'स्वार्थी नेताओं ने पार्टी से मलाई खाई पर समाज को नहीं जोड़ा', लोकसभा और विधानसभा चुनाव में बसपा के नुकसान पर मायावती का फूटा गुस्सा; बताई चुनावी हार की असली वजह

'स्वार्थी नेताओं ने पार्टी से मलाई खाई पर समाज को नहीं जोड़ा', लोकसभा और विधानसभा चुनाव में बसपा के नुकसान पर मायावती का फूटा गुस्सा; बताई चुनावी हार की असली वजह

उत्तर प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में कभी 'सत्ता की मास्टर चाबी' अपने पास रखने वाली बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के लिए हाल के चुनावी नतीजे बेहद चुनौतीपूर्ण रहे हैं। 2007 में अपने दम पर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने वाली और 2019 के लोकसभा चुनाव में 10 सीटें जीतने वाली बसपा का 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव में प्रदर्शन काफी कमजोर रहा। जहां विधानसभा में पार्टी केवल एक सीट पर सिमट गई, वहीं लोकसभा में उसका खाता तक नहीं खुल सका और वोट शेयर घटकर एकल अंक में पहुंच गया। इस लगातार गिरते ग्राफ और संगठन के सामने खड़े संकट को लेकर पार्टी प्रमुख और चार बार की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने पार्टी की आंतरिक बैठकों और सार्वजनिक मंचों पर खुलकर आत्म-मंथन किया है। मायावती ने साफ शब्दों में बताया है कि आखिर किन गलतियों, अंदरूनी गद्दारियों, अवसरवादी नेताओं के स्वार्थ और विपक्षी दलों के सुनियोजित षड्यंत्रों के चलते बसपा को चुनावों में लगातार नुकसान उठाना पड़ा है।

स्वार्थी और अवसरवादी नेताओं का विश्वासघात: 'पार्टी से फायदा लिया, लेकिन समाज को नहीं जोड़ा'

मायावती ने बसपा के चुनावी नुकसान की सबसे बड़ी और प्राथमिक वजह पार्टी के भीतर मौजूद कुछ वरिष्ठ और अवसरवादी नेताओं के दोहरे चरित्र को ठहराया है। लखनऊ में पार्टी संगठन और वरिष्ठ पदाधिकारियों की समीक्षा बैठक को संबोधित करते हुए मायावती ने सीधे तौर पर उन नेताओं को आड़े हाथों लिया जिन्होंने सत्ता और रुतबे के दिनों में पार्टी से व्यक्तिगत और पारिवारिक लाभ तो खूब बटोरे, लेकिन जब संगठन को मजबूत करने और अपने-अपने समाज को बसपा की विचारधारा से जोड़ने की बारी आई, तो वे पूरी तरह निष्क्रिय हो गए।

मायावती ने कहा कि बसपा किसी एक व्यक्ति, परिवार या जाति के भरोसे चलने वाला दल नहीं है, बल्कि यह बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर और मान्यवर कांशीराम के सर्वसमाज के हित और संवैधानिक अधिकारों की नीति पर आधारित आंदोलन है। उन्होंने ब्राह्मण, क्षत्रिय, मुस्लिम और पिछड़े वर्ग से जुड़े कुछ पूर्व नेताओं पर तंज कसते हुए कहा कि ऐसे लोगों को पार्टी ने सांसद, विधायक, मंत्री और बड़े संगठनात्मक पदों से नवाजा, लेकिन इन नेताओं ने अपने समाज के बीच जाकर पार्टी की जड़ों को सींचने की जिम्मेदारी नहीं निभाई। चुनाव आते ही जब टिकट नहीं मिला या स्थिति कठिन दिखी, तो वे दूसरी पार्टियों में भाग गए, जिससे पार्टी के पारंपरिक सोशल इंजीनियरिंग मॉडल को गहरा आघात पहुंचा।

'बी-टीम' का झूठा नैरेटिव और विपक्षी दलों का संविधान-आरक्षण पर भ्रमजाल

चुनावी हार के कारणों का विश्लेषण करते हुए मायावती ने समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन द्वारा फैलाए गए 'दुष्प्रचार' को भी जिम्मेदार माना है। मायावती का कहना है कि पिछले आम चुनावों में विपक्षी दलों ने सुनियोजित तरीके से यह भ्रामक नैरेटिव गढ़ा कि बसपा अकेले चुनाव लड़कर केवल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को फायदा पहुंचा रही है। इस दुष्प्रचार ने आम मतदाताओं, खासकर धर्मनिरपेक्ष और गैर-भाजपा वोटरों के मन में यह संशय पैदा कर दिया कि बसपा को वोट देना अपना वोट 'बर्बाद' करना होगा।

