Ganga Expressway Cave-In: अमरोहा के बाद अब उन्नाव में धंसा गंगा एक्सप्रेसवे, भारी बारिश में बही हजारों टन मिट्टी

Ganga Expressway Cave-In: अमरोहा के बाद अब उन्नाव में धंसा गंगा एक्सप्रेसवे, भारी बारिश में बही हजारों टन मिट्टी

उत्तर प्रदेश सरकार के सबसे बड़े ड्रीम इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट 594 किलोमीटर लंबे गंगा एक्सप्रेसवे (Ganga Expressway) के निर्माण कार्य और गुणवत्ता नियंत्रण पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले में मिट्टी बहने और सड़क धंसने के बहुचर्चित मामले की स्याही अभी सूखी भी नहीं थी कि अब उन्नाव जिले की सीमा में एक्सप्रेसवे के तटबंध (Embankment) का एक बड़ा हिस्सा तेज बारिश के बहाव में ताश के पत्तों की तरह ढह गया।

उन्नाव के ग्रामीण इलाके में एक्सप्रेसवे के मुख्य कैरिजवे के समानांतर बनी मिट्टी की मजबूत ढलान (Slope) बह जाने से 15 से 20 फीट तक गहरे और खतरनाक गड्ढे बन गए हैं। इस घटना की जानकारी मिलते ही उत्तर प्रदेश एक्सप्रेसवेज औद्योगिक विकास प्राधिकरण (UPEIDA), कार्यदायी एजेंसियों और जिला प्रशासन में हड़कंप मच गया है।

अमरोहा के बाद उन्नाव में धंसाव: कहां और कैसे हुआ हादसा?

स्थानीय सूत्रों और ग्रामीणों के अनुसार, उन्नाव जिले के बीघापुर और पुरवा तहसील क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले गंगा एक्सप्रेसवे के पैकेज में यह बड़ा कटाव देखा गया है। पिछले 48 घंटों से इलाके में हो रही मानसूनी मूसलाधार बारिश के चलते पुलिया (Culvert) और अंडरपास के पास पानी की उचित निकासी (Drainage) न होने के कारण जलभराव हो गया।

पानी के तेज दबाव और ढलान पर उचित स्लोप प्रोटेक्शन न होने की वजह से एक्सप्रेसवे के दोनों किनारों से हजारों टन मिट्टी कटकर पास के खेतों और खाइयों में बह गई। कई स्थानों पर मुख्य पक्की डामर/कंक्रीट सड़क के बिल्कुल किनारे तक की मिट्टी खिसक चुकी है, जिससे सड़क का निचला आधार (Sub-base) पूरी तरह खोखला होने की कगार पर पहुंच गया है। यदि समय रहते इसे नियंत्रित नहीं किया गया, तो मुख्य मार्ग का बड़ा स्लैब कभी भी नीचे धंस सकता है।

अमरोहा में पहले ही बह चुका था एक्सप्रेसवे का बड़ा हिस्सा

गौरतलब है कि कुछ ही दिन पहले अमरोहा जिले के गजरौला और धनौरा क्षेत्र के समीप भी गंगा एक्सप्रेसवे पर ठीक इसी प्रकार की गंभीर तकनीकी विफलता सामने आई थी। वहां भी तेज बारिश के बाद एक्सप्रेसवे के किनारे की सुरक्षा दीवार और मिट्टी का भारी कटाव हो गया था, जिसके कई वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए थे।

अमरोहा की घटना के बाद शासन ने निर्माण एजेंसियों को सभी पैकेजों में स्लोप पिचिंग, जियो-टेक्सटाइल लेयरिंग और ड्रेनेज चैनलों को सुदृढ़ करने के सख्त निर्देश दिए थे। इसके बावजूद उन्नाव में उसी प्रकृति का दूसरा बड़ा धंसाव सामने आना यह दर्शाता है कि निर्माण कंपनियों द्वारा जमीनी स्तर पर सुरक्षा और स्थायित्व के मानकों का पालन नहीं किया जा रहा है।

सॉइल कॉम्पैक्शन और स्लोप प्रोटेक्शन में भारी लापरवाही के आरोप

एक्सप्रेसवे निर्माण से जुड़े तकनीकी विशेषज्ञों और स्ट्रक्चरल इंजीनियरों का कहना है कि किसी भी हाई-स्पीड एक्सेस-कंट्रोल्ड एक्सप्रेसवे के निर्माण में मिट्टी के भराव (Embankment Filling) के दौरान इंडियन रोड्स कांग्रेस (IRC) के कड़े दिशा-निर्देशों का पालन करना अनिवार्य होता है। इसके तहत:

  • मिट्टी की प्रत्येक 20 से 25 सेंटीमीटर की परत बिछाने के बाद भारी रोलर्स द्वारा 95 से 98 प्रतिशत तक सघन कॉम्पैक्शन (Proctor Density) सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

  • भारी बारिश वाले क्षेत्रों में तटबंध के ढलानों पर जियो-ग्रिड, कंक्रीट पिचिंग, या टर्फिंग (घास रोपण) तत्काल कराया जाना चाहिए ताकि पानी का बहाव मिट्टी को काट न सके।

  • एक्सप्रेसवे के मुख्य मार्ग से निकलने वाले तूफानी पानी (Storm Water) के लिए व्यवस्थित कंक्रीट ड्रेनेज च्यूट (Chutes) बनाए जाने चाहिए, ताकि पानी सीधे ढलान पर गिरने के बजाय नालों के माध्यम से नीचे उतरे।

उन्नाव में घटी घटना यह स्पष्ट करती है कि कार्यदायी संस्था ने या तो मिट्टी की दबाई (Compaction) में कोताही बरती या फिर पानी की निकासी के चैनलों को अधूरा छोड़ दिया, जिसके कारण वर्षा का जल सीधे तटबंध को काटता हुआ नीचे उतर गया।

