टेस्ट क्रिकेट में अब क्यों नहीं लग रहे तिहरे शतक? हरभजन सिंह ने खोला बड़ा राज, बताया कैसे टी20 माइंडसेट और बदलती पिचों ने खत्म की मैराथन पारियां
टेस्ट क्रिकेट के इतिहास में 300 या उससे अधिक रनों की व्यक्तिगत पारी खेलना किसी भी बल्लेबाज के करियर की सबसे बड़ी उपलब्धि माना जाता रहा है। सर डॉन ब्रैडमैन, ब्रायन लारा, वीरेंद्र सहवाग, क्रिस गेल और कुमार संगकारा जैसे दिग्गजों ने मैदान पर घंटों पसीना बहाकर मैराथन पारियां खेलीं और रिकॉर्ड बुक में अपना नाम अमर किया। हालांकि, यदि पिछले एक दशक के अंतरराष्ट्रीय टेस्ट क्रिकेट के आंकड़ों पर नजर डालें, तो तिहरे शतक लगभग गायब से हो गए हैं। आधुनिक दौर में जहां बल्लेबाजों के पास उन्नत तकनीक, बेहतर सुरक्षा उपकरण और भारी बल्ले मौजूद हैं, वहीं 300 रनों का जादुई आंकड़ा छूना नामुमकिन सा क्यों होता जा रहा है? भारत के पूर्व महान ऑफ स्पिनर हरभजन सिंह ने इस रहस्य पर से पर्दा उठाते हुए इसके पीछे के असली तकनीकी, मानसिक और रणनीतिक कारणों का बेबाक विश्लेषण पेश किया है।
फ्लैट पिचों का अंत और परिणाम-उन्मुख विकेटों का बढ़ता चलन
हरभजन सिंह के अनुसार, टेस्ट क्रिकेट में तिहरे शतक न बनने की सबसे बड़ी वजह पिचों के मिजाज में आया युगांतरकारी बदलाव है। 90 के दशक और 2000 के शुरुआती वर्षों में कई देशों में पाटा और सपाट विकेट बनाए जाते थे, जहां पहले तीन दिन बल्लेबाजों के लिए स्वर्ग साबित होते थे। उन पिचों पर गेंद न तो ज्यादा टर्न होती थी और न ही उसमें अतिरिक्त उछाल या सीम मूवमेंट होता था, जिससे सेट बल्लेबाज आसानी से 500 से 600 गेंदें खेलकर 300 रनों का आंकड़ा पार कर लेते थे।
अब आईसीसी विश्व टेस्ट चैंपियनशिप (WTC) के आने के बाद हर मुकाबले में जीत हासिल करना अनिवार्य हो गया है। कोई भी घरेलू टीम अब ड्रॉ के लिए मैच नहीं खेलती। मेजबान देश ऐसी पिचें तैयार कर रहे हैं जहां पहले दिन के पहले सत्र से ही तेज गेंदबाजों को सीम और स्विंग मिले या फिर स्पिनरों की गेंद तेजी से टर्न हो। जब पिच पर हर गेंद कुछ न कुछ हरकत कर रही हो, तो किसी भी बल्लेबाज के लिए क्रीज पर 10 से 12 घंटे टिके रहना लगभग असंभव हो जाता है। मुश्किल पिचों पर 70 या 80 रनों की पारी भी शतक के बराबर मानी जा रही है।
टी20 क्रिकेट का प्रभाव और क्रीज पर टिकने के धैर्य में आई कमी
हरभजन सिंह ने आधुनिक बल्लेबाजों की मानसिकता पर सीधा प्रहार करते हुए कहा कि फ्रेंचाइजी टी20 लीग्स और तेज गति के क्रिकेट ने खिलाड़ियों के सोचने के तरीके को पूरी तरह बदल दिया है। आज के दौर के बल्लेबाज गेंद को छोड़ने (leave) और रक्षात्मक खेल खेलने के बजाय हर गेंद पर प्रहार करने की मानसिकता के साथ बड़े हो रहे हैं।
टेस्ट क्रिकेट में तिहरा शतक लगाने के लिए न केवल असाधारण शारीरिक फिटनेस चाहिए, बल्कि लोहे जैसा मानसिक अनुशासन और असीम धैर्य भी आवश्यक होता है। पुराने दौर के खिलाड़ी खराब गेंदों का इंतजार करते थे और अपने पसंदीदा क्षेत्र में गेंद आने तक 50-60 डॉट गेंदें खेलने से भी नहीं हिचकिचाते थे। आज के बल्लेबाज 15-20 डॉट गेंदें खेलने के बाद अधीर हो जाते हैं और जोखिम भरा शॉट खेलकर अपना विकेट गंवा बैठते हैं। जब बल्लेबाज 150 से 200 गेंदें भी नहीं खेल पा रहे हैं, तो 500 गेंदों की मैराथन पारी की उम्मीद करना बेमानी है।
