राम आसरे कुशवाहा की सपा में वापसी होते ही केशव मौर्य को याद आया पिछला चुनाव, बोले- 'तीन तिकड़म से नहीं पलटेगी बाजी'

राम आसरे कुशवाहा की सपा में वापसी होते ही केशव मौर्य को याद आया पिछला चुनाव, बोले- 'तीन तिकड़म से नहीं पलटेगी बाजी'

उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव 2027 की बिसात पर गैर-यादव ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) मतों को साधने की जंग तेज हो गई है। पूर्व कैबिनेट मंत्री प्रो. राम आसरे कुशवाहा के 13 साल बाद भाजपा छोड़कर दोबारा समाजवादी पार्टी में शामिल होते ही सूबे का सियासी पारा चढ़ गया है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव द्वारा पार्टी मुख्यालय में राम आसरे कुशवाहा का स्वागत किए जाने के चंद घंटों के भीतर उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने तीखा पलटवार किया। केशव मौर्य को न केवल 2022 का पिछला विधानसभा चुनाव याद आ गया, बल्कि उन्होंने अखिलेश यादव के 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले पर सीधा हमला बोलते हुए दावा किया कि 'तीन तिकड़म' और दलबदलुओं के सहारे बाजी नहीं पलटने वाली है।

केशव मौर्य का तीखा हमला: '2022 में भी सपा ने पाले थे मुगालते'

डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने सोशल मीडिया पर अखिलेश यादव को आड़े हाथों लेते हुए पिछले विधानसभा चुनाव का उदाहरण दिया। केशव मौर्य ने कहा कि 2022 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले भी समाजवादी पार्टी ने भाजपा के कई कद्दावर गैर-यादव ओबीसी नेताओं को तोड़कर अपनी पार्टी में शामिल कराया था और सत्ता में वापसी के बड़े-बड़े मुगालते पाले थे। उस वक्त भी स्वामी प्रसाद मौर्य, दारा सिंह चौहान और धर्म सिंह सैनी जैसे नेता चुनाव से ऐन पहले सपा में शामिल हुए थे, लेकिन जब ईवीएम खुली तो जनता ने भाजपा के विकास और कानून-व्यवस्था के मॉडल पर मुहर लगाते हुए सपा के जातीय समीकरणों को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। केशव मौर्य का साफ इशारा था कि इतिहास एक बार फिर खुद को दोहराएगा और नेताओं के पाला बदलने से जमीनी पिछड़ा वर्ग भाजपा का साथ नहीं छोड़ने वाला।

कौन हैं राम आसरे कुशवाहा और कानपुर-बुंदेलखंड में क्या है असर?

प्रोफेसर राम आसरे कुशवाहा उत्तर प्रदेश की राजनीति में गैर-यादव ओबीसी, विशेषकर कुशवाहा/मौर्य/शाक्य बिरादरी के पुराने और रसूखदार चेहरे माने जाते हैं। वे मुलायम सिंह यादव के बेहद करीबी रहे और 2003 से 2007 के बीच सपा सरकार में कैबिनेट मंत्री भी रहे। साल 2013 में सपा से अलग होने के बाद उन्होंने बसपा और फिर भाजपा का दामन थामा था। अब 13 साल बाद उनकी 'घर वापसी' को अखिलेश यादव कानपुर, फतेहपुर, बुंदेलखंड और मध्य यूपी की कुशवाहा बहुल सीटों पर अपनी पकड़ मजबूत करने की रणनीति के तौर पर देख रहे हैं। लोकसभा चुनाव 2024 में सपा के 'पीडीए' फॉर्मूले को मिली अप्रत्याशित सफलता के बाद अखिलेश यादव लगातार गैर-यादव पिछड़ी जातियों के बड़े नेताओं को जोड़कर 2027 के लिए सामाजिक संतुलन साधने की जुगत में हैं।

गैर-यादव ओबीसी पर वर्चस्व की सीधी लड़ाई

केशव प्रसाद मौर्य की इस त्वरित और तीखी प्रतिक्रिया के पीछे यूपी की जातिगत राजनीति का सबसे अहम गणित छिपा है।

  • भाजपा का मजबूत आधार: 2014 के बाद से भाजपा की लगातार चुनावी जीतों में गैर-यादव ओबीसी (कुशवाहा, मौर्य, सैनी, कुर्मी, लोध और निषाद) ने एक ठोस वोट बैंक की भूमिका निभाई है, जिसके सबसे प्रमुख चेहरों में केशव प्रसाद मौर्य शामिल हैं।

  • सपा की सेंधमारी की कोशिश: अखिलेश यादव 2024 के लोकसभा नतीजों के बाद से ही लगातार इस वोट बैंक में सेंध लगाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। लालजी वर्मा, राम अचल राजभर और बाबू सिंह कुशवाहा के बाद अब राम आसरे कुशवाहा को लाकर सपा यह संदेश देना चाहती है कि पिछड़े वर्ग का झुकाव अब पूरी तरह साइकिल की ओर है।

क्या है केशव मौर्य के बयान का बड़ा सियासी इशारा?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि केशव मौर्य का पिछला चुनाव याद दिलाना महज एक जुबानी हमला नहीं, बल्कि इसके गहरे मायने हैं। पहला इशारा यह है कि भाजपा अपने कोर ओबीसी वोट बैंक को लेकर पूरी तरह सतर्क है और किसी भी नेता के आने-जाने से संगठन के कैडर व जनता के भरोसे को डिगने नहीं देगी। दूसरा इशारा अखिलेश यादव के उस नैरेटिव को कुंद करना है, जिसमें वे खुद को पिछड़ों का एकमात्र रहनुमा साबित करने में जुटे हैं। केशव मौर्य ने यह जताने की कोशिश की है कि जनता अब अवसरवादी नेताओं के पाला बदलने के पीछे नहीं चलती, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कल्याणकारी नीतियों के साथ मजबूती से खड़ी है। 2027 के महासमर से पहले शुरू हुई यह नूराकुश्ती साफ बता रही है कि आने वाले दिनों में यूपी की राजनीति में पिछड़ा वर्ग ही सत्ता की चाबी साबित होने वाला है।