नेपाल में जलप्रलय के 11वें दिन हुआ कुदरत का करिश्मा, 250 घंटे मलबे में दबे रहने के बाद महिला सहित दो लोग जिंदा निकाले गए
पहाड़ी राष्ट्र नेपाल में 26 अगस्त को भोटेकोशी नदी में आए प्रलयंकारी जलसैलाब और भीषण भूस्खलन के बाद जहां मलबे में दबी जिंदगियों की उम्मीदें लगभग पूरी तरह टूट चुकी थीं, वहीं आपदा के 11वें दिन एक ऐसा चमत्कार हुआ जिसने हर किसी को हैरान कर दिया। राहत और बचाव कार्य में जुटे जवानों ने लगभग 250 घंटे (11 दिन) तक पत्थरों, कंक्रीट और गीली मिट्टी के भारी मलबे के नीचे दबे रहने के बावजूद एक महिला समेत दो लोगों को सुरक्षित और जीवित बाहर निकाल लिया।
इस असंभव सी लगने वाली घटना ने न केवल ग्राउंड जीरो पर पसीना बहा रहे एनडीआरएफ (NDRF) और नेपाली सुरक्षा बलों के हौसले को नई उड़ान दी है, बल्कि उन हजारों परिजनों के दिलों में भी उम्मीद की एक नई लौ जला दी है जो अब भी अपने लापता स्वजनों की राह देख रहे हैं। 1400 से अधिक मौतों और हजारों लापता लोगों के आधिकारिक आंकड़ों के बीच इस खबर को किसी ईश्वरीय वरदान से कम नहीं माना जा रहा है।
एयर पॉकेट बनी जीवनदायिनी: 250 घंटे तक मलबे में कैसे जिंदा रहे दोनों लोग?
बचाव दल के अधिकारियों और डॉक्टरों के अनुसार, यह घटना उत्तरी नेपाल के गंभीर रूप से प्रभावित पहाड़ी जिले के एक धंसे हुए आवासीय ढांचे के पास घटी। जब 26 अगस्त को भयानक भूस्खलन हुआ, तो कंक्रीट की मजबूत छत और एक बड़े बोल्डर के बीच एक संकरा त्रिकोणीय स्थान बन गया, जिसे तकनीकी भाषा में 'एयर पॉकेट' (Air Pocket) कहा जाता है।
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हवा का निरंतर प्रवाह: ऊपर की चट्टानें आपस में इस तरह लॉक हो गई थीं कि उनके बीच मलबे का सीधा दबाव अंदर नहीं आया और कुछ बारीक दरारों से ताजी हवा अंदर पहुंचती रही, जिससे दोनों का दम घुटने से बच गया।
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सीमित पानी की बूंदें: मलबे के भीतर जीवित बची महिला ने प्रारंभिक बातचीत में बताया कि पहाड़ी से रिसने वाले हल्के पानी की बूंदों के सहारे उन्होंने अपने गले को गीला रखा और एक-दूसरे को हिम्मत बंधाते रहे।
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अदम्य इच्छाशक्ति: 11 दिनों तक बिना भोजन, घुप्प अंधेरे और मौत के खौफ के बीच फंसे रहने के बावजूद दोनों ने जीने की आस नहीं छोड़ी और जब भी बाहर से किसी मशीन की आवाज आती, तो वे पत्थरों पर हल्की चोट मारकर संकेत देने का प्रयास करते रहे।
लाइफ डिटेक्टर और खोजी कुत्तों ने पकड़ा संकेत, 6 घंटे चला नाजुक ऑपरेशन
आपदा के 11वें दिन जब राहत दल मलबे को समेटने और शवों की तलाश के लिए अंतिम चरण का सर्च ऑपरेशन चला रहा था, तभी विशेष रूप से प्रशिक्षित खोजी कुत्ते (Sniffer Dogs) एक बड़े मलबे के ढेर पर जाकर लगातार भौंकने लगे और जमीन को खुरचने लगे।
संदेह होने पर भारतीय एनडीआरएफ और नेपाली सेना की तकनीकी यूनिट ने तुरंत अत्याधुनिक 'अकॉस्टिक लाइफ डिटेक्टर' (Acoustic Life Detector) और फाइबर-ऑप्टिक कैमरों को दरारों के रास्ते नीचे उतारा। स्क्रीन पर जब नीचे से हल्की आवाज और सांसों के कंपन की पुष्टि हुई, तो पूरे कैंप में सन्नाटा खिंच गया और तुरंत भारी अर्थमूवर्स का काम रोक दिया गया। इसके बाद रेस्क्यू टीम ने अपने हाथों और छोटे हाइड्रोलिक कटर के जरिए लगातार 6 घंटे तक बिना किसी झटके के पत्थरों को काटकर एक सुरक्षित एस्केप टनल बनाई। दोपहर के समय पहले महिला और फिर कुछ ही देर बाद दूसरे पुरुष को स्ट्रेचर और हार्नेस के सहारे सुरक्षित खींचकर बाहर निकाला गया।
अस्पताल में भर्ती, डॉक्टरों ने स्थिति को बताया खतरे से बाहर
मलबे से बाहर निकलते ही दोनों को थर्मल कंबलों में लपेटा गया और तुरंत पास के फील्ड मिलिट्री अस्पताल के आईसीयू (ICU) वार्ड में शिफ्ट किया गया। अस्पताल के वरिष्ठ चिकित्सकों के अनुसार, दोनों व्यक्ति अत्यधिक डिहाइड्रेशन (पानी की कमी), कुपोषण, हाइपोथर्मिया और मांसपेशियों के खिंचाव से जूझ रहे हैं, लेकिन उनकी महत्वपूर्ण शारीरिक प्रणालियां (वाइटल्स) स्थिर हैं और दोनों होश में हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि इतने लंबे समय तक बिना ठोस आहार और पानी के मलबे में दबे रहने के बाद किसी का जिंदा बचना एक दुर्लभ चिकित्सकीय चमत्कार है। डॉक्टरों की एक विशेष टीम 24 घंटे उनकी किडनी की कार्यप्रणाली, इलेक्ट्रोलाइट बैलेंस और मानसिक स्थिति की निगरानी कर रही है।
नए सिरे से शुरू हुआ तलाशी अभियान: नहीं बुझेगी उम्मीद की लौ
इस चमत्कारिक बचाव के बाद नेपाल के राष्ट्रीय आपदा आपातकालीन अभियान केंद्र (NEOC) ने राहत दलों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि मलबे को हटाने के काम में किसी भी तरह की जल्दबाजी न दिखाई जाए। जहां भी गहरे एयर पॉकेट या सुरंगों जैसे ढांचे नजर आएं, वहां बुलडोजर चलाने से पहले लाइफ डिटेक्टर्स और कैमरों से पूरी जांच की जाए।
इस घटना ने यह साबित कर दिया है कि जब तक मलबे का आखिरी टुकड़ा नहीं हट जाता, तब तक किसी भी लापता व्यक्ति को मरा हुआ नहीं माना जा सकता। 11वें दिन सामने आई इस जिंदगी की जीत ने नेपाल के दुर्गम पहाड़ों में आपदा से जूझ रहे हजारों राहतकर्मियों को एक नई ताकत और ऊर्जा से भर दिया है।