'सपा कभी किसी से गठबंधन नहीं तोड़ती, जब हाथ थामती है तो मजबूती से निभाती है': मायावती के तीखे हमलों पर अखिलेश यादव का सीधा जवाब, बताया कौन छोड़ता है साथ

'सपा कभी किसी से गठबंधन नहीं तोड़ती, जब हाथ थामती है तो मजबूती से निभाती है': मायावती के तीखे हमलों पर अखिलेश यादव का सीधा जवाब, बताया कौन छोड़ता है साथ

उत्तर प्रदेश के सियासी गलियारों में समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के बीच पुरानी तल्खी एक बार फिर खुलकर सतह पर आ गई है। बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री मायावती द्वारा सपा के गठबंधन संबंधी इतिहास, 1995 के कुख्यात लखनऊ स्टेट गेस्ट हाउस कांड और 2019 के गठबंधन पर लगाए गए गंभीर आरोपों पर सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने बेबाक और सधा हुआ पलटवार किया है।

राजधानी लखनऊ में आयोजित एक कार्यक्रम और उसके बाद मीडिया से बातचीत के दौरान अखिलेश यादव ने गठबंधन धर्म को लेकर अपनी पार्टी का रुख पूरी तरह स्पष्ट किया। अखिलेश यादव ने साफ शब्दों में कहा कि समाजवादी पार्टी कभी किसी दल से गठबंधन नहीं तोड़ती है। जब सपा किसी का हाथ थामती है, तो पूरी ईमानदारी और मजबूती के साथ उसका साथ निभाती है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि सपा किसी को गठबंधन से बाहर नहीं निकालती, बल्कि लोग अपने-अपने निजी और राजनीतिक स्वार्थों के चलते खुद सपा का साथ छोड़कर चले जाते हैं।

'आजकल सच बोलना सबसे मुश्किल काम': आरोपों पर अखिलेश का दर्द

प्रेस वार्ता और सार्वजनिक मंच पर बोलते हुए अखिलेश यादव ने कहा कि मौजूदा राजनीतिक माहौल में निष्पक्ष और सच बात कहना सबसे बड़ा जोखिम बन गया है। उन्होंने कहा, "इधर सच बोलना भी गलत माना जाता है। अगर आप कोई सच बात कह देंगे, तो लोग संदर्भ समझे बिना नाराज हो जाएंगे और आप पर चौतरफा हमले शुरू हो जाएंगे। जो लोग आज हम पर उंगली उठा रहे हैं, उन्हें अपने गिरेबान में झांकना चाहिए और उन राजनीतिक दलों से भी सवाल पूछने चाहिए जो सत्ता के साथ खड़े हैं।"

अखिलेश यादव ने स्पष्ट किया कि समाजवादी पार्टी का इतिहास सहयोगियों के साथ विश्वासघात करने का नहीं रहा है। उन्होंने कहा कि समाजवादियों ने हमेशा बड़ा दिल दिखाते हुए छोटे और क्षेत्रीय दलों को अपनी ताकत से ज्यादा हिस्सेदारी दी है, लेकिन जब चुनावी परिणाम किसी दल के निजी मंसूबों के अनुसार नहीं आते, तो वे सारा ठीकरा सपा पर फोड़कर अलग राह पकड़ लेते हैं।

मायावती ने साधा था तीखा निशाना: गेस्ट हाउस कांड और 2019 की दिलाई थी याद

इस जुबानी जंग की शुरुआत तब हुई जब बसपा सुप्रीमो मायावती ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर एक विस्तृत पोस्ट लिखकर अखिलेश यादव और सपा की कार्यशैली पर सीधा हमला बोला था। मायावती ने अखिलेश के 'चवन्नी से रुपया बनाया' वाले बयान को अशोभनीय बताते हुए जाट समाज और पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के परिवार से माफी मांगने की मांग की थी।

मायावती ने सपा के राजनीतिक चाल, चरित्र और चेहरे पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया था कि सपा का रवैया सहयोगियों के प्रति हमेशा संकीर्ण, स्वार्थी और अविश्वसनीय रहा है। उन्होंने 1993 में मुलायम सिंह यादव के साथ हुए गठबंधन के टूटने और 2 जून 1995 के गेस्ट हाउस कांड का उल्लेख करते हुए दावा किया था कि सपा काम निकलते ही 'गिरगिट की तरह रंग बदलती है'। उन्होंने यह भी कहा था कि 2019 के लोकसभा चुनाव में अखिलेश ने भरोसा दिलाया था कि वे पिता वाली गलती नहीं दोहराएंगे, लेकिन चुनाव बाद सपा के असहयोग और भितरघात के चलते गठबंधन टूट गया।

अखिलेश का गठबंधन गणित: 'बीजेपी जयंत को दे 120 सीटें, तभी होगा सम्मान'

अखिलेश यादव ने जयंत चौधरी और एनडीए के अन्य सहयोगी दलों का नाम लेकर भारतीय जनता पार्टी को भी कटघरे में खड़ा किया। उन्होंने कहा कि सपा ने अपने गठबंधन के दौरान रालोद को 30 से अधिक सीटें दी थीं और उनके नेताओं को सदन तक पहुंचाया था।

