बिजली बिल में मनमानी करने वाले अफसरों पर अदालत का चाबुक: बस्ती में एक्सईएन और एसडीओ को 3-3 महीने की जेल, उपभोक्ता के 2 साल के बिल रद्द
उत्तर प्रदेश के बिजली विभाग में मनमाने बिल भेजने और उपभोक्ताओं की शिकायतों को नजरअंदाज करने वाले लापरवाह अधिकारियों के खिलाफ एक नजीर पेश करने वाला ऐतिहासिक फैसला सामने आया है। बस्ती जिले में बिजली बिल की गड़बड़ी और बार-बार शिकायत के बावजूद समस्या का समाधान न करने के मामले में जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने सख्त रुख अख्तियार किया है। आयोग के आदेश का पालन न करने और अदालत में हाजिर न होने पर वर्तमान अधिशासी अभियंता (एक्सईएन) विद्युत वितरण खंड द्वितीय और उपखंड अधिकारी (एसडीओ) भानपुर को तीन-तीन माह के साधारण कारावास की सजा सुनाई गई है।
आयोग की पीठ ने दोनों वरिष्ठ अधिकारियों पर 25-25 हजार रुपये का व्यक्तिगत अर्थदंड भी लगाया है। अर्थदंड जमा न करने की स्थिति में दोनों को एक-एक माह की अतिरिक्त जेल भुगतनी होगी। अदालत ने दोनों अफसरों के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी करते हुए पुलिस को उन्हें हिरासत में लेकर पेश करने का सख्त निर्देश दिया है।
गलत बिलिंग से शुरू हुआ विवाद: 59 हजार जमा करने के बाद भी भेजा 62 हजार का बकाया
इस पूरे कानूनी विवाद की जड़ें वर्ष 2024 की शुरुआत से जुड़ी हैं। बस्ती जिले के भानपुर निवासी मानवेंद्र सिंह ने अपनी व्यावसायिक फर्म 'राहुल ऑटो मोबाइल' के संचालन के लिए बिजली विभाग से वैध व्यावसायिक विद्युत कनेक्शन ले रखा था। जनवरी 2024 में उनके प्रतिष्ठान के मीटर में तकनीकी खराबी आ गई, जिसके चलते मीटर से अत्यधिक तेज और गलत रीडिंग दर्ज होने लगी।
मानवेंद्र सिंह ने 9 जनवरी 2024 को विधिवत रूप से संबंधित उपकेंद्र और अधिकारियों को लिखित शिकायत दर्ज कराई। विभाग ने मीटर की तकनीकी जांच करने के बजाय उन्हें सीधे तीन महीने का 59 हजार रुपये का भारी-भरकम बिल थमा दिया। कनेक्शन कटने के डर और व्यापारिक नुकसान से बचने के लिए उपभोक्ता ने यह पूरी रकम विभाग के खाते में जमा कर दी।
विवाद तब और गहरा गया जब मई 2024 में विभाग ने दोबारा 8,566 रुपये का नया बिल जारी किया। जब उपभोक्ता ने यूपीपीसीएल (UPPCL) के ऑनलाइन कंज्यूमर पोर्टल पर अपनी शिकायत दर्ज कराई, तो समाधान होने के बजाय सिस्टम में उनका बकाया बिल अचानक बढ़कर 62,143 रुपये प्रदर्शित होने लगा। बार-बार बिजली दफ्तरों के चक्कर काटने और अधिकारियों की बेरुखी से तंग आकर उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाने का फैसला किया।
उपभोक्ता आयोग का कड़ा रुख: 2 साल के बिल रद्द और 1.20 लाख का हर्जाना
बिजली विभाग के गैर-जिम्मेदाराना रवैये से आहत होकर मानवेंद्र सिंह ने अपने अधिवक्ता संजीव कुमार भट्टाचार्य के माध्यम से जिला उपभोक्ता आयोग में वर्ष 2024 में परिवाद दाखिल किया। मामले की सुनवाई के दौरान आयोग ने पाया कि बिजली विभाग ने बिना मीटर की सही जांच किए और बिना किसी पारदर्शी आधार के उपभोक्ता को मनमाने बिल भेजे थे।