कप्तानों की आक्रामक सोच और जल्दी पारी घोषित करने का नया कल्चर
रणनीतिक दृष्टिकोण से देखें तो आधुनिक टेस्ट कप्तानी में भी बड़ा बदलाव आया है। पहले टीमें पहली पारी में 650 या 700 रन बनाने के लिए दो से ढाई दिन तक बल्लेबाजी करती रहती थीं, जिससे किसी व्यक्तिगत बल्लेबाज को तिहरा शतक पूरा करने का पर्याप्त समय मिल जाता था।
आज के दौर में बेन स्टोक्स के 'बैजबॉल' दृष्टिकोण या भारतीय टीम की आक्रामक रणनीति ने इस पुरानी सोच को बदल दिया है। कप्तान अब 400 या 450 रन बनते ही पारी घोषित (Declare) करने का फैसला कर लेते हैं ताकि उनके गेंदबाजों को विपक्षी टीम के 20 विकेट चटकाने के लिए पर्याप्त समय मिल सके। मैच जीतने की इस आपाधापी में किसी व्यक्तिगत माइलस्टोन के लिए खेल को धीमा करने या समय बर्बाद करने की इजाजत कोई भी आधुनिक कप्तान नहीं देता।
अत्याधुनिक वीडियो एनालिटिक्स और गेंदबाजों की तूफानी फिटनेस
हरभजन सिंह ने इस बात को भी रेखांकित किया कि आधुनिक क्रिकेट में गेंदबाजों के पास तकनीक और डेटा का जबरदस्त बैकअप है। हर टीम के पास हाई-टेक वीडियो एनालिस्ट होते हैं जो किसी भी बल्लेबाज की तकनीक, फुटवर्क और कमजोरी का पूरा कच्चा चिट्ठा 10 मिनट में निकाल लेते हैं। यदि कोई बल्लेबाज क्रीज पर सेट भी हो जाता है, तो गेंदबाजी टीम तुरंत अपनी रणनीति बदलकर बल्लेबाज के कमजोर जोन में लगातार गेंदें फेंकने लगती है।
इसके अलावा, आज के तेज गेंदबाजों की फिटनेस और रोटेशन पॉलिसी इतनी शानदार है कि वे दिन के अंतिम सत्र में भी 140 से 145 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से सटीक यॉर्कर और बाउंसर फेंकने का दम रखते हैं। पुराने जमाने में जब गेंदबाज 20 ओवर फेंकने के बाद थक जाते थे, तब बल्लेबाज आसानी से रन बटोरते थे। आज चार-चार तेज गेंदबाजों और बेहतरीन स्पिनरों का रिले-अटैक बल्लेबाज को सांस लेने की फुर्सत नहीं देता।
सहवाग, लारा और गेल के दौर की कला क्या हमेशा के लिए खो गई?
वीरेंद्र सहवाग ने टेस्ट क्रिकेट में दो तिहरे शतक (309 और 319) जड़े, जबकि ब्रायन लारा ने 375 और नाबाद 400 रनों की ऐतिहासिक पारियां खेलीं। सहवाग की खासियत यह थी कि वे टेस्ट में भी वनडे की गति से खेलते थे, लेकिन उनका अपनी बुनियादी तकनीक और हैंड-आई कोऑर्डिनेशन पर पूरा नियंत्रण रहता था। भारत के लिए 2016 में करुण नायर ने चेन्नई में नाबाद 303 रन बनाए थे, और उसके बाद से किसी भी भारतीय बल्लेबाज के बल्ले से तिहरा शतक नहीं निकला है। विश्व क्रिकेट में भी डेविड वॉर्नर (335*) जैसे कुछ गिने-चुने नाम ही हाल के वर्षों में 300 के पार पहुंच सके हैं।
हरभजन सिंह का मानना है कि जब तक टेस्ट क्रिकेट में लाल मिट्टी और काली मिट्टी के ऐसे पारंपरिक ट्रैक नहीं लौटते जो 5 दिनों तक समान व्यवहार करें, तब तक तिहरे शतकों का सूखा खत्म होना मुश्किल है। आधुनिक क्रिकेट का रोमांच अब तीन या चार दिनों के अंदर आने वाले उतार-चढ़ाव भरे नतीजों में सिमट गया है, जहां व्यक्तिगत रिकॉर्ड्स से कहीं ज्यादा टीम की जीत और WTC पॉइंट्स टेबल के समीकरण मायने रखते हैं।