अखिलेश ने भाजपा को खुली चुनौती देते हुए कहा कि अगर भाजपा सचमुच अपने गठबंधन सहयोगियों और जाट समाज का सम्मान करती है, तो वह आगामी विधानसभा चुनाव में रालोद को कम से कम चार गुना यानी 120 सीटें देकर दिखाए। उन्होंने कहा कि यदि भाजपा अपने सहयोगी दलों को इतनी सीटें नहीं देती है, तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि भाजपा केवल उनका इस्तेमाल कर रही है और यह किसान मसीहा चौधरी चरण सिंह की विरासत का सीधा अनादर होगा।

'परिवारवाद के अपने फायदे': पार्टी न टूटने की सुनाई अंदरूनी कहानी

विरोधियों द्वारा सपा पर लगाए जाने वाले 'परिवारवाद' के आरोपों पर अखिलेश यादव ने बेहद दिलचस्प और बेबाक तर्क रखा। उन्होंने कहा कि जब केंद्र और राज्य की सरकारी एजेंसियों और राजनीतिक दबाव के जरिए विपक्षी दलों को तोड़ा जा रहा था, तब समाजवादी पार्टी पूरी मजबूती से चट्टान की तरह खड़ी रही।

अखिलेश ने कहा, "क्या आपने कभी सोचा कि हमारी पूरी पार्टी क्यों नहीं टूट सकी? क्योंकि हमारे पांच सांसद एक ही परिवार के थे, हमारे पास निष्ठावान मुस्लिम सांसद थे और समर्पित समाजवादी कार्यकर्ता थे, जिन्हें कोई हिला नहीं सका। कभी-कभी परिवारवाद के भी अपने बड़े फायदे होते हैं।" उन्होंने कहा कि पार्टी का मूल काडर विचारधारा से बंधा हुआ है और वह किसी भी दबाव के आगे झुकने वाला नहीं है।

पीडीए की नई परिभाषा और प्राथमिक शिक्षा पर बड़ा रोडमैप

कार्यक्रम के दौरान सपा मुखिया ने अपनी बहुचर्चित रणनीति 'पीडीए' (PDA) का मानवीय पहलू सामने रखा। उन्होंने कहा कि जो लोग पीडीए को जातिवादी चश्मे से देखते हैं, वे इसके असली मर्म को नहीं जानते। अखिलेश ने स्पष्ट किया कि पीडीए का अर्थ केवल पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक ही नहीं, बल्कि 'प्रेम, दया और अपनापन' है।

इसके साथ ही उन्होंने अपनी भावी सरकार के एजेंडे को रखते हुए कहा कि समाजवादी सरकार बनने पर प्राथमिक शिक्षा के ढांचे को आधुनिक बनाया जाएगा और सरकारी स्कूलों के बच्चों को पौष्टिक भोजन व गुणवत्तापूर्ण संसाधन उपलब्ध कराए जाएंगे। उन्होंने दुग्ध उत्पादक किसानों के लिए नई डेयरी प्रोत्साहन नीति लाने और ऊर्जा क्षेत्र में गोबर गैस व बायो-सीएनजी प्रोजेक्ट्स को बढ़ावा देने का भी ऐलान किया।

महंगाई, चीनी के दाम और प्रति व्यक्ति आय पर सरकार को घेरा

अखिलेश यादव ने आर्थिक नीतियों और जनहित के मुद्दों पर योगी और मोदी सरकार पर जमकर हमला बोला। उन्होंने कहा कि तेल कंपनियों के भारी मुनाफे के लिए पेट्रोल में एथेनॉल की मिलावट की जा रही है, जिसके चलते बाजार में चीनी के दाम लगातार बढ़ रहे हैं और आम जनता की जेब पर डाका डाला जा रहा है।

सपा अध्यक्ष ने सवाल किया कि यदि देश और प्रदेश में प्रति व्यक्ति आय में रिकॉर्ड वृद्धि हो रही है, तो सरकार को यह बताना चाहिए कि 15 करोड़ गरीबों को मुफ्त राशन देने की नौबत क्यों बनी हुई है? उन्होंने कहा कि सरकार केवल प्रचार तंत्र के सहारे जमीनी गरीबी और बेरोजगारी को छिपाने की कोशिश कर रही है।

उत्तर प्रदेश में 2027 की सियासी जंग और बदलते समीकरण

सपा और बसपा के बीच उपजे इस ताजा टकराव ने यह साफ कर दिया है कि आगामी विधानसभा चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश की राजनीति में विपक्ष का कोई साझा मंच बनने की संभावना पूरी तरह समाप्त हो चुकी है। जहां बसपा सुप्रीमो मायावती 'एकला चलो' की राह पर चलते हुए अपने पारंपरिक दलित और अति-पिछड़े वोट बैंक को सहेजने में जुटी हैं, वहीं अखिलेश यादव 'पीडीए' और कांग्रेस के साथ बने गठबंधन के सहारे भाजपा के सामने मुख्य विकल्प के रूप में उभरने का दावा कर रहे हैं।

अखिलेश यादव के इस बयान ने सपा कार्यकर्ताओं में यह स्पष्ट संदेश दिया है कि पार्टी अपने वर्तमान सहयोगियों के साथ मजबूती से आगे बढ़ेगी और भाजपा विरोधी वोटों के ध्रुवीकरण के जरिए सत्ता में वापसी की रणनीति पर काम करेगी।