आयोग के अध्यक्ष न्यायाधीश अमर जीत वर्मा और सदस्य अजय प्रकाश सिंह की पीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद 1 जनवरी 2026 को अंतिम फैसला सुनाया। आयोग ने अपने ऐतिहासिक निर्णय में अप्रैल 2024 के बाद जारी किए गए सभी बिजली बिलों को पूरी तरह से निरस्त (Cancel) कर दिया। इसके साथ ही उपभोक्ता को हुए मानसिक, आर्थिक और व्यापारिक उत्पीड़न के एवज में बिजली विभाग पर 1 लाख 20 हजार रुपये का हर्जाना लगाया गया। अदालत ने आदेश दिया था कि यदि विभाग 45 दिनों के भीतर इस आदेश का अनुपालन नहीं करता है, तो उसे हर्जाने की राशि पर 12 प्रतिशत वार्षिक की दर से ब्याज का भुगतान करना होगा।
आदेश की अनदेखी पड़ी भारी: धारा 72 के तहत 3 माह की कैद और गिरफ्तारी वारंट
अदालत के स्पष्ट आदेश के बावजूद अधिशासी अभियंता और एसडीओ भानपुर ने तय समय सीमा (45 दिन) में न तो उपभोक्ता के गलत बिलों को शून्य किया और न ही हर्जाने की राशि का भुगतान किया। अधिकारियों की इस हठधर्मिता के खिलाफ उपभोक्ता ने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की धारा 72 (Consumer Protection Act Section 72) के तहत प्रकीर्ण वाद (Execution/Miscellaneous Case) दाखिल किया।
अदालत ने शुरुआत में दोनों अधिकारियों को जमानतीय वारंट जारी कर तलब किया था। अधिकारियों ने वारंट तामील तो कर लिया, लेकिन न तो वे स्वयं अदालत में उपस्थित हुए और न ही अपने अधिवक्ता के जरिए कोई संतोषजनक जवाब दाखिल किया। आयोग ने इसे न्यायपालिका की खुली अवमानना और जनहित की घोर अनदेखी मानते हुए दोनों अधिकारियों को सीधे 3-3 महीने के कारावास की सजा सुनाई और उनके खिलाफ गैर-जमानती गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया।
बस्ती उपभोक्ता अदालत के 35 साल के इतिहास में पहला ऐसा ऐतिहासिक फैसला
बस्ती जनपद में वर्ष 1991 में उपभोक्ता फोरम की स्थापना की गई थी, जिसे बाद में नए कानूनों के तहत जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग का दर्जा दिया गया। अदालत के 35 वर्षों के लंबे इतिहास में यह पहला अवसर है जब किसी सरकारी विभाग के राजपत्रित श्रेणी के उच्चाधिकारियों को न्यायिक आदेश की अवहेलना के चलते सीधे जेल की सजा सुनाई गई है।
विधिक विशेषज्ञों का कहना है कि प्रायः सरकारी विभागों में यह धारणा बन चुकी थी कि उपभोक्ता अदालत के फैसलों को लटकाया जा सकता है या उनकी अनदेखी की जा सकती है। उपभोक्ता संरक्षण कानून की धारा 72 के तहत आयोग को सिविल कोर्ट के साथ-साथ न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी की शक्तियां प्राप्त हैं, जिसके तहत अदालत अपने आदेश का अनुपालन न करने वाले किसी भी दोषी अधिकारी को तीन वर्ष तक की जेल और 1 लाख रुपये तक का जुर्माना लगा सकती है।
लापरवाह बिजली अफसरों के लिए बड़ा नजीर: उपभोक्ता अधिकारों की बड़ी जीत
उत्तर प्रदेश में इन दिनों बिजली बिलिंग की विसंगतियों, स्मार्ट मीटरों की कथित तेज रफ्तार और मनमाने असेसमेंट को लेकर आम जनता में भारी असंतोष देखा जा रहा है। ऐसे समय में बस्ती उपभोक्ता आयोग का यह फैसला पूरे प्रदेश के बिजली महकमे के लिए एक सख्त चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है।
इस फैसले से यह साफ संदेश गया है कि बिजली कंपनियां और उनके अधिकारी कानून से ऊपर नहीं हैं। यदि कोई अधिकारी अपनी शक्तियों का दुरुपयोग कर उपभोक्ताओं को परेशान करता है या न्यायिक आदेशों की अवहेलना करता है, तो उसे व्यक्तिगत रूप से जेल की सलाखों के पीछे जाना पड़ सकता है। इस आदेश के बाद पूर्वांचल के बिजली महकमे में हड़कंप मच गया है और विभागीय स्तर पर पेंडिंग शिकायतों के त्वरित निस्तारण की कवायद तेज हो गई है।