खेतों में फैला मलबे का सैलाब, स्थानीय किसानों को भारी नुकसान

एक्सप्रेसवे की मिट्टी बहने से न केवल सरकारी परियोजना को क्षति पहुंची है, बल्कि आसपास के दर्जनों किसानों की फसलें भी बर्बाद हो गई हैं। तटबंध से बहकर आई हजारों टन रेतीली और चिकनी मिट्टी नीचे स्थित धान, बाजरा और मक्के के लहलहाते खेतों में दो से तीन फीट तक जमा हो गई है।

प्रभावित ग्रामीणों और किसानों ने कार्यदायी संस्था के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन किया है। किसानों का कहना है कि जल निकासी की योजना बनाते समय स्थानीय प्राकृतिक नालों को बंद कर दिया गया, जिससे सारा पानी उनके खेतों में भर गया और मलबे ने फसलों को नष्ट कर दिया। किसानों ने जिला प्रशासन से तत्काल गिरदावरी कराकर उचित मुआवजे और खेत से मलबा हटाने की मांग की है।

₹36,000 करोड़ के ड्रीम प्रोजेक्ट पर समयसीमा का भारी दबाव

गंगा एक्सप्रेसवे उत्तर प्रदेश का सबसे लंबा और महत्वाकांक्षी इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट है, जिसकी कुल लागत ₹36,230 करोड़ से अधिक है। यह 6-लेन (भविष्य में 8-लेन विस्तार योग्य) एक्सप्रेसवे पश्चिमी यूपी के मेरठ से शुरू होकर हापुड़, बुलंदशहर, अमरोहा, संभल, बदायूं, शाहजहांपुर, हरदोई, उन्नाव, रायबरेली और प्रतापगढ़ होते हुए सीधे प्रयागराज को जोड़ेगा।

इस एक्सप्रेसवे को रिकॉर्ड समय में पूरा कर आगामी महाकुंभ से पहले जनता के लिए खोलने का कड़ा प्रशासनिक लक्ष्य निर्धारित किया गया है। स्थानीय लोगों और विपक्षी दलों का आरोप है कि निर्माण एजेंसियां तय समयसीमा (Deadlines) को पूरा करने की अंधी दौड़ में गुणवत्ता नियंत्रण और सुरक्षा परीक्षणों की अनदेखी कर रही हैं, जिसका खामियाजा अब लगातार धंसाव के रूप में सामने आ रहा है।

यूपीडा (UPEIDA) की हाई-लेवल तकनीकी टीम मौके पर, आपातकालीन मरम्मत शुरू

घटना की गंभीरता को देखते हुए यूपीडा के वरिष्ठ अधिकारियों, मुख्य सुरक्षा सलाहकारों और निर्माण कंपनी के परियोजना निदेशकों ने उन्नाव के प्रभावित स्थल का स्थलीय निरीक्षण किया है। यूपीडा ने मामले की तकनीकी जांच के आदेश जारी कर दिए हैं और कार्यदायी एजेंसी को कारण बताओ नोटिस जारी किया जा रहा है।

धंसाव वाले हिस्से को और अधिक फैलने से रोकने के लिए मौके पर भारी अर्थमूवर मशीनें, पोकलेन और सैकड़ों कामगारों को तैनात कर युद्धस्तर पर काम शुरू किया गया है:

  • कटे हुए हिस्सों पर अस्थायी सुरक्षा के लिए हजारों बालू की बोरियों (Sandbags) की दीवारें बनाई जा रही हैं।

  • मिट्टी के कटाव को रोकने के लिए प्लास्टिक शीट्स और त्वरित कंक्रीट ग्राउटिंग का इस्तेमाल किया जा रहा है।

  • पानी के बहाव को मोड़ने के लिए मुख्य कैरिजवे के किनारे अस्थायी डायवर्जन ड्रेन बनाए जा रहे हैं।

  • निर्माण एजेंसी को निर्देश दिए गए हैं कि जब तक स्थायी स्लोप पिचिंग और ड्रेनेज डक्ट का निर्माण पूरा न हो जाए, तब तक संबंधित लेन पर भारी निर्माण वाहनों का आवागमन सीमित रखा जाए।

स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट और थर्ड-पार्टी इंस्पेक्शन की तेज मांग

एक्सप्रेसवे पर 120 किलोमीटर प्रति घंटे की अधिकतम रफ्तार से वाहनों का संचालन होना है। ऐसे में एक्सप्रेसवे के शुरू होने से पहले ही लगातार दो जिलों—अमरोहा और उन्नाव में मिट्टी का बहना और सड़क के आधार का कमजोर होना भविष्य में तेज गति से दौड़ने वाले वाहनों की सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा साबित हो सकता है।

नागरिक संगठनों, सड़क सुरक्षा कार्यकर्ताओं और तकनीकी जानकारों ने मांग उठाई है कि मेरठ से लेकर प्रयागराज तक पूरे 594 किलोमीटर लंबे कॉरिडोर का आईआईटी (IIT कानपुर / IIT रुड़की) अथवा केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान (CRRI) जैसी स्वतंत्र शीर्ष तकनीकी संस्थाओं से पूर्ण स्ट्रक्चरल व सॉइल ऑडिट कराया जाए। जब तक प्रत्येक किलोमीटर पर लोड कैपेसिटी, सॉइल स्टेबिलिटी और ड्रेनेज सिस्टम की अंतिम एनओसी (NOC) न मिल जाए, तब तक एक्सप्रेसवे को सार्वजनिक यातायात के लिए न खोला जाए।