कई बार स्टंप माइक में यह आवाज साफ सुनाई देती है जहां कप्तान जडेजा से पूछते हैं कि क्या गेंद स्टंप पर लग रही थी। जडेजा का जवाब हमेशा बेहद आत्मविश्वास से भरा होता है, लेकिन फैसला आने पर तस्वीर बिल्कुल उलट निकलती है। क्रिकेट के गलियारों में यह बात आम हो चुकी है कि जडेजा अपने आत्मविश्वास और जज्बात के आगे गेंद की वास्तविक ट्रैजेक्टरी को सही तरीके से आंक नहीं पाते। जब कोई गेंदबाज अपनी हर अपील को आउट मानने लगे, तो कप्तान के लिए सटीक फैसला लेना बेहद कठिन हो जाता है।
आंकड़ों में जडेजा का DRS ट्रैक रिकॉर्ड: 'निल बटे सन्नाटा' क्यों कह रहे एक्सपर्ट्स?
यदि पिछले कुछ वर्षों के आंकड़ों पर नजर डाली जाए, तो रविंद्र जडेजा की गेंदबाजी के दौरान लिए गए डीआरएस का सक्सेस रेट (सफलता दर) बेहद निराशाजनक रहा है। खासकर टेस्ट मैचों में, जहां दूसरी या तीसरी पारी में रिव्यू की कीमत सबसे ज्यादा होती है, वहां जडेजा के स्पैल में शुरुआती ओवरों में ही टीम अपने रिव्यू गंवा बैठती है। क्रिकेट विश्लेषकों का कहना है कि जडेजा के मामले में रिव्यू की सफलता दर 15 से 20 प्रतिशत से भी नीचे गिर चुकी है। इसका सबसे बड़ा नुकसान यह होता है कि जब मैच के अंतिम सत्र में विपक्षी टीम के मुख्य बल्लेबाज के खिलाफ अंपायर का कोई गलत फैसला आता है, तब भारत के पास रिव्यू बचता ही नहीं है। यही कारण है कि क्रिकेट पंडित अब जडेजा के डीआरएस फैसलों को 'निल बटे सन्नाटा' करार दे रहे हैं।
धोनी रिव्यू सिस्टम (DRS) बनाम जडेजा का रिव्यू: क्या है मुख्य अंतर?
भारतीय क्रिकेट में डीआरएस के सही इस्तेमाल का पैमाना हमेशा पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी रहे हैं। धोनी के समय डीआरएस को मजाक में 'धोनी रिव्यू सिस्टम' कहा जाने लगा था क्योंकि विकेट के पीछे से उनका फैसला 95 प्रतिशत सटीक बैठता था। धोनी कभी भी गेंदबाज के उत्साह में नहीं आते थे, बल्कि वे गेंद की लाइन, ऊंचाई और स्पिन को भांपकर ही रिव्यू का इशारा करते थे। इसके ठीक विपरीत, जडेजा विकेटकीपर की राय सुनने से पहले ही कप्तान को रिव्यू लेने के लिए मना लेते हैं। ऋषभ पंत, केएल राहुल या ध्रुव जुरेल जैसे विकेटकीपर भी कई बार जडेजा के जोरदार दबाव के सामने अपनी सटीक राय दर्ज नहीं करा पाते, जिससे टीम गलत फैसला ले बैठती है।
बाएं हाथ के स्पिनर की लाइन और एलबीडब्ल्यू का गणित
तकनीकी रूप से देखें तो बाएं हाथ के फिंगर स्पिनर के लिए दाएं हाथ के बल्लेबाज को एलबीडब्ल्यू आउट करना हमेशा एक बारीक खेल होता है। जडेजा की गेंद या तो तेजी से सीधी (आर्म बॉल) अंदर आती है या फिर टर्न होकर बाहर की तरफ निकलती है। राउंड द विकेट गेंदबाजी करते समय कोण इतना तिरछा होता है कि गेंद का स्टंप्स को हिट करना काफी मुश्किल होता है। गेंद अक्सर लेग स्टंप की लाइन को मिस कर जाती है। जडेजा अपनी तेज गति के कारण यह मान बैठते हैं कि बल्लेबाज पूरी तरह बीट हो चुका है और गेंद सीधे विकेटों में जाकर लगेगी। क्रिकेट विशेषज्ञों का मानना है कि जडेजा को यह तकनीकी सच्चाई स्वीकार करनी होगी कि हर पैड पर लगी गेंद विकेट नहीं होती।
टीम मैनेजमेंट के लिए नई रणनीति और सख्त प्रोटोकॉल की दरकार
अगर भारतीय टीम को आगामी विश्व टेस्ट चैंपियनशिप (WTC) और महत्वपूर्ण टेस्ट सीरीज में अपनी स्थिति मजबूत रखनी है, तो कप्तान और मुख्य कोच को डीआरएस के लिए एक सख्त नियम तय करना होगा। यह जरूरी है कि जब भी जडेजा किसी अपील पर रिव्यू की मांग करें, तो अंतिम फैसला केवल गेंदबाज के कहने पर न लिया जाए। विकेटकीपर और स्लिप में खड़े अनुभवी फील्डर की सहमति को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए। यदि विकेटकीपर गेंद की ऊंचाई या लाइन को लेकर पूरी तरह आश्वस्त न हो, तो कप्तान को साफ तौर पर रिव्यू लेने से इनकार कर देना चाहिए, चाहे गेंदबाज कितना भी दबाव क्यों न बनाए।
कप्तान का भरोसा और करियर की नई परिपक्वता
रविंद्र जडेजा भारतीय क्रिकेट के अनमोल रत्न हैं और उनकी मैच जिताने की क्षमता पर किसी को कोई संदेह नहीं है। लेकिन एक सीनियर खिलाड़ी होने के नाते उनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वे अपने व्यक्तिगत उत्साह को टीम के सामूहिक हित से ऊपर रखें। बार-बार रिव्यू बर्बाद होने से न केवल टीम का नुकसान होता है, बल्कि महत्वपूर्ण मौकों पर कप्तान का भरोसा भी गेंदबाज के कॉल से डगमगाने लगता है। यदि जडेजा अपने फैसलों में थोड़ी परिपक्वता और संयम शामिल कर लें, तो वे न सिर्फ एक घातक गेंदबाज बने रहेंगे, बल्कि टीम इंडिया के रिव्यू बचाने में भी एक जिम्मेदार भूमिका निभा सकेंगे।