श्रीकृष्ण जन्मभूमि विवाद में कौन होगा मुख्य हिंदू पक्षकार? सुप्रीम कोर्ट ने दिए मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट वापस भेजने के संकेत, जानें 2 सितंबर को होने वाली सुनवाई और पूरा कानूनी गणित!
मथुरा स्थित ऐतिहासिक श्रीकृष्ण जन्मभूमि और शाही ईदगाह मस्जिद विवाद में एक बार फिर बड़ा कानूनी मोड़ आ गया है। देश की शीर्ष अदालत (Supreme Court) ने संकेत दिए हैं कि इस बहुचर्चित विवाद से जुड़ी दर्जनों दीवानी याचिकाओं में से किस मुकदमे को 'मुख्य वाद' (Lead Suit) माना जाए और किस पक्षकार को सभी हिंदू श्रद्धालुओं का 'प्रतिनिधि' (Representative Plaintiff) घोषित किया जाए, इस प्रश्न पर पुनः निर्णय लेने के लिए मामला वापस इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) भेजा जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की पीठ ने एक हिंदू पक्षकार की याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट के पूर्व आदेश पर प्रक्रियागत सवाल खड़े किए। शीर्ष अदालत ने कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस मामले में शामिल अन्य सभी हिंदू पक्षकारों व वादियों को कोई औपचारिक नोटिस जारी किए बिना ही एक अलग मुकदमे के वादी को भगवान श्रीकृष्ण के सभी भक्तों का प्रतिनिधि स्वीकार कर लिया था। पीठ ने स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट के समक्ष दायर अर्जी किसी अन्य उद्देश्य के लिए थी, लेकिन उस पर पारित आदेश ने सभी मुकदमों के प्राथमिक स्वरूप को प्रभावित कर दिया।
प्रक्रियागत चूक और प्राकृतिक न्याय: सुप्रीम कोर्ट ने क्यों जताई आपत्ति?
इस पूरे कानूनी विवाद की जड़ इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा 18 जुलाई 2025 को सुनाया गया एक आदेश है। हाईकोर्ट ने नागरिक प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश 1 नियम 8 के तहत 2023 के 'वाद संख्या 17' के वादी की अर्जी को स्वीकार कर लिया था। इस अर्जी के आधार पर हाईकोर्ट ने उक्त मुकदमे को सभी कृष्ण भक्तों की ओर से 'प्रतिनिधि वाद' (Representative Suit) घोषित करते हुए निर्देश दिया था कि सबसे पहले इसी मुख्य मुकदमे पर सुनवाई कर अंतिम फैसला सुनाया जाएगा।
हाईकोर्ट के इस फैसले से असंतुष्ट होकर एक अन्य मूल हिंदू पक्षकार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। याचिकाकर्ता का तर्क था कि जब मथुरा की निचली अदालत से सभी दीवानी मुकदमों को इलाहाबाद हाईकोर्ट स्थानांतरित किया गया था, तब उनका मुकदमा मूल रूप से प्राथमिक मामला माना जा रहा था। लेकिन हाईकोर्ट ने अन्य सभी वादियों को पक्ष रखने का अवसर दिए बिना या नोटिस जारी किए बिना, किसी दूसरे पक्षकार को संपूर्ण हिंदू समुदाय का चेहरा बना दिया। याचिकाकर्ता के अनुसार, यह फैसला प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) के स्थापित सिद्धांतों के पूरी तरह खिलाफ था।
सुनवाई के दौरान जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा, "हाईकोर्ट में दायर आवेदन किसी और उद्देश्य के लिए था और उस दौरान सभी वादियों को नोटिस जारी नहीं किए गए थे। हम इस स्थिति में मामले को पुनः निर्णय हेतु उच्च न्यायालय वापस भेजने के इच्छुक हैं।"
2 सितंबर की तारीख और पक्षकारों के बीच अनौपचारिक बातचीत
शीर्ष अदालत में सुनवाई के दौरान यह बात भी सामने आई कि पूर्व की सुनवाइयों के दौरान वकीलों ने कोर्ट को जानकारी दी थी कि विभिन्न हिंदू पक्षकारों के बीच आपस में बातचीत चल रही है ताकि सर्वसम्मति से मुख्य वाद तय किया जा सके। कुछ हिंदू पक्षकारों की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने भी अदालत से आग्रह किया कि इस प्रश्न पर नए सिरे से निर्णय लेने के लिए फाइल को पुनः इलाहाबाद हाईकोर्ट भेज दिया जाए।
गौरतलब है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 26 मई 2023 को एक ऐतिहासिक आदेश पारित करके मथुरा की जिला अदालत में लंबित इस विवाद से जुड़े सभी मुकदमों को अपने पास स्थानांतरित कर लिया था। इसके बाद से ही हाईकोर्ट में 20 से अधिक दीवानी मुकदमों पर सुनवाई चल रही है। हिंदू पक्ष का दावा है कि मुग़ल सम्राट औरंगज़ेब ने भगवान श्रीकृष्ण के मूल जन्मस्थान मंदिर को ध्वस्त करके वहां शाही ईदगाह मस्जिद का निर्माण कराया था, इसलिए उस जमीन को मुक्त कराकर हिंदू समाज को सौंपा जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की अगली महत्वपूर्ण सुनवाई के लिए 2 सितंबर 2026 की तिथि तय की है। शीर्ष अदालत के इस संभावित फैसले के बाद अब 2 सितंबर को यह तय हो जाएगा कि क्या सुप्रीम कोर्ट स्वयं कोई व्यवस्था देता है या फिर मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट रिमांड (Remand) कर दिया जाता है।