इसके साथ ही, चुनावों के दौरान 'संविधान खतरे में है' और 'आरक्षण खत्म कर दिया जाएगा' जैसे नारों के जरिए विपक्षी इंडिया ब्लॉक ने बहुजन समाज के एक बड़े हिस्से को भावनात्मक रूप से अपने पक्ष में कर लिया। मायावती के अनुसार, विपक्ष का यह दांव पूरी तरह से अवसरवादी था, क्योंकि कांग्रेस और सपा ने अपने शासनकाल में कभी भी दलितों और पिछड़ों के अधिकारों को ईमानदारी से लागू नहीं किया, लेकिन चुनावी समर में वे दलित और अति-पिछड़े मतदाताओं के एक वर्ग को बसपा से दूर खींचने में कामयाब रहे।

मुस्लिम मतदाताओं का एकतरफा ध्रुवीकरण और वोट ट्रांसफर की विफलता

बसपा की राजनीतिक रणनीति में हमेशा से दलित और मुस्लिम गठजोड़ एक मजबूत आधार रहा है। मायावती ने कई चुनावों में रिकॉर्ड संख्या में अल्पसंख्यक समाज के प्रत्याशियों को टिकट देकर इस समीकरण को मजबूत करने का प्रयास किया। हालांकि, मायावती ने खुलकर अफसोस जताया कि पार्टी द्वारा पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिए जाने के बावजूद मुस्लिम मतदाता रणनीतिक रूप से पूरी तरह सपा और कांग्रेस गठबंधन की तरफ लामबंद हो गए।

मायावती ने पूर्व में गठबंधन के अनुभवों का हवाला देते हुए यह भी स्पष्ट किया कि जब बसपा किसी अन्य दल के साथ मिलकर चुनाव लड़ती है, तो बसपा का अनुशासित कैडर वोट तो सहयोगी दल को पूरी ईमानदारी से ट्रांसफर हो जाता है, लेकिन दूसरी पार्टियों का कोर वोटबैंक बसपा के उम्मीदवारों को वोट नहीं देता। इसी कड़वे अनुभव के चलते जब पार्टी ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया, तो विपक्ष ने मुस्लिम-दलित एकता के भ्रम को तोड़कर अल्पसंख्यक वोटों को एकतरफा झटक लिया, जिसका सीधा नुकसान बसपा प्रत्याशियों को तीसरे नंबर पर खिसक कर उठाना पड़ा।

जमीनी कैडर का कमजोर होना और 'जेन-जी' युवाओं से संवाद में अंतर

राजनीतिक विश्लेषकों और पार्टी के अंदरूनी फीडबैक के अनुसार, बसपा का एक और बड़ा नुकसान उसके ऐतिहासिक कैडर बेस में आई सुस्ती रही है। कभी कांशीराम के दौर में बामसेफ (BAMCEF) और डीएस-4 के जरिए गांव-गांव, गली-मोहल्लों में जो निरंतर विचार गोष्ठियां और कैडर कैंप्स चलते थे, वे पिछले कुछ वर्षों में धीमे पड़ गए थे। इसके कारण नई पीढ़ी के दलित और पिछड़े युवाओं (Gen-Z) तक पार्टी की मूल विचारधारा उस प्रभाव के साथ नहीं पहुंच पा रही थी।

सोशल मीडिया के युग में जब अन्य पार्टियां डिजिटल प्रचार और आक्रामक अभियानों के जरिए युवाओं को आकर्षित कर रही थीं, तब बसपा की पारंपरिक कार्यप्रणाली थोड़ी पीछे छूट गई। हालांकि, मायावती ने अब इस कमी को गंभीरता से स्वीकार किया है और आकाश आनंद के नेतृत्व में युवा विंग को आगे लाकर डिजिटल स्पेस और रैलियों में युवाओं की भागीदारी को बढ़ाने का फैसला किया है ताकि इस खाई को जल्द से जल्द भरा जा सके।

निष्ठावान पुराने कार्यकर्ताओं पर दोबारा भरोसा और 2027 की नई रणनीति

चुनावी पराजयों के कारणों की तह तक पहुंचने के बाद अब बसपा प्रमुख ने संगठन के पुनर्गठन का बड़ा अभियान शुरू किया है। मायावती ने साफ कर दिया है कि अब अवसरवादी और दलबदलू नेताओं के बजाय पार्टी में लंबे समय से ईमानदारी से समर्पित वरिष्ठ कार्यकर्ताओं और ऊर्जावान युवाओं को ही संगठन की कमान सौंपी जा रही है।

पार्टी ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को ध्यान में रखते हुए जिला और मंडल स्तर पर नई कमेटियां गठित की हैं। मायावती का मानना है कि भले ही चुनावों में सीटें कम आई हों, लेकिन बसपा का वैचारिक आंदोलन कभी खत्म नहीं हो सकता। संगठन की नर्सरी को दोबारा तैयार करके, भाजपा-आरएसएस की नीतियों पर मुखर प्रहार करके और सपा-कांग्रेस के झूठे दावों को बेनकाब करके बसपा अपने खोए हुए जनाधार को वापस पाने के लिए पूरी ताकत से मैदान में उतर चुकी है।